अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 72, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंदूसरा कांड सूक्त-१ देवता—ब्रह्म, आत्मा वेनस्तत् पश्यत् परमं गुहा यद् यत्र विश्वं भवत्येकरूपम्. इदं पृश्निरदुहज्जायमानाः स्वर्विदो अभ्यनूषत व्राः.. (१) दीप्तिशाली आदित्य ने समस्त प्राणियों के हृदय में सत्य, ज्ञान आदि लक्षणों से युक्त ब्रह्म का साक्षात्कार किया, जिस में समस्त विश्व एकाकार हो जाता है. स्वर्ग और आदित्य ने इस विश्व को व्यक्त किया. उत्पन्न होती हुई तथा अपने उत्पन्न कर्ता को जानती हुई प्रजाएं उस की स्तुति करती हैं. (१) प्र तद् वोचेदमृतस्य विद्वान् गन्धर्वो धाम परमं गुहा यत्. त्रीणि पदानि निहिता गुहास्य यस्तानि वेद स पितुष्पितासत्.. (२) अविनाशी ब्रह्म को जानते हुए आदित्य ब्रह्म के विषय के प्रवचन करें कि वह उत्कृष्ट स्थान एवं हृदय में स्थित है. उस के तीन भाग हृदय में छिपे हुए हैं. जो उन्हें जानता है, वह अपने पिता का भी पिता होता है. (२) स नः पिता जनिता स उत बन्धुर्धामानि वेद भुवनानि विश्वा. यो देवानां नामध एक एव तं संप्रश्नं भुवना यन्ति सर्वा.. (३) वह सूर्यात्मक परमात्मा हमारा पालनकर्ता, जन्मदाता एवं बंधु है. वह स्वर्ग आदि स्थानों एवं वहां प्राप्त होने वाले समस्त प्राणियों को जानता है. एकमात्र वही इंद्र आदि देवों का नाम रखने वाला है अथवा वह स्वयं ही इंद्र आदि नाम धारण करता है. इस प्रकार के परमात्मा को सभी प्राणी यह पूछते हुए प्राप्त होते हैं कि वह परमात्मा किस प्रकार का है? (३) परि द्यावापृथिवी सद्य आयमुपातिष्ठे प्रथमजामृतस्य. वाचमिव वक्तारि भुवनेष्ठा धास्युरेष नन्वे ३ षो अग्निः.. (४) ज्ञान होने के पश्चात तत्त्व ज्ञानी कहता है, “मैं ने तत्त्व ज्ञान होते ही द्यावा और पृथ्वी को सभी ओर से प्राप्त कर लिया है तथा मैं ही ब्रह्म से प्रथम उत्पन्न प्राणी एवं भौतिक पदार्थ हूं. जिस प्रकार वक्ता के समीपवर्ती जन वाणी को तत्काल सुन और समझ लेते हैं, उसी प्रकार यह परमात्मा संसार में स्थित, सब के पोषण का इच्छुक एवं वैश्वानर के रूप में सब का ebook converter DEMO Watermarks*