भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

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पञ्चमः खण्डः ] चतुर्थप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ३८७

मन्त्र से दधि ग्रहण करे । 'शुक्रमसि ज्योतिरसि तेजोऽसि' (तैत्तिरीय संहिता १. १. १०) मन्त्र से घृत ग्रहण करे तथा 'देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्' मन्त्र से कुशोदक ग्रहण करे ॥ १२ ॥ तथा—

गोमूत्रभागस्तस्यार्धं शकृत्क्षीरस्य त्रयम् ।
द्वयं दध्नो घृतस्यैकः एकश्च कुशवारिणः ।
एवं सान्तपनः कृच्छ्रः श्वपाकमपि शोधयेत् ॥१३॥

**अनु०—**गोमूत्र का अंश जितना हो उसके आधा अंश गोबर, तीन भाग दूध, दो भाग दही, एक भाग घृत और एक भाग कुशोदक मिलावे । इस प्रकार सान्तपन नाम कृच्छ्र व्रत चण्डाल तक को भी शुद्ध कर देता है ॥ १३ ॥

**टि०—**गोविन्द स्वामी ने इसे इस प्रकार स्पष्ट किया है कि घृत और कुशोदक बराबर परिमाण में होना चाहिए, उससे दूना दधि और तिगुना दूध, चौगुना गोबर और पाँच गुना गोमूत्र हो इन छहों को मिलाकर एक दिन पान करे और दूसरे दिन उपवास करे तो दो रात्रियों का सान्तपन कृच्छ्र व्रत होता है ।

एतदुक्तं भवति-घृतं कुशोदकं च तुल्यपरिमाणम् । घृताद्विगुणं दधि, तस्मादेव त्रिगुणं क्षीरम् । तस्मादेव चतुर्गुणः शकृत् । पञ्चगुणं गोमूत्रमिति । गमूत्रादिषट्कमेकीकृत्यैकस्मिन्नेवाह्नि पीत्वाऽपरेद्युरुपवासः । एवं द्विरात्रस्सान्तपनो भवति । आह च याज्ञवल्क्यः—

कुशोदकं दधि क्षीरं गोमूत्रं गोशकृद्धृतम् ।
प्राश्याऽपरेऽह्न्युपवसेत्कृच्छ्रं सान्तपनं चरन् ॥ इति ॥

अयमपरस्सान्तपनप्रकारः—

गोमूत्रं गोमयं क्षीरं ¹दधि सर्पिः कुशोदकम् ।
पञ्चरात्रं तदाहारः पञ्चगव्येन शुद्ध्यति ॥ १४ ॥

**अनु०—**गाय का मूत्र, गोबर, दूध, दही, घृत तथा कुशोदक इनका पाँच (दिन (और रात्रि आहार करने वाला पञ्चगव्य से शुद्ध हो जाता है ॥ १४ ॥
पञ्चगव्यविधानेनेति शेषः ॥ १४ ॥

यतात्मनोऽप्रमत्तस्य द्वादशाहमभोजनम् ।
पराको नाम कृच्छ्रोऽयं सर्वपापप्रणाशनः ॥ १५ ॥


१. अपश्चै व घृतं तथा इति ग पु० ।