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बेताल पच्चीसी

Betal Pachisi

by महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट

DevanagariHindipublished151 pages
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यह बतलाओ कि उन दोनों में से बड़ा वीर कौन था ? जानते हुए भी यदि तुम नहीं बताओगे तो तुम्हें पहले की तरह ही शाप लगेगा।”

यह सुनकर राजा ने बेताल को उत्तर दिया—‘‘हे बेताल, उन दोनों में से बड़ा राजा शूद्रक ही था।”

बेताल बोला—‘‘राजन, सबसे बड़ा वीर क्या वीरवर नहीं था ? उसने तो स्वयं राजा के कल्याण हेतु अपना मस्तक तक काट डाला था। या फिर उसकी पत्नी, उसने भी तो अपना बलिदान दिया था। उसके पुत्र सत्यवर ने भी कौन-सा कम वीरता का काम किया था। राजा के कल्याण हेतु उसने भी तो सहर्ष मां चंडिके को अपना मस्तक अर्पण कर दिया था। वह तो बालक होने पर भी वीरता का उत्कर्ष था। तब फिर तुम शूद्रक को सबसे बड़ा वीर किसलिए कर रहे हो ?”

बेताल के इस कथन पर विक्रमादित्य बोला—‘‘हे बेताल ! ऐसी बात नहीं है। वीरवर का जन्म ऐसे कुल में हुआ था, जिसके बालक अपने प्राण, अपने स्त्री और अपने बच्चों की बलि देकर भी स्वामी की रक्षा अपना परम धर्म मानते हैं। वीरवर की पत्नी भी कुलीन वंश की थी, वह पतिव्रता थी। वह पति को ही अपना एकमात्र देवता मानती थी। पति के मार्ग पर चलने के अतिरिक्त उसका कोई दूसरा कार्य नहीं था। उनसे उत्पन्न सत्यवर भी उन्हीं के समान था। जाहिर है जैसा सूत होगा, वैसा ही कपड़ा भी तैयार होगा। लेकिन, जिन चाकरों से राजा लोग अपने जीवन की रक्षा करवाते हैं, राजा शूद्रक उन्हीं के लिए अपने प्राण त्यागने को उद्यत हो गया था। अतः उन सब में वही विशिष्ट था।”

राजा की बातें सुनकर बेताल अपनी माया के द्वारा, अचानक उसके कंधे से उतरकर फिर गायब हो गया और पुनः अपने स्थान पर जा पहुंचा। राजा विक्रमादित्य भी उसे फिर से ले आने का निश्चय करके वापस शिंशपा-वृक्ष की ओर चल पड़ा।

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पांचवां बेताल: सोमप्रभा की कथा

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पांचवां बेताल

सोमप्रभा की कथा

शिंशपा-वृक्ष से विक्रम ने पहले की भांति ही बेताल को नीचे उतारा और उसे कंधे पर लादकर चुपचाप आगे बढ़ चला। कुछ आगे चलने पर बेताल ने फिर मौन भंग किया। वह बोला—‘‘राजन, तुम एक कष्टकर कार्य में लगे हुए हो, जिससे मुझे तुम अत्यंत प्रिय हो गए हो। अतः रास्ते में तुम्हारे श्रम को भुलाने के लिए तुम्हें मैं यह कहानी सुनाता हूं।’’

बहुत पहले उज्जयिनी में हरिस्वामी नाम का एक सद्गुणी ब्राह्मण रहता था। वह राजा पुण्यसेन का प्रिय सेवक एवं मंत्री था। उस गृहस्थ ब्राह्मण की पत्नी भी उसी के अनुरूप थी। हरिस्वामी की दो संतानें थीं। बड़ा देवस्वामी नाम का एक पुत्र और छोटी एक कन्या, जिसका नाम सोमप्रभा था। सोमप्रभा बहुत ही सुंदर थी और अपने रूप-लावण्य के लिए प्रसिद्ध थी।

जब सोमप्रभा के विवाह का समय आया तो उसने अपने पिता से कहा—‘‘पिताश्री, यदि आप मेरा विवाह करने के इच्छुक हैं तो किसी वीर, ज्ञानी अथवा अलौकिक विद्याएं जानने वाले के साथ करें। अन्यथा मैं किसी और से विवाह नहीं करूंगी।’’

