बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
पृष्ठ 133, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकादशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ८१
अनु०—प्रपितामह, पितामह, पिता, स्वयम् एक ही माता पिता से उत्पन्न अपने भाई, सवर्ण पत्नी से उत्पन्न पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र को, सपिण्ड कहा गया है, किन्तु प्रपौत्र के पुत्र को सपिण्डों में नहीं गिना जाता, इनमें भी पुत्र और पौत्र पिता के साथ अविभक्तदाय वाले होते हैं ॥ ७ ॥
टि०—गोविन्द स्वामी ने इस सूत्र की व्याख्या में अर्थविषयक कठिनाई नहीं दूर की है । 'पुत्रपौत्रमविभक्तदायम्' विशेषतः विचारणीय है। ब्यूह्लर ने कोले-ब्रूक के 'दायभाग' ११.१.३७ का उल्लेख करते हुए पाठभेद का निर्देश किया है, 'तेषां च पुत्रपौत्रम्' 'अविभक्तदायादान्' अन्य पाठान्तर हैं। इसका ब्यूह्लर ने यह अर्थ सुझाया है कि पिता अपने पुत्र और पौत्र के साथ अविभक्त रूप से श्राद्ध के समय चौथे पुरुष द्वारा दिये गये पिण्डदान को ग्रहण करता है।
सापिण्ड्य एव किञ्चिद्वक्तव्यमस्तीति मत्वाऽत्रापि चेत्याह । उक्तस्यैव विस्तारोऽयं प्रपितामह इत्यादि । परिभाषा चैषा द्रष्टव्या ॥ ७ ॥
विभक्तदायानपि सकुल्यानाचक्षते ॥ ८ ॥
अनु०—विभक्तदाय वाले पुरुषों को सकुल्य कहते हैं ॥ ८ ॥
टि०—गोविन्द स्वामी के अनुसार सपिण्डों में ही जब सम्बन्ध विशेष का ज्ञान नहीं होता तो उन्हें सकुल्य कहते हैं । सम्बन्धमात्र का ज्ञान होने पर सकुल्य होते हैं। 'जीमूतवाहन के अनुसार सकुल्या प्रपितामह के पहले के तीन तथा प्रपौत्र के बाद के तीन पुरुषों को कहते हैं ।"—ब्यूह्लर की टिप्पणी । इस दृष्टि से ब्यूह्लर की पूर्ववर्ती सूत्र की टिप्पणी समीचीन प्रतीत होती है ।
एषा च परिभाषा । एतदुक्तं भवति—विभक्ताविभक्तशब्दौ व्यत्यस्तौ कार्यो । सम्बन्धविशेषज्ञाने सति सपिण्डा उच्यन्ते । संबंधमात्रज्ञाने सकुल्याः । अतश्च सकुल्या अपि सपिण्डा एव, द्रव्यपरिग्रहे तु विशेषोऽस्ति ॥ ८ ॥
तदाह—
असत्स्वन्येषु तद्गामी ह्यर्थो भवति ॥ ९ ॥
अनु०--जब (औरस पुत्र आदि ) कोई सम्बन्धी नहीं रह जाता तो मृत पुरुष की सम्पत्ति सपिण्डों को प्राप्त होती है ॥ ९ ॥
अन्येष्वौरसादिषु पुत्रेषु ॥ ९ ॥
सपिण्डाभावे सकुल्यः ॥ १० ॥
अनु०—सपिण्डों के अभाव में वह सम्पत्ति सकुल्य को प्राप्त होती है ॥ १० ॥
९ बौ० ध०