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बेताल पच्चीसी

बेताल पच्चीसी

Betal Pachisi

by महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट

DevanagariHindipublished151 pages

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अपनी तपस्या से उसने उसे जीवित किया है, अतः उस पर उसका ही अधिकार है।

इतनी कहानी सुनाकर बेताल ने विक्रमादित्य से कहा—"राजन ! उनके इस विवाद का निर्णय करके तुम ठीक-ठीक बताओ कि वह स्त्री किसकी होनी चाहिए ? यदि तुम जानते हुए भी न बतला पाए तो तुम्हारा सिर फटकर अनेक टुकड़ों में बंट जाएगा।"

बेताल द्वारा कहे हुए शब्दों को सुनकर राजा विक्रमादित्य ने कहा—'हे बेताल ! जिस योगी ने कष्ट उठाकर भी, मंत्र-तंत्र से उसे जीवित किया, वह तो उसका पिता हुआ। ऐसा काम करने के कारण उसे पति नहीं होना चाहिए और जो ब्राह्मण उसकी अस्थियां गंगा में डाल आया था, उसे स्वयं को उस स्त्री का पुत्र समझना चाहिए। किंतु, जो उसकी भस्म की शैय्या पर आलिंगन करते हुए तपस्या करता रहा और श्मशान में ही बना रहा, उसे ही उसका पति कहना चाहिए, क्योंकि गाढ़ी प्रीति वाले उस ब्राह्मण ने ही पति के समान आचरण किया था।"

"तूने ठीक उत्तर दिया राजा किंतु ऐसा करके तूने अपना मौन भंग कर दिया। इसलिए मै चला वापस अपने स्थान पर।" यह कहकर बेताल उसके कंधे से उतरकर लोप हो गया।

राजा ने भिक्षु के पास ले जाने के लिए, उसे फिर से पाने के लिए कमर कसी क्योंकि धीर वृत्ति वाले लोग प्राण देकर भी अपने दिए हुए वचन की रक्षा करते हैं। तब राजा फिर से उसी स्थान की ओर लौट पड़ा जहां से वह शव को उतारकर लाया था।

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