यह सुनकर हरिस्वामी उसके लिए उसकी रुचि का वर ढूंढने के लिए चिंतित रहने लगे। उसी समय राजा ने हरिस्वामी को अपना दूत बनाकर, दक्षिण देश के एक राजा के साथ संधि करने के लिए भेजा क्योंकि वह राजा युद्ध करने के लिए तैयार हो रहा था। जब उसने वहां जाकर अपना कार्य संपन्न कर लिया, तब उसके पास एक श्रेष्ठ ब्राह्मण आया। उसने हरिस्वामी की कन्या के रूप-लावण्य की बात सुन रखी थी। उसने अपने लिए उसकी कन्या की मांग की।

हरिस्वामी ने कहा—‘‘मेरी कन्या पति के रूप में या तो अलौकिक विद्याएं जानने वाले को या ज्ञानी अथवा वीर व्यक्ति को ही स्वीकार करेगी, अन्य किसी को नहीं। अतः आप बतलाएं कि आप इनमें से कौन हैं?’’ इस पर उस ब्राह्मण ने कहा—‘‘हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, मैं अलौकिक विद्याओं का ज्ञाता हूं।’’

हरिस्वामी ने तब उससे अपनी विद्या का कुछ चमत्कार दिखलाने को कहा।

उस ब्राह्मण ने अपनी विद्या के प्रभाव से तत्काल एक आकाशगामी रथ तैयार कर दिया। फिर उस ब्राह्मण ने हरिस्वामी को अपने उस मायावी रथ में बैठाया और उसे स्वर्ग आदि लोक दिखला लाया। इसके बाद संतुष्ट हुए हरिस्वामी को वह दक्षिण देश के राजा की उस सेना के पास लौटा लाया, जहां वह अपने काम से आया था।

तब हरिस्वामी ने उस अलौकिक विद्याएं जानने वाले पुरुष के साथ अपनी कन्या

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वेताल पच्चीसी ❐ 37

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ब्याहने का वचन दिया एवं सातवें दिन विवाह की तिथि निश्चित कर दी। उसी समय उज्जयिनी में एक दूसरे ब्राह्मण ने हरिस्वामी के पुत्र देवस्वामी के पास आकर उसकी बहन से विवाह करने की याचना की। देवस्वामी ने जब उसे अपनी बहन की शर्तें बताईं तो वह ब्राह्मण अपनी विद्या का कौशल दिखाने को तत्पर हो गया और उसने अपने अस्त्र-शस्त्रों के कौशल का प्रदर्शन किया। यह देख देवस्वामी ने उसी के साथ अपनी बहन का विवाह करने का निश्चय कर लिया। अपनी माता की अनुपस्थिति में उसने भी ज्योतिषियों के कथनानुसार सातवें दिन ही विवाह का निश्चय कर लिया।

उसी समय एक तीसरे व्यक्ति ने भी सोमप्रभा की माता के सम्मुख स्वयं को ज्ञानी बताते हुए उसकी बेटी से विवाह करने की याचना की। उसने ज्ञानी होने का प्रमाण भी दिया जिससे प्रभावित होकर सोमप्रभा की माता ने उससे सातवें दिन अपनी कन्या का विवाह करने का वचन दिया।

अगले दिन हरिस्वामी घर लौट आया। आकर उसने अपनी पत्नी और पुत्र को बताया कि वह कन्या का विवाह निश्चित कर आया है। इस पर उन दोनों ने भी अलग-अलग बतलाया कि उन्होंने क्या निश्चय किया है। उनकी बातें सुनकर हरिस्वामी चिंता में पड़ गया कि एक-साथ तीन व्यक्तियों के साथ उसकी कन्या का विवाह कैसे होगा?

अनन्तर, विवाह की निश्चित तिथि को ज्ञानी, वीर और अलौकिक विद्याएं जानने वाला, ये तीनों ही वर हरिस्वामी के घर पहुंचे। इसी समय एक विचित्र बात हो गई। ब्राह्मण की कन्या सोमप्रभा, जो वधु बनने वाली थी, अचानक कहीं गायब हो गई। ढूंढने पर भी उसका कोई पता न चला।

तब घबराए हुए हरिस्वामी ने ज्ञानी पुरुष से कहा—‘‘हे ज्ञानी, अब झटपट यह बताइए कि मेरी कन्या कहां है?’’

