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बेताल पच्चीसी

बेताल पच्चीसी

Betal Pachisi

by महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट

DevanagariHindipublished151 pages

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इतना कहकर आकाशवाणी मौन हो गई। वीरवर भी अपने पुत्र, कन्या तथा पली सहित अक्षत-शरीर होकर जी उठा। यह दृश्य देखकर राजा फिर छिप गया और प्रसन्नता के आंसुओं से भरी आंखों से उन्हें देखता रहा।

वीरवर ने अपने बच्चों तथा स्त्री सहित अपने को भी सोता हुआ-सा देखा और उसका मन भ्रांत हो गया। वीरवर ने अपनी पली और बच्चों को अलग-अलग ले जाकर पूछा—‘‘तुम लोग तो आग में जलकर भस्म हो गए थे, फिर जीवित कैसे हो गए ? और मैने भी तो अपना मस्तक काट डाला था, मैं भी जीवित बचा हूं। यह मेरी भ्रांति है या देवी ने सचमुच हम पर कृपा की है ?’’

वीरवर के ऐसा कहने पर उसकी पली एवं बच्चों ने कहा—‘‘पिताश्री, हम लोग सचमुच जीवित हो गए हैं। यह देवी का अनुग्रह है। यद्यपि हम अभी तक यह बात जान नहीं पाए हैं।’’

वीरवर ने भी यही समझा कि ऐसी ही बात है। पर उसका काम पूरा हो चुका था, अतः वह अपनी स्त्री एवं बच्चों सहित अपने घर लौट आया। घर पर स्त्री एवं बच्चों को छोड़कर, उसी रात वह पहले की तरह फिर से राजा की ड्योढ़ी पर पहुंचा और अपनी नौकरी पर मुश्तैद हो गया। यह देखकर राजा शूद्रक भी, सबकी आंखें बचाकर, फिर अपने महल की छत पर जा चढ़ा।

वहां से राजा ने पुकारकर पूछा—‘‘ड्योढ़ी पर कौन है ?’’ तब वीरवर ने कहा—‘‘स्वामी, यहां मैं हूं। आपकी आज्ञा से मैं उस स्त्री को देखने गया था। पर, मेरे देखते ही देखते वह गायब हो गई।’’

वीरवर की यह बात सुनकर राजा को बड़ा विस्मय हुआ, क्योंकि उसने तो सारा हाल अपनी आंखों के सामने देखा था। वह सोचने लगा—‘यह कैसा मनस्वी पुरुष है जो धीर-वीर एवं समुद्र के समान गंभीर है। अभी-अभी इसने जो कुछ किया है, उसका एक शब्द भी अपने मुंह पर लाना नहीं चाहता। धन्य है वीरवर। ऐसे वीर पुरुष सौभाग्य से ही किसी-किसी को नसीब हुआ करते हैं।’’

इसी तरह की बातें सोचता हुआ राजा चुपचाप महल की छत से उतर आया। बाकी की रात उसने अन्तःपुर में जाकर बिता दी।

सवेरे वीरवर राजदरबार में राजा के दर्शन करने गया। उसके कार्यों से प्रसन्न राजा ने पिछली रात का सारा विवरण अपने मंत्रियों से कह सुनाया। सुनकर वे सभी आश्चर्य के सागर में डूब गए।

राजा ने प्रसन्न होकर वीरवर तथा उसके पुत्र को कर्णाट का राज्य जे दिया। राज्य पाकर अब वे दोनों समान वैभव वाले तथा एक-दूसरे का फल चाहने वाले बन गए। इस प्रकार राजा शूद्रक और राजा वीरवर दोनों ही सुखपूर्वक रहने लगे।

बेताल ने यह अद्भुत कथा सुनाकर राजा विक्रमादित्य से पूछा—‘‘हे राजन !

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