भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 818, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 818

हो कर संतान को जन्म देने के लिए स्वस्थ हों. (५७) सं गच्छस्व पितृभिः सं यमेनेष्टापूर्तेन परमे व्योमन्. हित्त्वावद्यं पुनरस्तमेहि सं गच्छतां तन्वा सुवर्चाः.. (५८) हे मृत पुरुष! तुम पिता, पितामह और प्रपितामह अर्थात् बाबा के साथ सपिंडी विधि के द्वारा मिल जाओ. अर्थात् तुम पितरों के मध्य स्थान प्राप्त करो. पितरों के राजा जो यम हैं, तुम उन के साथ भी हो जाओ. पितृलोक से भी श्रेष्ठ एवं आकाश में स्थित द्युलोक अर्थात स्वर्ग में इष्ट अर्थात् वेदों द्वारा स्पष्ट कहे गए यज्ञ, होम आदि, पूर्त अर्थात् स्मृति, पुराण एवं शास्त्रों द्वारा प्रेरित बावड़ी, कुआं, तालाब, देवमंदिर निर्माण आदि दोनों प्रकार के कर्मों से मिलो. तात्पर्य यह है कि स्वर्ग में उन दोनों प्रकार के कर्मों के फल का उपभोग करो. तुम पाप का त्याग कर के स्वर्गलोक में बने हुए उत्तम घर को प्राप्त करो. शोभन दीप्ति वाली तुम्हारी आत्मा स्वर्गलोक का सुख भोगने में समर्थ शरीर से मिल जाए. (५८) ये नः पितुः पितरो ये पितामहा य आविविशुरुर्व १ न्तरिक्षम्. तेभ्यः स्वराडसुनीतिर्नो अद्य यथावशं तन्वः कल्पयाति.. (५९) हमारे पिता के जो पितर अर्थात् पितामह आदि तथा हमारे गोत्र में उत्पन्न पितर विस्तीर्ण अंतरिक्ष में प्रविष्ट हैं, उन के शरीरों का आज राजा यम अपनेआप हमारी इच्छा के अनुसार निर्माण करें. (५९) शं ते नीहारो भवतु शं ते पृष्वाव शीत्याम्. शीतिके शीतिकावति ह्लादिके ह्लादिकावति. मण्डूक्य १ प्सु शं भुव इमं स्व १ ग्निं शमय.. (६०) हे प्रेत पुरुष! पाला तेरे लिए सुखकारी हो तथा जल तुझे सुखी करता हुआ वर्षा करे. हे शीतकारिणी जड़ीबूटियों से व्याप्त पृथ्वी तथा हे सुख उत्पन्न करने वाली मंडूकपर्णी ओषधि! तू इस दग्ध पुरुष को सुख प्रदान कर तथा जलाने वाली अग्नि को शांत कर. (६०) विवस्वान् नो अभयं कृणोतु यः सुत्रामा जीरदानुः सुदानुः. इहेमे वीरा बहवो भवन्तु गोमदश्ववन्मय्यस्तु पुष्टम्.. (६१) विवस्वान अर्थात् सूर्य हमें मृत्यु संबंधी भय से रहित करें. जीवन के कर्ता एवं शोभनदान वाले सुत्रामा नामक देव भी हमें मृत्यु के भय से मुक्त करें. इस लोक में हमारे पुत्र, पौत्र आदि अनेक वीर पुरुष हों. इस के अतिरिक्त बहुत-सी गायों वाला एवं बहुत से अश्वों वाला पोषक मेरे पास हो. (६१) विवस्वान् नो अमृतत्वे दधातु परैतु मृत्युरमृतं न ऐतु. इमान् रक्षतु पुरुषान जरिम्णो मो ष्वे षामसवो यमं गुः.. (६२) ebook converter DEMO Watermarks*

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