यह सुनकर ज्ञानी ने अपने ज्ञान द्वारा पता करके उसे बतलाया—‘‘हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, आपकी कन्या को धूम्रशिख नाम का एक राक्षस उठाकर विंध्याचल के वन में स्थित अपने घर में ले गया है।’’

ज्ञानी द्वारा ऐसा बताए जाने पर हरिस्वामी भयभीत हो गया। वह बोला—‘‘हाय-हाय, अब वह कैसे मिलेगी और उसका विवाह भी कैसे होगा?’’ यह सुनकर अलौकिक विद्याएं जानने वाला युवक बोला—‘‘आप धैर्य रखें। ज्ञानी के कथनानुसार वह कहां ले जाई गई है, मैं अभी आपको वहां ले चलता हूं।’’

यह कह क्षण-भर में ही उसने सभी अस्त्रों से सजा एक आकाशगामी यान बनाया और उस पर हरिस्वामी, ज्ञानी तथा वीर को चढ़ाकर उन्हें विंध्याचल के उस वन में ले गया, जहां ज्ञानी ने राक्षस का भवन बताया था। यह वृत्तांत जानकर राक्षस क्रोधित हो गया और वह गर्जना करता हुआ बाहर निकल आया।

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तब हरिस्वामी के कहने पर वह वीर पुरुष आगे बढ़कर उस राक्षस से लड़ने लगा। तरह-तरह के अस्त्रों से लड़ने वाले उन दोनों, मनुष्य और राक्षस, का युद्ध बड़ा आश्चर्यजनक हुआ। अपनी भार्या के लिए जिस तरह राम-रावण से लड़े थे, वैसे ही ये दोनों भी लड़ने लगे। कुछ ही देर में उस वीर ने एक अर्द्धचंद्राकार बाण से युद्ध में मतवाले उस राक्षस का मस्तक काट गिराया। राक्षस के मारे जाने पर वे सभी अलौकिक विद्याएं जानने वाले ब्राह्मण के रथ से वापस लौट पड़े।

हरिस्वामी के घर पहुंचकर, विवाह का समय आने पर उस ज्ञानी, वीर एवं अलौकिक विद्याएं जानने वाले के बीच झगड़ा पैदा हो गया। ज्ञानी ने कहा—‘‘यदि मैं न जानता कि सोमप्रभा कहां छिपाकर रखी गई है तो उसका पता कैसे चल पाता ? इसलिए उसका विवाह मेरे साथ ही होना चाहिए। ’’

इस पर अलौकिक विद्याओं के ज्ञाता ने कहा—‘‘यदि मैं आकाशगामी रथ न बनाता तो पल-भर में वहां आना-जाना कैसे हो पाता ? रथ पर बैठे राक्षस के साथ, बिना रथ के युद्ध भी कैसे संभव होता ? इसलिए यह कन्या मुझे ही मिलनी चाहिए। यह विवाह मैंने जीता है। ’’

तब उस वीर ने भी अपना पक्ष उनके सामने रखा। वह बोला—‘‘यदि मैने अपनी शक्ति से उस राक्षस का संहार न किया होता तो आप लोगों के प्रयल करने पर भी इस कन्या को कैसे वापस लाया जा सकता था ? इसलिए इन कन्या पर तो मेरा ही अधिकार बनता है। यह कन्या मुझे ही मिलनी चाहिए।’’ इस प्रकार उन तीनों का झगड़ा सुनकर हरिस्वामी का मन उद्भ्रांत हो गया और वह अपना सिर पकड़कर बैठ गया।

इतनी कथा सुनाकर बेताल ने विक्रम से पूछा—‘‘राजन ! अब तुम्हीं बताओ कि वह कन्या किसको मिलनी चाहिए ? ज्ञानी को, वीर को अथवा अलौकिक विद्याएं जानने वाले उस व्यक्ति को ? सब कुछ जानते हुए भी यदि तुम इसका उत्तर नहीं दोगे तो तुम्हारा सिर फटकर कई टुकड़ों में बंट जाएगा। ’’

