अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 670, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंउस समय देवताओं ने यह कहा कि यह वशा अवशा है अर्थात् इस पर किसी का अधिकार नहीं है. नारद ने उसे वशाओं में परम वशा अर्थात् सब से वही वशा बनाया. (४२) कति नु वशा नारद यास्त्वं वेत्थ मनुष्यजाः. तास्त्वा पृच्छामि विद्वांसं कस्या नाश्नीयादब्राह्मणः.. (४३) हे नारद! तुम ऐसी कितनी गायों को जानने वाले हो जो मनुष्यों में प्रकट होती हैं. तुम विद्वान् हो, इसी कारण मैं तुम से पूछता हूं. अब्राह्मण वशा के प्राशन अर्थात् खाने से बचे. (४३) विलिप्त्या बृहस्पते या च सूतवशा वशा. तस्या नाश्नीयादब्राह्मणो य आशंसेत भूत्याम्.. (४४) हे बृहस्पत! जो अब्राह्मण ऐश्वर्य चाहे वह विलिप्ती अर्थात् विशेष प्रयोजनों में लिप्त सूतवशा और वशा का भोजन न करे. (४४) नमस्ते अस्तु नारदानुष्ठु विदुषे वशा. कतमासां भीमतमा यामदत्त्वा पराभवेत्.. (४५) हे नारद! तुम्हें नमस्कार है. वशा विद्वान् की स्तुति के अनुकूल ही है. इन में भयंकर वशा कौन सी है, जिस का दान न करने पर पराजय प्राप्त होती है. (४५) विलिप्ती या बृहस्पते ऽ थो सूतवशा वशा. तस्या नाश्नीयादब्राह्मणो य आशंसेत भूत्याम्.. (४६) हे बृहस्पति! ऐश्वर्य की प्रार्थना करने वाला अब्राह्मण विलिप्ती और सूत वशा और वशा का भोजन न करे. (४६) त्रीणि वै वशाजातानि विलिप्ती सूतवशा वशा. ताः प्र यच्छेद ब्रह्मभ्यः सो ऽ नाव्रस्कः प्रजापतौ.. (४७) वशाओं के तीन भेद होते हैं—विलिप्ती, सूत वशा और वशा. इन्हें ब्राह्मणों को दान कर दे तो वह प्रजापति को क्रोध उत्पन्न करने वाला नहीं होता है. (४७) एतद् वो ब्राह्मणा हविरिति मन्वीत याचितः. वशां चेदेनं याचेयुर्या भीमाददुषो गृहे.. (४८) दान करने वाले के घर में यदि भीमा वशा है तो उस वशा की याचना करने पर यह कहे कि हे ब्राह्मणो! यह तुम्हारे लिए हवि है. (४८) देवा वशां पर्यवदन् न नो ऽ दादिति हीडिताः. ebook converter DEMO Watermarks*