अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 996, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंकस्ते मद इन्द्र रन्त्यो भूद् दुरो गिरो अभ्यु१ग्रो वि धाव. कद् वाहो अवांगुप मा मनीषा आ त्वा शक्यामुपमं राधो अन्नैः.. (३) हे इंद्र! हमें वह स्तोम अर्थात् मंत्र समूह कौन देगा जो तुम्हें प्रसन्न कर सके? कौन सा अश्व तुम्हें मेरे पास लाएगा? तुम मेरा स्तोम सुनने के लिए आओ. तुम उपमेय हो, मैं तुम्हें हवियों द्वारा प्रसन्न करने में सफलता प्राप्त करूंगा. (३) कदु द्युम्नमिन्द्र त्वावतो नॄन् कया धिया करसे कन्न आगन्. मित्रो न सत्य उरुगाय भृत्या अन्ने समस्य यदसन्मनीषाः.. (४) हे इंद्र! तुम किस बुद्धि से अपने आश्रितों को यशस्वी बनाते हो? तुम महान कीर्ति वाले हो, इसलिए सच्चे साथ के समय इस यज्ञ को अन्न की वृद्धि से संपन्न करो. (४) प्रेर्य सूरो अर्थं न पारं ये अस्य कामं जनिधा इव ग्मन्. गिरश्च ये ते तुविजात पूर्वीर्नर इन्द्र प्रतिशिक्षन्त्यन्नैः.. (५) हे इंद्र! जो रश्मियां इस यजमान की इच्छा पूर्ति के लिए माता के समान मिलती हैं, उन रश्मियों में हमें अर्थ के समान पार करो. पवन देव इसे अन्न प्रदान करें. हे इंद्र! तुम अपनी प्राचीन स्तुतियां इस की बुद्धि में लाओ. (५) मात्रे नु ते सुमिते इन्द्र पूर्वी द्यौर्मज्मना पृथिवी काव्येन. वराय ते घृतवन्तः सुतासः स्वाद्मन् भवन्तु पीतये मधूनि.. (६) हे इंद्र! घृत मिला हुआ सोमरस तुम्हारे लिए उत्तम स्वाद वाला प्रतीत हो. पृथ्वी और आकाश अपने में समर्थ एवं उत्तम काव्य रचना के लिए उत्तम बुद्धि वाला हो. (६) आ मध्वो अस्मा असिचन्नमत्रमिन्द्राय पूर्णं स हि सत्यराधाः. स वावृधे वरिमन्ना पृथिव्या अभि क्रत्वा नर्यः पौंस्यैश्च.. (७) इंद्र के लिए यह पात्र मधुर रस से पूर्ण किया गया है. वे इंद्र अपने बल से ही पृथ्वी पर प्रबुद्ध होते हैं तथा सत्य के द्वारा उन्हीं की पूजा होती है. (७) व्यानळिन्द्रः पृतनाः स्वोजा आस्मै यतन्ते सख्याय पूर्वीः. आ स्मा रथं न पृतनासु तिष्ठ यं भद्रया समुत्या चोदयासे.. (८) इंद्र का बल श्रेष्ठ है. इंद्र सेनाओं में व्याप्त होते हैं. अनगिनत वीर इन के मैत्रीभाव की कामना करते हैं. हे इंद्र! तुम जिस सुमति के द्वारा प्रेरणा देते हो, रथ के समान उसी सुमति से तुम हमारे वीरों में व्याप्त होओ. (८) सूक्त-७७ देवता—इंद्र ebook converter DEMO Watermarks*