बेताल की यह कथा सुनकर, अपना मौन तोड़ते हुए विक्रम बोला—‘‘बेताल, वह कन्या उस वीर को ही मिलनी चाहिए, क्योंकि उसी ने उद्यम करके, अपने बाहुबल द्वारा उस राक्षस को युद्ध में मारा और उस कन्या को अर्जित किया था। विधाता ने ज्ञानी और अलौकिक विद्याएं जानने वाले को तो उसका काम करने के लिए माध्यम मात्र बनाया था।

‘‘तुमने ठीक उत्तर दिया राजन। ’’ बेताल तत्काल बोल उठा—‘‘पर तुम अपनी शर्त भूल गए। तुमने मौन भंग किया और शर्त के अनुसार मैं फिर स्वतंत्र हो गया। ’’

यह कहकर बेताल राजा के कंधे से उतरकर वापस उसी शिंशपा-वृक्ष की ओर उड़ गया।

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छठा बेताल: रजक-कन्या की कथा

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छठा बेताल रजक-कन्या की कथा

राजा विक्रमादित्य ने पुनः उस शिशपा-वृक्ष से बेताल को उतारा और मौन भाव से उसे कंधे पर डालकर अपने गन्तव्य की ओर चल पड़ा।

मार्ग में फिर बेताल ने मौन भंग करके कहा—"राजन, तुम वीर हो, बुद्धिमान हो, इसीलिए मेरे प्रिय हो। अतएव मैं तुम्हें एक मनोरंजक कथा सुनाता हूं। इससे तुम्हारा ज्ञानवर्द्धन तो होगा ही, रास्ते के भय से भी तुम्हें मुक्ति मिलेगी।" बेताल ने कथा आरंभ की।

शोभावती नामक एक नगरी में एक राजा राज करता था। उसका नाम था—यशकेतु। राज्य की उस राजधानी में देवी गौरी का एक उत्तम मंदिर था। मंदिर से दक्षिण में गौरी तीर्थ नाम का एक सरोवर था। वहां प्रतिवर्ष आषाढ़ शुक्ल-चतुर्दशी को एक मेला लगता था। भिन्न-भिन्न दिशाओं से बड़े-बड़े लोग वहां स्नान करने आया करते थे। एक बार उक्त तिथि को ब्रह्मस्थल नाम के एक गांव का धवल नामक एक युवक धोबी वहां स्नान करने आया।

उस तीर्थ में स्नान करने हेतु आई हुई, शुद्धपट की पुत्री मदनसुन्दरी को उसने देखा, और उसके रूप-सौंदर्य पर मोहित हो गया।

घर लौटकर वह बेचैन रहने लगा। उसने खाना-पीना भी छोड़ दिया। उसकी मां ने उसके बेचैन रहने का कारण पूछा तो धवल ने अपने मन की बात अपनी मां को बताई। उसकी मां ने अपने पति को जाकर सारी बातें बताईं तो उसके पिता ने कहा—"बेटा, जिसके मिलने में कोई कठिनाई नहीं है, उसके लिए तुम इस प्रकार शोक क्यों कर रहे हो ? मेरे मांगने पर शुद्धपट तुमको अपनी कन्या दे देगा क्योंकि कुल में, धन में और कर्म में हम उसके समान ही हैं। मै उसे जानता हूं, वह भी मुझे जानता है—इसलिए यह कार्य मेरे लिए दुष्कर नहीं है।"

इस तरह बेटे को समझा-बुझाकर उसने उसे खाने-पीने के लिए राजी कर लिया। दूसरे दिन उसका पिता विमल उसे लेकर शुद्धपट के पास पहुंचा। वहां जाकर उसने अपने बेटे के लिए उसकी कन्या मांगी। उसके पिता ने आदरपूर्वक इसके लिए वचन दिया।

अगले दिन, विवाह का लग्न निश्चित करके उसने अपनी कन्या का विवाह धवल के साथ कर दिया। देखते ही जिस पर वह आसक्त हो गया था, ऐसी सुन्दरी से विवाह करके, सफल मनोरथ होकर धवल उस स्त्री सहित पिता के घर लौट आया। उन दोनों को सुखपूर्वक रहते हुए जब कुछ समय बीत गया, तब धवल का साला अर्थात् मदनसुन्दरी का भाई वहां आया।

