आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
by वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक
Source: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (origin)
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गुणी चेतना धातु से आकाशादि गुणपंचक की उत्पत्ति ..... ९४
अभिव्यक्ति के समय आकाशादिकों का अप्रतीघातत्वादि मात्रत्व ..... ९६
गुर्वादि गुणों की प्रधानता ..... ९७
गुर्वादि गुणों और वातपित्त स्नेष्माओं का गुणपंचक में समन्वय ..... ९८
शब्द स्पर्शादि, ' कारण गुण ' नहीं है ..... ९८
सत्व का करणोपादानत्व और ज्ञातृत्व कर्तृत्व में जन्यजनकता का निषेध ..... ९९
मातृजादि भाव, महाभूत विकार हैं ..... ९९
इंद्रिय और इंद्रियार्थों का पांच भौतिकत्व ..... १००
षड्धातु वाद में कर्म को कृत मानते हैं ..... १०१
भद्रकाप्य का कर्मवाद ..... १०५
षड्धातुवाद का प्रतिवाद व कर्म के पुरुष रोगोत्पादकत्व का समर्थन ..... १०५
भद्रकाप्य के कर्मवाद में कर्म को 'अकृत' मानते हैं... १०५
प्रमाण चतुष्टय के द्वारा पुनर्भव की सिद्धि ..... १०६
गर्भावकांति में पुनर्भव ..... ११०
भद्रकाप्य का शब्दादि गुणप्रधान पंचात्मक लोकपक्षीयत्व १११
भारद्वाज का स्वभाववाद
कर्म का प्रतिवाद और स्वभाव का समर्थन ..... ११२