बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३४ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ब्रह्मचारिधर्माः
न केवलं ब्रह्मचर्यानुष्ठाने ब्रह्मचारिणो वेदग्रहणमेव फलम्। किं तर्हि स्नातकावस्थायां दीप्तिरपोत्याह—
यथा ह वा अग्निससमिद्धो रोचत एवं ह वा एष स्नात्वा रोचत य एवं विद्वान् ब्रह्मचर्यं चरतीति ब्राह्मणमिति ब्राह्मणम् ॥ १० ॥
अनु०—जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि चमकती है, उसी प्रकार ब्रह्मचर्यावसान का स्नान करने पर वह व्यक्ति चमकता है जो इस प्रकार जानते हुए ब्रह्मचर्य का आचरण करता है। ऐसा ब्राह्मण का वाक्य है ॥ १० ॥
'यथा ह वा' इत्यादि 'चरति' इत्येतदन्तं ब्राह्मणम्। अन्यत्राप्येवंजातीय-कनिपातप्रयोगे ब्राह्मणपाठ इति द्रष्टव्यम्। रोचते दीप्यते ॥ १० ॥
इति प्रथमप्रश्ने द्वितीयाध्याये चतुर्थः खण्डः।
प्रथमप्रश्ने तृतीयाध्याये पञ्चमः खण्डः
'स्नात्वा रोचते' ( १. ४. १० ) इति स्नानप्रयुक्तान् धर्मानाह—
अथ स्नातकस्य ॥ १ ॥
अनु०—अब स्नातक के आचार-नियमों का वर्णन किया जाता है ॥ १ ॥
टि०—स्नातक तीन प्रकार के बताये गये हैं—वेदस्नातक, व्रतस्नातक, वेदव्रत स्नातक। समावर्तन के बाद ही गृहस्थाश्रम में प्रवेश करना चाहिए और तत्काल विवाह करना चाहिए, क्योंकि बिना आश्रम के एक दिन भी नहीं रहना चाहिए। इस विषय में स्मृति का आदेश द्रष्टव्य है, किन्तु यहाँ अविवाहित स्नातक के विषय में नियम दिया गया है। 'यावद् वेदस्वीकरणं ब्रह्मचारिणो नियमानुपालनम् अत ऊर्ध्वं धर्मजिज्ञासावस्थायां स्नातकधर्मावसरः"—गोविन्दस्वामी।
प्राक्पाणिग्रहणाद्धर्मा वक्ष्यन्त इति शेषः। त्रयो हि स्नातका भवन्ति —वेद-स्नातको व्रतस्नातको वेदव्रतस्नातक इति। ननु समावर्तनानन्तरमेव भार्या-मधिगच्छेत्, न तु तूष्णीं स्थातव्यम्। तथा हि—
अनाश्रमी न तिष्ठेत दिनमेकमपि द्विजः।
आश्रमेण विना तिष्ठन् प्रायश्चित्तीयते नरः॥
जपे होमे तथा दाने स्वाध्याये विप्रभोजने।
नाऽसौ फलमवाप्नोति कुर्वाणोऽप्याश्रमच्युतः॥ इति।