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सभी संबंधियों ने उसका आदर-सत्कार किया। बहन ने गले लगाकर उसका अभिवादन किया, फिर कुशलता पूछी। तत्पश्चात् कुछ देर विश्राम कर लेने के बाद उसके भाई ने उन लोगों से कहा—"पिताजी ने मुझे मदनसुन्दरी और मेरे बहनोई को निमंत्रित करने के लिए यहां भेजा है क्योंकि वहां देवी पूजन का उत्सव है।"

सभी संबंधियों ने उसकी बातें मान लीं और उस दिन उचित भोजनपान के द्वारा उसका उचित स्वागत-सत्कार किया। सवेरा होने पर धवल ने अपनी पली सहित अपने साले के साथ ससुराल के लिए प्रस्थान किया।

शोभावती नाम की उस नगरी के निकट पहुंचकर, धवल ने गौरी का विशाल मंदिर देखा। उसने अपने साले और पली से श्रद्धापूर्वक कहा—"आओ, हम लोग माता गौरी के दर्शन कर लें।"

यह सुनकर साले ने उसे रोकते हुए कहा—'नहीं जीजाजी, अभी नहीं। अभी तो हम सब खाली हाथ है। पहले माता गौरी के लिए कुछ भेंट लाएंगे, तत्पश्चात् ही दर्शन करेंगे!'

"तब मैं स्वयं अकेला ही जाता हूं। तुम यहीं ठहरो क्योकि देवताओं को भेंट की अपेक्षा भक्त से श्रद्धा और विश्वास की अधिक अपेक्षा रहती है।" ऐसा कहकर धवल अकेला ही देवी दर्शन के लिए चला गया।

मंदिर में जाकर उसने श्रद्धापूर्वक देवी को नमन किया। फिर उसने सोचा—'लोग विविध प्राणियों की बलि देकर इस देवी को प्रसन्न करते हैं। मै सिद्धि पाने के लिए अपनी ही बलि देकर इन्हें क्यों न प्रसन्न करूं?' ऐसा सोचकर वह मंदिर के एकान्त गर्भगृह से एक तलवार ले आया, जिसे किसी यात्री ने पहले ही देवी को अर्पित किया था। मंदिर में लटकते हुए घंटे की जंजीर से उसने अपने केशों द्वारा अपने सिर को बांध लिया और तलवार से अपना सिर काटकर देवी को अर्पित कर दिया। गर्दन कटते ही वह भूमि पर आ गिरा।

जब वह बहुत देर तक नहीं लौटा तो उसे देखने के लिए उसका साला उस देवी के मंदिर मे गया। मस्तक कटे अपने बहनोई को देखकर वह घबरा गया और उसी तरह उसने भी उस तलवार से अपना सिर काट डाला। जब वह भी लौटकर नहीं आया, तब मदनसुन्दरी का मन बहुत विकल हो गया और वह भी देवी के मंदिर में गई।

अन्दर जाकर जब उसने अपने पति और भाई का वह हाल देखा तो शोकाकुल हो वह भूमि पर गिर पड़ी और—'हाय यह क्या हुआ ? मैं मारी गई।' कहती हुई विलाप करने लगी।

इस प्रकार अचानक ही उन दोनों की मृत्यु पर शोक करती हुई, वह कुछ पल बाद उठ खड़ी हुई और सोचने लगी कि—'अब मुझे भी जीवित रहकर क्या करना है?'

तब शरीर त्याग के लिए उद्यत वह सती स्तुति करने लगी—"हे देवी, तुम


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सौभाग्य और सतीत्व की अधिष्ठात्री हो। तुम अपने पति कामरिपु (शिव) के अर्ध शरीर में निवास करती हो, तुम संसार की सभी स्त्रियों की शरणदायिनी हो ! तुम दुखों का नाश करने वाली हो। फिर तुमने मेरे पति और भाई को मुझसे क्यों छीन लिया ? मै तो सदा तुम्हारी ही भक्ति करती रही हूं। मेरे प्रति तुम्हारा यह कार्य उचित नहीं है। हे मां, मैं तुम्हारी शरण में आई हूं अतः तुम मेरी प्रार्थना सुनो। दुर्भाग्य से लुटे हुए इस शरीर का अब मै त्याग करती हूं। अगले जन्म में मैं जब भी, जहां भी जन्म लूं, पति व भाई के रूप में मुझे ये ही दोनों प्राप्त हों।"

