अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextयस्य ते विश्वमानुषो भूरेर्दत्तस्य वेदति. वसु स्पार्हं तदा भर.. (३) तुम्हारे द्वारा दिए गए जिस धन को तुम्हारे सभी उपासक प्राप्त करते हैं. तुम हमें वही धन प्रदान करो. (३) सूक्त-४४ देवता—इंद्र प्र सम्राजं चर्षणीनामिन्द्रं स्तोता नव्यं गीर्भिः. नरं नृषाहं मंहिष्ठम्.. (१) मैं ऐसे इंद्र की स्तुति करता हूं, जो मनुष्यों के प्रति सहनशील, अग्रगण्य, पूजने के योग्य, मनुष्यों के स्वामी और दयालु हैं. (१) यस्मिन्नुकथानि रण्यन्ति विश्वानि च श्रवस्या. अपामवो न समुद्रे.. (२) जिस प्रकार नीचे की ओर बहने वाले जल सागर में जाते हैं, उसी प्रकार उक्थ मंत्रों के द्वारा अन्न की इच्छा से किए जाने वाले यज्ञ इंद्र को प्राप्त होते हैं. (२) तं सुष्टुत्या विवासे ज्येष्ठराजं भरे कृत्वुम्. महो वाजिनं सनिभ्यः.. (३) मैं इंद्र को अपनी स्तुति से प्रसन्न करता हूं. इंद्र तेजस्वी शत्रुओं का भी हनन करने वाले हैं. वे स्तुति करने वालों को अन्न तथा यश प्रदान करते हैं. मैं इंद्र को हवि भी प्रदान करता हूं. (३) सूक्त-४५ देवता—इंद्र अयमु ते समतसि कपोत इव गर्भाधिम्. वचस्तच्चिन्न ओहसे.. (१) हे इंद्र! कबूतर जिस प्रकार गर्भ धारण करने वाली कबूतरी के समीप जाता है, उसी प्रकार तुम हमारी स्तुतियों को सुन कर हमारे पास आओ. (१) स्तोत्रं राधानां पते गिर्वाहो वीर यस्य ते. विभूतिरस्तु सूनृता.. (२) हे धन के स्वामी इंद्र! तुम्हारा यह नाम सत्य हो. हमारी स्तुतियां तुम्हें हमारे पास लाने में समर्थ हैं. (२) ऊर्ध्वस्तिष्ठा न ऊतये ऽ स्मिन् वाजे शतक्रतो. समन्येषु ब्रवावहै.. (३) हे सैकड़ों कर्म करने वाले इंद्र! तुम हमारी रक्षा करने के लिए ऊंचे स्थान पर खड़े हो जाओ. अन्य पुरुष हम से द्वेष करते हैं. हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. (३) eBook converter DEMO Watermarks*