भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 669, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 669

सुंदरता और सुख से दुहाने वाली वशा इस लोक में यजमान के पास रहती है. यजमान जब वशा का दान करता है तो वह उसे सभी अभीष्ट प्रदान करती है. (३५) सर्वान् कामान् यमराज्ये वशा प्रददुषे दुहे. अथाहुरनारिकं लोकं निरुन्धानस्य याचिताम्... (३६) यह वशा यम के राज्य में दाता की सभी कामनाओं को पूरा करने वाली है. मांगी हुई वशा के न देने पर नरक प्राप्त होता है, ऐसा विद्वानों का कथन है. (३६) प्रवीयमाना चरति क्रुद्धा गोपतये वशा. वेहतं मा मन्यमानो मृत्योः पाशेषु बध्यताम्.. (३७) क्रोध में भरी हुई वशा गाय अपने स्वामी को खाती हुई सी घूमती है. वह कहती है कि मुझ गर्भघातिनी को अपनी जानने वाला मूर्ख मृत्यु के बंधनों में पड़े. (३७) यो वेहतं मन्यमानो ऽ मा च पचते वशाम्. अप्यस्य पुत्रान् पौत्रांश्च याचयते बृहस्पतिः. (३८) यह वशा अन्य गायों में ताप बढ़ाती हुई घूमती है. यदि इस का स्वामी इसे दान नहीं करता तो वह उस के लिए विष का दोहन करती है. (३८) महदेषाव तपति चरन्ती गोषु गौरपि. अथो ह गोपतये वशाददुषे विषं दुहे.. (३९) जो गर्भघातिनी वशा को अपनी मानता है या उस का पाचन करता है, बृहस्पति उस के पुत्र, पौत्र आदि को लेने की इच्छा करते हैं. (३९) प्रियं पशूनां भवति यद् ब्रह्मभ्यः प्रदीयते. अथो वशायास्तत् प्रियं यद् देवत्रा हविः स्यात्.. (४०) ब्राह्मणों को वशा का दान कर देने पर वशा का स्वामी पशुओं का प्रिय होता है. वशा देवताओं को हवि के रूप में प्रदान की जाती है. (४०) या वशा उदकल्पयन् देवा यज्ञादुदेत्य. तासां विलिप्त्यं भीमामुदाकुरुत नारदः.. (४१) यज्ञों से लौट कर देवताओं ने वशा का निर्माण किया, तब नारद ने अधिक घी वाली और विशालकाय वशा को स्वीकार किया. (४१) तां देवा अमीमांसन्त वशेया ३ मवशेति. तामब्रवीन्नारद एषा वशानां वशतमेति.. (४२) ebook converter DEMO Watermarks*