इस प्रकार स्तुतिपूर्वक देवी से निवेदन करके उसने उन्हें पुनः प्रणाम किया और लताओं के द्वारा अशोक वृक्ष पर एक फंदा तैयार किया। फंदे को फैलाकर ज्योंही उसने अपने गले मे डाला, त्योंही आकाशवाणी हुई—'बेटी, ऐसा दुस्साहस मत करो। अल्पव्यस्का होकर भी तुमने जो इतना साहस दिखलाया है, उससे मै प्रसन्न हूं! फंदा हटा दो। तुम अपने पति और भाई के शरीरों पर उनके सिर जोड़ दो। मेरे वर से ये दोनों जीवित हो जाएंगे।"

यह सुनकर मदनसुन्दरी प्रसन्नता से अधीर हो गई। उसने अपने गले से फंदा निकाल दिया और घबराहट में बिना विचारे, उसने पति का सिर भाई के शरीर पर और भाई का सिर पति के धड़ पर जोड़ दिया।

तब देवी के वरदान से वे दोनों जीवित उठ खड़े हुए। उनके शरीर में कहीं कटने-फटने के निशान भी नहीं थे, लेकिन सिरों के बदल जाने से उनके शरीरों में संकरता आ गई थी।

अनन्तर, उन दोनों ने एक-दूसरे को अपनी-अपनी कथा सुनाकर प्रसन्नता प्राप्त की। उन्होंने भगवती गौरी को प्रणाम किया और फिर तीनों अपने इष्ट स्थानों की ओर चल पड़े।

राह में जाती हुई मदनसुन्दरी ने देखा कि उसने उनके सिरो की अदला-बदली कर दी है, तब वह घबरा गई और समझ न सकी कि उसे क्या करना चाहिए।

इतनी कथा सुनाकर बेताल ने राजा विक्रम से पूछा—"राजन, अब तुम यह बतलाओ कि शरीरों के इस प्रकार मिल जाने पर उसका पति कौन हुआ ? जानते हुए भी यदि तुम न बतलाओगे तो तुम पर पहले कहा हुआ शाप पड़ेगा।"

तब बेताल के इस प्रश्न का उत्तर विक्रमादित्य ने इस प्रकार दिया—'हे बेताल, उन दोनों में से जिस शरीर पर उसके पति का सिर था, वही उसका पति है। क्योंकि सिर ही अंगों में प्रधान है और उसी से मनुष्य की पहचान होती है।

राजा के इस प्रकार सही उत्तर देने पर बेताल उसके कंधे से उतरकर चुपचाप चला गया। राजा भी अपनी उत्तर देने की भूल स्वीकार करते हुए पुनः उसे पाने के लिए शिंशपा-वृक्ष की ओर चल पड़ा।

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सातवां बेताल: सत्त्वशील की कथा

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सातवां बेताल

सत्त्वशील की कथा

राजा विक्रमादित्य ने पुनः शिशपा-वृक्ष के समीप जाकर बेताल को नीचे उतारा और उसे कंधे पर उठाकर वापस लौट पड़ा। उसे लेकर जब वह वहां से चला तो मार्ग में बेताल फिर बोला—"राजन ! मुझे पाने के लिए तुम बहुत ही परिश्रम कर रहे हो। तुम्हारे श्रम को भुलाने के लिए इस बार मैं तुम्हें एक नई कथा सुनाता हूं।"

पूर्व सागर के तट पर ताम्रलिप्त नाम की एक नगरी है। प्राचीन काल में वहां चंद्रसेन नाम का एक राजा राज करता था। वह राजा महाप्रतापी था। वह शत्रुओं का धन तो छीन लेता था किंतु पराए धन या संपत्ति को हाथ भी नहीं लगाता था। वह पर-स्त्रियो से तो मुंह फेरे रहता था किंतु रणभूमि मे अपने दुश्मनों का वध करते हुए उसे तनिक भी संकोच नहीं होता था।

एक बार उस राजा की ड्यौढ़ी पर दक्षिण का सत्त्वशील नामक एक राजकुमार आया। उसने राजा के पास अपने आने की सूचना भिजवाई और अपने अन्य साथियों सहित उनके सम्मुख अपनी निर्धनता दिखाने के लिए, चीथड़े फाड़े।

