Skip to content
BharatKosha
बेताल पच्चीसी

बेताल पच्चीसी

Betal Pachisi

by महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट

DevanagariHindipublished151 pages

Page 34 of 151

Read in context
Page 34

यह बतलाओ कि उन दोनों में से बड़ा वीर कौन था ? जानते हुए भी यदि तुम नहीं बताओगे तो तुम्हें पहले की तरह ही शाप लगेगा।”

यह सुनकर राजा ने बेताल को उत्तर दिया—‘‘हे बेताल, उन दोनों में से बड़ा राजा शूद्रक ही था।”

बेताल बोला—‘‘राजन, सबसे बड़ा वीर क्या वीरवर नहीं था ? उसने तो स्वयं राजा के कल्याण हेतु अपना मस्तक तक काट डाला था। या फिर उसकी पत्नी, उसने भी तो अपना बलिदान दिया था। उसके पुत्र सत्यवर ने भी कौन-सा कम वीरता का काम किया था। राजा के कल्याण हेतु उसने भी तो सहर्ष मां चंडिके को अपना मस्तक अर्पण कर दिया था। वह तो बालक होने पर भी वीरता का उत्कर्ष था। तब फिर तुम शूद्रक को सबसे बड़ा वीर किसलिए कर रहे हो ?”

बेताल के इस कथन पर विक्रमादित्य बोला—‘‘हे बेताल ! ऐसी बात नहीं है। वीरवर का जन्म ऐसे कुल में हुआ था, जिसके बालक अपने प्राण, अपने स्त्री और अपने बच्चों की बलि देकर भी स्वामी की रक्षा अपना परम धर्म मानते हैं। वीरवर की पत्नी भी कुलीन वंश की थी, वह पतिव्रता थी। वह पति को ही अपना एकमात्र देवता मानती थी। पति के मार्ग पर चलने के अतिरिक्त उसका कोई दूसरा कार्य नहीं था। उनसे उत्पन्न सत्यवर भी उन्हीं के समान था। जाहिर है जैसा सूत होगा, वैसा ही कपड़ा भी तैयार होगा। लेकिन, जिन चाकरों से राजा लोग अपने जीवन की रक्षा करवाते हैं, राजा शूद्रक उन्हीं के लिए अपने प्राण त्यागने को उद्यत हो गया था। अतः उन सब में वही विशिष्ट था।”

राजा की बातें सुनकर बेताल अपनी माया के द्वारा, अचानक उसके कंधे से उतरकर फिर गायब हो गया और पुनः अपने स्थान पर जा पहुंचा। राजा विक्रमादित्य भी उसे फिर से ले आने का निश्चय करके वापस शिंशपा-वृक्ष की ओर चल पड़ा।

<div align="right">☐ ☐ ☐</div>
<div align="right">वेताल पच्चीसी ☐ 35</div>