भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 486 में से

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६४बौधायन-धर्मसूत्रम्[ शुद्धिप्रकरणम्

बराबर भूमि के भाग को चाहे वह झाड़ा गया हो, यदि उस भूमि पर कोई अपवित्र पदार्थ दृष्टिगोचर न हों तो पवित्र कर देता ॥ १ ॥

अष्ठिबिन्दुः जललवः पातितः शुष्यतीति अन्तर्णीतणिजर्थो द्रष्टव्यः । समूढं सम्मार्जन्‍या । असमूढं स्पर्शादिशिष्टं देशं गोचर्ममात्रप्रमाणं यत्र गोशतमावेष्ट-यति, यत्र देशे, अमेध्यं पुरीषादि न लक्ष्यते तमिति शेषः ॥ १ ॥

परोक्षमधिश्रितस्याऽन्नस्याऽवद्योत्याऽभ्युक्षणम् ॥ २ ॥

**अनु०—**खाने वाले की दृष्टि से परोक्ष में पकाये गये अन्न को जलती हुई अग्नि दिखानी चाहिए तथा उसके चारो ओर जल छिड़कना चाहिए ॥ २ ॥

**टि०—**ब्यूह्लरे ने अपने अनुवाद में यह सुझाया है कि यहाँ परोक्ष पकाये गये अन्न से शूद्र द्वारा पकाये गये अन्न का तात्पर्य है "ऐसा प्रतीत होता है कि यह नियम आर्यों के निरीक्षण के बिना ही शूद्रों द्वारा पकाये गये अन्न की ओर संकेत करता है । क्योंकि आपस्तम्ब सूत्रों में भी उसी शब्द 'परोक्षम्' 'आँख से परे' का प्रयोग है और निश्चित रूप से उसी स्थिति का निर्देश है, इस बात के लिए कोई कारण नहीं कि ब्राह्मण रसोइए द्वारा बनाये गये भोजन को खाने से पहले पवित्र किया जाय ।"—ब्यूह्लरेर, वही, पृ० १७२ टि० किन्तु गोविन्द स्वामी ने यह सुझाया है कि शङ्का होने-पर ही उपर्युक्त विधि से भोजन की शुद्धि की जाती है: 'शङ्का-पदमापन्नस्य शुद्धिर्भवति ।' शङ्का न होने की स्थिति में ऊपर बतायी गयी १.९.९ की तीन विधियों से शुद्धि हो ही जाती है ।

परोक्षं भोक्तुरसमक्षमधिश्रितस्य पक्वस्याऽन्नस्याऽवद्योत्याऽभ्युक्षणं शङ्कापद-मापन्नस्य शुद्धिर्भवति । अनाशङ्कितस्य तु 'त्रीणि देवाः पवित्राणि' ( १.९.९. ) इत्युक्तम् ॥ २ ॥

तथापणेयानां च भक्ष्याणाम् ॥ ३ ॥

**अनु०—**इसी प्रकार बाजार की खाने योग्य वस्तुओं की भी शुद्धि होती है ॥३॥

**टि०—**बाजार की खाद्य वस्तुओं के अन्तर्गत गोविन्द ने लड्डु, अपूप, मोदक आदि तैयार बनी हुई मिठाइयों का उल्लेख किया है ।

आपणं वाणिजां पण्यस्थानम् ; क्रयविक्रयस्थानमित्यर्थः । तत्र भवा आप-णेया भक्ष्या ^१लड्डुकापूपसक्तुमोदकादयः उत्तरापथवासिनां प्रसिद्धाः । तेषा-मवद्योत्याऽभ्युक्षणम् । तथा च शङ्खः—"आकरजानामभ्युक्षितानां घृतेनाऽभि-घारितानामभ्यवहरणीयानां पुनः पचनमेव स्नेहद्रव्यसमानाम् इत्यादिना ॥३॥


१. मण्डकेति. क. पु.

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