बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
पृष्ठ 443, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमः खण्डः ] चतुर्थप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ३८९
अनु०—यदि पूर्णतः चित्त को लगाकर कोई विप्र प्रातः चार ग्रास भोजन करता है और सायंकाल सूर्य अस्त होने पर चार ग्रास भोजन करता है तो वह व्रत शिशुचान्द्रायण कहा जाता है ॥ १८ ॥
अष्टावष्टौ मासमेकं पिण्डान्मध्यन्दिने स्थिते ।
नियतात्मा हविष्यस्य यतिचान्द्रायणं चरेत् ॥ १९ ॥
अनु०—यदि एक मास तक प्रतिदिन केवल मध्याह्न में आठ-आठ ग्रास यज्ञ के योग्य हवि का भोजन करे तथा इन्द्रियों पर संयम रखे, तो वह यतिचान्द्रायण व्रत होता है ॥ १९ ॥
यथाकथंचिद्पिण्डानां द्विजस्तिस्रस्त्वशीतयः ।
मासेनाऽश्नन् हविष्यस्य चन्द्रस्यैति सलोकताम् ॥ २० ॥
अनु०—यदि कोई द्विज एक मास में यज्ञ के योग्य अन्न का अस्सी के तिगुने ( दो सौ चालीस ) ग्रास भोजन करता है तो वह चन्द्रमा के लोक को ही प्राप्त करता है ॥ २० ॥
चत्वारिंशदधिकशतपिण्डान्यथाकथञ्चिन् मासेनाऽश्नीयात् तिस्रोऽशीतय इति द्वितीयार्थे प्रथमा । तदैन्दवं नाम चान्द्रायणम् ॥ १८-२० ॥
यथोद्यंश्चन्द्रमा हन्ति जगतस्तमसो भयम् ।
तथा$^१$ पापाद्भयं हन्ति द्विजश्चान्द्रायणं चरन् ॥ २१ ॥
अनु०—जिस प्रकार उगता हुआ चन्द्रमा संसार के अन्धकार के भय को दूर करता है, उसी प्रकार चान्द्रायण व्रत करने वाला द्विज पाप से होने वाले भय को नष्ट कर देता है ॥ २१ ॥
सर्वप्रकारस्याऽपि चान्द्रायणस्य प्रशंसैषा ॥ २१ ॥
कणपिण्याकतक्राणि तथा चाऽपोऽनिलाशनः ।
एकत्रिपञ्चसप्तैति पापघ्नोऽयं तुलापुमान् ॥ २२ ॥
अनु०—जो व्यक्ति एक दिन चावल के कण खाकर, तीन दिन तिलका पिण्याक खाकर पांच दिन मट्ठा पीकर, सात दिन जल पीकर और एक दिन वायु का भक्षण कर व्रत करता है वह पापों को नष्ट करने वाले तुलापुमान् नाम का व्रत करता है ॥ २२ ॥
१. एवं पापाद् इति ग पु० । पापान्नचापि इति घं पु० ।