अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 815, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रादाः पितृभ्यः स्वधया ते अक्षन्नद्धि त्वं देव प्रयता हवींषी.. (४२) हे अग्नि! तुम उत्पन्न होने वाले मनुष्यों को जानने वाले हो. हमारे द्वारा स्तुति किए गए तुम हमारे सुगंधित एवं रस युक्त चरु, पुरोडाश आदि को देवों के लिए वहन करो. तुम ने पितृ देवताओं के लिए स्वधा शब्द के साथ काव्य नामक इंद्रियों को दिया है. उन पितरों ने तुम्हारे द्वारा दी हुई हवियों का उपभोग किया है. हे प्रकाश युक्त अग्नि! तुम हमारे द्वारा अधिक मात्रा में दी हुई हवियों का भक्षण करो. (४२) आसीनासो अरुणीनामुपस्थे रयिं धत्त दाशुषे मर्त्याय. पुत्रेभ्यः पितरस्तस्य वस्वः प्र यच्छत त इहोर्जं दधात.. (४३) हे पितरो! लाल रंग की माताओं की गोद में बैठे हुए एवं हवि का दान करने वाले मरणधर्मा यजमान के लिए धन प्रदान करो. वह प्रसिद्ध धन हम पुत्रों को प्रदान करो. हे पितरो! तुम इस भूलोक में हमारे लिए बलकारक अन्न धारण करो. (४३) अग्निष्वात्ताः पितर एह गच्छत सदःसदः सदत सुप्रणीतयः. अत्तो हवींषि प्रयतानि बर्हिषि रयिं च नः सर्ववीरं दधात.. (४४) पितर दो प्रकार के होते हैं. बर्हिषद एवं अग्निष्वात्त. इस मंत्र में अग्निष्वात्त पितरों को संबोधित किया गया है. हे अग्निष्वात्त पितरो! इस यज्ञ में आओ. हम ने पिता, पितामह और प्रपितामह आदि के लिए जो स्थान निश्चित किया है, उसे प्राप्त करो. कुशाओं पर जो हवियां शुद्ध की गई हैं, उन चरु, पुरोडाश आदि हवियों का भक्षण करो. हवि भक्षण से संतुष्ट तुम हमारे लिए सभी वीरों से युक्त धन प्रदान करो. (४४) उपहूता नः पितरः सोम्यासो बर्हिष्येषु निधिषु प्रियेषु. त आ गमन्तु त इह श्रुवन्त्वधि ब्रुवन्तु ते ऽ वन्त्वस्मान्.. (४५) हमारे द्वारा बुलाए गए पितर सोमरस पान के अधिकारी हैं. वे अपनी हवियों के रखे होने पर आएं एवं हमारे इस यज्ञ में हमारे स्तोत्र सुनें, हमारे प्रति पक्षपात पूर्ण वचन करें एवं हमारी रक्षा करें. (४५) ये नः पितुः पितरो ये पितामहा अनूजहिरे सोमपीथं वसिष्ठाः. तेभिर्यमः संरणणो हवींष्युशन्नुशद्भिः प्रतिकाममत्तु.. (४६) हमारे पिता के जो पितर हैं, उन को जन्म देने वाले अर्थात् हमारे बाबा अधिक धन वाले थे और क्रम से सोम पान करते थे. उन पितरों के साथ रमण करते हुए यम कामना करते हुए उन पितरों को हमारे द्वारा दिए हुए चरु, पुरोडाश आदि का भक्षण करें. (४६) ये तातृषुर्देवत्रा जेहमाना होत्राविद स्तोमतष्टासो अर्कैः. आग्ने याहि सहस्रं देववन्दैः सत्यैः कविभिर्ऋषिभिर्घर्मसद्भिः.. (४७) ebook converter DEMO Watermarks*