बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः ३३
भैक्षस्याऽचरणे दोषः पावकस्याऽसमिन्धने । सप्तरात्रमकृत्वैतदव- कीर्णिव्रतं चरेत् ॥ तमेवं विद्वांसमव चरन्तं सर्वे वेदा आविशन्ति ॥९॥
अनु०—ब्रह्मचर्य धारण करते हुए ब्राह्मण सभी भूतों में चार प्रकार से प्रवेश करता है। अपने एक चतुर्थांश से अग्नि में, एक चतुर्थांश द्वारा मृत्यु में, एक चतुर्थांश द्वारा आचार्य में प्रवेश करता है, चौथा चतुर्थांश आत्मा में ही अवशिष्ट रह जाता है। जब वह अग्नि पर समिध् का आधान करता है तब वह उसके द्वारा अपने उस अंश को खरीद लेता है जो अग्नि में प्रविष्ट हुआ रहता है; उस अंश का संस्कार करके उसे अपने में ही स्थापित करता है और वह अंश उसमें प्रवेश कर जाता है। जब वह अपने को दरिद्र बनाकर, लज्जा का परित्याग करके, भिक्षा मांगता और ब्रह्मचर्य का पालन करता है, तब वह उसके द्वारा अपने उस पाद को खरीद लेता है जो मृत्यु में प्रविष्ट हुआ रहता है; उसका संस्कार करके उसे अपने में स्थापित करता है और वह अंश उसमें प्रवेश करता है। जब वह आचार्य के आदेश का पालन करता है, तब वह उसके द्वारा आचार्य में प्रविष्ट अपने चतुर्थांश का परिक्रमण कर लेता है, उस अंश का संस्कार कर उसे अपने में स्थापित करता है और वह अंश उसमें प्रवेश कर जाता है। जब वह वेद का अध्ययन करता है तब वह उसके द्वारा उस अंश का परिक्रयण कर लेता है जो आत्मा में प्रविष्ट हुआ रहता है। उसका संस्कार कर उसे अपने में स्थापित करता है। और वह अंश उसमें प्रवेश कर जाता है। (ब्रह्मचर्य-समाप्ति पर) स्नान करने के बाद भिक्षाचरण न करे। यदि स्नान करने के बाद भी भिक्षाचरण करे तो यदि कोई अन्य ऐसी स्त्री न हो जिससे भिक्षा माँगी जा सके तो वह अपनी गुरुपत्नी से या अपनी माता से भिक्षा मांगे। बिना भिक्षा मांगे सांतवीं रात्रि न बिताये।
भिक्षाचरण न करने पर तथा अग्नि पर समिदाधान न करने पर दोष होता है। यदि वह सात दिन-रात्रि तक भिक्षाचरण और समिदाधान न करे तो ब्रह्मचर्य भङ्ग का अवकीर्णिव्रत प्रायश्चित्तस्वरूप करे। जो इस प्रकार जानता है और इस प्रकार आचरण करता है उसमें सभी वेद प्रवेश करते हैं ॥ ९ ॥
टि०—इस अंश में "अपि ह वा भिक्षां चरत्यपि···क्रियाभ्यः" का अर्थ स्पष्ट नहीं है।
ब्राह्मणग्रहणं त्रैवर्णिकोपलक्षणार्थम् । भूतशब्देनाग्नि मृत्युमाचार्यमात्मानं चाऽऽह । पादश्च तेजः आयुः प्रज्ञा बलमिति । तत्रायैस्त्रिभिः पादैरग्नयादीन् प्रविशति । अतस्स्वात्मन्येवाऽस्य चतुर्थः पादः परिशिष्यते । एवंभूतं विप्रं सर्वे वेदा आविशन्ति ॥ ९ ॥
६ बौ० गृ०