बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३९२ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ कृच्छ्रविशेषः
एवं ब्रह्मकृतं कूर्चं मासि मासि चरन् द्विजः ।
सर्वपापविशुद्धात्मा ब्रह्मलोकं स गच्छति ॥ इत्यादि ॥ २५ ॥
अमावास्यां निराहारः पौर्णमास्यां तिलाशनः ।
शुक्लकृष्णकृतात्पापान्मुच्यतेऽब्दस्य पर्वभिः ॥ २६ ॥
**अनु०—**जो व्यक्ति अमावास्या को उपवास करता है और पौर्णमासी को केवल तिलों का भक्षण करता है वह एक वर्ष में शुक्लपक्षों तथा कृष्णपक्षों में किये गये पापों से मुक्त हो जाता है ॥ २६ ॥
सांवत्सरिकमेतद्व्रतम् , तस्मादब्दस्य पर्वभिरसम्बन्धः । न पुनश्शुक्लकृष्णकृतमिति । एवं च तस्मिन् संवत्सरे मधुमांसवर्जनमधश्शयनमित्यादि द्रष्टव्यम् ॥ २६ ॥
भैक्षाहारोऽग्निहोत्रिभ्यो मासेनैकेन शुद्ध्यति ।
यायावरवनस्थेभ्यो दशभिः पञ्चभिर्दिनैः ॥ २७ ॥
**अनु०—**अग्निहोत्रियों से प्राप्त भिक्षा का भक्षण करने वाला एक मास में शुद्ध होता है। जो यायावर गृहस्थ से प्राप्त भिक्षा का भक्षण करता है वह दस दिन में शुद्ध होता है तथा वानप्रस्थ से प्राप्त भिक्षा के भक्षण से पाँच दिन में ही शुद्ध हो जाता है ॥ २७ ॥
यायावरेभ्यो भैक्षाहारो दशभिर्दिनैः, वनस्थेभ्यः पञ्चभिर्दिनैः इति योजना । अन्यच्च व्याख्यातम् । एतेऽपि च त्रयः कृच्छ्राः ॥ २७ ॥
एकाहं धनिनोऽन्नेन दिनेनैकेन शुद्ध्यति ।
कापोतवृत्तिनिष्ठस्य पीत्वाऽपश्शुद्ध्यते द्विजः ॥ २८ ॥
**अनु०—**जिस व्यक्ति के पास केवल एक दिन भर के लिए अन्न है उसके द्वारा दिये गये अन्न से एक दिन में ही शुद्धि हो जाता है। कापोतवृत्ति से जीविका निर्वाह करने वाले व्यक्ति द्वारा दिये गये जल को भी पीकर द्विज शुद्ध हो जाता है ॥ २८ ॥
एतावपि च द्वौ कृच्छ्रौ ॥ २८ ॥
ऋग्यजुस्सामवेदानां वेदस्याऽन्यतमस्य वा ।
पारायणं त्रिश्भ्यस्येदनश्नन् सोऽतिपावनः ॥ २९ ॥
**अनु०—**यदि बिना भोजन किये ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद का अथवा किसी एक वेद का तीन बार पारायण करे तो वह अत्यन्त पवित्र करने वाला होता है ॥ २९ ॥