भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 817, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 817

युक्त इस भूलोक को धारण करता हुआ मैं हिंसा का आधार न बनूं. पितृ देवता उस प्रसिद्ध यूनी को तुम्हारे घर का निर्णायक करने के लिए स्थापित करते हैं. (५२) इममग्ने चमसं मा वि जिह्वरः प्रियो देवानामुत सोम्यानाम्. अयं यश्चमसो देवपानस्तस्मिन् देवा अमृता मादयन्ताम्.. (५३) हे अग्नि! खाने के इस साधन को टेढ़ा मत करो. यह चमचा देवों तथा मनुष्यों और सोमरस के पात्र देवों को प्रसन्न करने वाला है. देवता इस चमस के द्वारा अमृत पीते हैं. इस चमचे से मृत्यु रहित इंद्र आदि सभी देव प्रसन्न हैं. अथवा ऋषि के द्वारा बनाए हुए इस चम्मच में स्थिति स्वादिष्ट स्वाद होने के कारण सभी देव प्रसन्न हैं. (५३) अथर्वा पूर्ण चमसं यमिन्द्रायोबिभर्वाजिनीवते. तस्मिन् कृणोति सुकृतस्य भक्षं तस्मिन्निन्दुः पवते विश्वदानीम्.. (५४) अथर्वा नाम के ऋषि ने यज्ञ क्रिया वाले इंद्र को प्रसन्न करने के लिए सोमरस पीने का साधन यह चमस भरा है. ऋत्विजों का समूह इस चमस से हवन से बची हुई हवि का भक्षण करता है. अथर्वा ऋषि द्वारा बनाए हुए इस चम्मच के लिए चंद्रमा सदा सोमरस टपकाता है. (५४) यत् ते कृष्णः शकुन आतुतोद पिपीलः सर्प उत वा श्वापदः. अग्निष्टद् विश्वादगदं कृणोतु सोमश्च यो ब्राह्मणां आविdefault/वेश.. (५५) हे पुरुष! तेरे जिस अंग को काले रंग के पक्षी कौवे ने काट लिया है तथा विषैले दांतों वाली विशेष चींटियों ने, सांप ने अथवा बाघ ने काट लिया है, तेरे उस अंग को सर्वभक्षक अग्नि रोग रहित बनाएं. जिस सोम ने रस के रूप में ऋषियों में प्रवेश किया है, वह सोम तुझे रोग रहित बनाए. (५५) पयस्वतीरोषधयः पयस्वन्मामकं पयः. अपां पयसो यत् पयस्तेन मा सह शुम्भतु.. (५६) फल पकने पर समाप्त होने वाली ओषधियां हमारे लिए सार वाली हों. मेरे शरीर में स्थित जो बल है, वह भी सार वाला बने. जलों से संबंधित दूध का जो सार अंश है, वह फसलों और जड़ीबूटियों में स्थित सार अंश के साथ मुझे शोभन बनाए. जल के अधिकारी देव वरुण स्नान से मुझे शुद्ध करें. (५६) इमा नारीरविधवाः सुपत्नीराञ्जनेन सर्पिषा सं स्पृशन्ताम्. अनश्रवो अनमीवाः सुरत्ना आ रोहन्तु जनयो योनिमग्रे.. (५७) प्रेत के कुल में उत्पन्न ये नारियां वैधव्य से हीन श्रेष्ठ पतियों वाली होती हुई घृत से मिले हुए अंजन से स्पर्श प्राप्त करें. ये आंसू न बहाने वाली, रोगरहित और शोभन आभरणों वाली ebook converter DEMO Watermarks*

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