बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८२ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ सापिण्ड्यम्
ऋज्वेवत् ॥ १० ॥
तदभावे पिताऽऽचार्योऽन्तेवास्यृत्विग्वा हरेत् ॥ ११ ॥
**अनु०—**सकुल्यों के अभाव में सम्पत्ति पिता तुल्य आचार्य, उनके अभाव में अन्तेवासी शिष्य और उसके अभाव में यज्ञ करानेवाला ऋत्विज् सम्पत्ति को ग्रहण करे ॥ ११ ॥
**टि०—**पिताऽऽचार्यं से पितृस्थानीय या पितातुल्य आचार्य का अर्थ ग्रहण किया गया है। आचार्य पिता-स्थानीय होता है इस सम्बन्ध में गोविन्द स्वामी ने वसिष्ठ ध० सू० के वचनों का उल्लेख किया है। इस सूत्र में 'वा' शब्द यह प्रदर्शित करता है कि आचार्य, शिष्य और ऋत्विज् में पूर्व के अभाव में बाद वाला अधिकारी होता है।
वाशब्दो विकल्पार्थः । स च व्यवस्थया । सा च पूर्वपूर्वाभावे उत्तरोत्तर इति । पिता पितृस्थानीयः । अनेन पुत्रस्थानीयोऽपि लक्ष्यते । स च दाहादिसंस्कारकर्ता; कथम् ? तथाऽऽह वसिष्ठः—'सपिण्डाः पुत्रस्थानीया वा तस्य धनं विभजेरन्' इति । इतरथा सकुल्याभावे पिता गृह्णीयादित्युक्ते पूर्वापरविरोधस्यात् । तस्मात् पितृशब्देन पितृस्थानीयः पुत्रस्थानीयो ग्रहीतव्यः ॥ ११ ॥
तदभावे राजा तत्स्वं त्रैविद्यवृद्धेभ्यः संप्रयच्छेत् ॥ १२ ॥
**अनु०—**उसके अभाव में राजा ब्राह्मण के धर्म को तीनों वेदों के विद्वानों को प्रदान करे ॥ १२ ॥
**टि०—**सूत्र में 'सत्स्वम्' से गोविन्द स्वामी ने सत् से ब्राह्मण का अर्थ लेकर ब्राह्मण का धन राजा वेदविद्या के विद्वानों को दे, अन्य वर्ण के ऐसे व्यक्ति के धन को राजा स्वयं ग्रहण कर सकता है। 'सत्स्वम्' के स्थान पर 'तत्स्वम्' भी पाठ है जिसका अर्थ होगा, 'उस धन को' या 'उस व्यक्ति के धन को' । किन्तु अगले सूत्र में ब्राह्मण के धन के विषय में तो स्पष्टतः विधान कर ही दिया गया है।
सदिति ब्राह्मणं प्रति निर्दिशति । इतरवर्णस्वं तु सर्वाभावे राजैवाऽऽददीत ॥ १२ ॥
न त्वेव कदाचित्स्वयं राजा ब्राह्मणस्वमाददीत ॥ १३ ॥
**अनु०—**किन्तु राजा ब्राह्मण के धन को कदापि स्वयं न ग्रहण करे ॥ १३ ॥