अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextसूक्त-५० देवता—इंद्र कन्नव्यो अतसीनां तुरो गृणीत मर्त्यः. नही न्वस्य महिमानमिन्द्रियं स्वर्गृणन्त आनशुः.. (१) जो इंद्र मरणशील मनुष्यों का आकार धारण करने वाले हैं, हे स्तोताओ! उन की स्तुति करो. तुम इंद्र की महिमा का पूर्ण रूप से वर्णन न कर सकोगे और थोड़ा गान कर सकोगे, इस से भी तुम्हें स्वर्ग की प्राप्ति होगी. (१) कदु स्तुवन्त ऋतयन्त देवत ऋषिः को विप्र ओहते. कदा हवं मघवन्निन्द्र सुन्वतः कदु स्तुवत आ गमः.. (२) हे इंद्र! कौन सा ऋषि तुम्हारे संबंध में तर्क करता है? किस कारण तुम सोमरस वाले स्तोता के बुलाने पर ही आते हो? सत्य की इच्छा करने वाले देवों का समूह किस कारण तुम्हारी स्तुति करता है? (२) सूक्त-५१ देवता—इंद्र अभि प्र वः सुराधसमिन्द्रमर्च यथा विदे. यो जरितृभ्यो मघवा पुरूवसुः सहस्रेणेव शिक्षति.. (१) हे स्तोताओ! उन स्तोत्रों का उच्चारण करो जो इंद्र को मेरे समीप लाने के कारण बनें. वे इंद्र सहस्र संख्या वाला विशाल धन देते हैं. (१) शतानीकेव प्र जिगाति धृष्णुया हन्ति वृत्राणि दाशुषे. गिरेरिव प्र रसा अस्य पिन्विरे दत्राणि पुरुभोजसः.. (२) हवि देने वाले जो यजमान अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर के उन का वध करते हैं, उन यजमानों के लिए इंद्र का स्वर्ण रूप धन इस प्रकार बरसता है, जिस प्रकार पर्वत से जल निकलता है. (२) प्र सु श्रुतं सुराधसमर्चा शक्रमभिष्टये. यः सुन्वते स्तुवते काम्यं वसु सहस्रेणेव मंहते.. (३) जो स्तोता यज्ञ में अभिषव करता है, इंद्र उसे हजार संख्या वाला धन देते हैं. हे स्तोता! तुम उन्हीं इंद्र की भलीभांति पूजा करो. (३) शतानीका हेतयो अस्य दुष्टरा इन्द्रस्य समिषो महीः. गिरिंन भुज्मा मघवत्सु पिन्वते यदीं सुता अमन्दिषु.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*