वह वहां प्रत्याशी बनकर अनेक वर्षों तक राजा की सेवा करता रहा किंतु राजा से कोई पुरस्कार न पा सका। तब उसने सोचा—'राजकुल मे जन्म पाने के बाद भी मैं इतना दरिद्र क्यों हूं ? और दरिद्र होने पर भी मेरे मन में विधाता ने इतनी महत्त्वाकांक्षा क्यो दी है ? मै अपने साथियों के साथ इस प्रकार राजा की सेवा कर रहा हूं और भूख से कष्ट पा रहा हूं, फिर भी राजा ने हमारी ओर आंख उठाकर भी नहीं देखा।'

सत्त्वशील यह बातें सोच ही रहा था कि एक दिन राजा आखेट को निकला। घोड़ों और पैदल चलने वालों के साथ वह भी राजा के साथ वन में गया। आखेट करते हुए राजा ने उस वन में एक विशाल मतवाले सुअर का दूर से पीछा किया। उसका पीछा करता हुआ वह बहुत दूर एक दूसरे वन में जा पहुंचा। वहां घास-पात से ढके मैदान में सुअर गायब हो गया और थके हुए राजा को उस महावन में, दिशाभ्रम हो गया। हवा से बातें करने वाले घोड़े पर सवार राजा के पीछे-पीछे भूख और प्यास से व्याकुल सत्त्वशील उसे खोजता हुआ पैदल ही किसी प्रकार उसके पास पहुंचा।

उसे ऐसी बुरी हालत में देखकर राजा ने स्नेहपूर्वक पूछा—"सत्त्वशील, क्या तुम वह मार्ग जानते हो, जिससे हम यहां आए थे ?"

यह सुनकर सत्त्वशील ने हाथ जोड़कर कहा—"हां, श्रीमान ! मैं वह मार्ग

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जानता हूं। लेकिन अभी कुछ देर यहां विश्राम करें, क्योंकि अभी बहुत तेज गर्मी है। सूर्य देवता अभी बहुत तेजी से अपने तेज को पृथ्वी पर फैला रहे है।"

"ठीक है!" राजा ने कहा—"पर तुम यह तो देखो कि ऐसे में कहीं पानी भी मिल सकता है या नहीं ? प्यास के कारण मेरा गला सूख रहा है।"

"देखता हूं श्रीमन्।" यह कहकर सत्त्वशील एक ऊंचे वृक्ष पर चढ़ गया, जहां से उसे एक नदी दिखाई पड़ी।

वृक्ष से उतरकर वह राजा को वहां ले गया, तत्पश्चात् राजा को जल पिलाकर उसकी थकान दूर की। राजा के पानी पी लेने के पश्चात् उसने अपने कपड़े की खूंट से कुछ मधुर आंवले निकाले और उन्हें धोकर राजा के समक्ष पेश किया।

जब राजा ने उससे यह पूछा कि—"यह कहां से लाए?" तब वह अंजलि में आंवले लिए हुए घुटनों के बल बैठ गया और राजा से बोला—"हे स्वामी, मैं पिछले दस वर्षों से इन आंवलों पर ही निर्वाह करता हुआ बौद्धमुनि का व्रत धारण करके आपकी आराधना कर रहा हूं।"

"इसमें संदेह नहीं कि सच्चे अर्थों में तुम्हारा मन सत्त्वशील है।" ऐसा कहकर कृपावश उस राजा ने सोचा—'उन राजाओं को धिक्कार है जो सेवकों का दुख नहीं जानते और उनके मंत्रियों को भी धिक्कार है जो अपनी वैसी स्थिति राजा को नहीं बतलाते।' यह सोचकर, सत्त्वशील के बहुत कहने-सुनने पर राजा ने उसके हाथ से दो आंवले लेकर खाए और जल पीया। अनन्तर, सत्त्वशील ने भी जल पीया और राजा के साथ वहां कुछ देर विश्राम किया।

बाद में सत्त्वशील ने घोड़े पर जीन कसी और उस पर राजा को सवार कराया। वह स्वयं राह दिखाता हुआ आगे-आगे चला। राजा के बहुत कहने पर भी वह उसके घोड़े पर पीछे नहीं बैठा। रास्ते में राजा के बिछुड़े हुए सैनिक भी मिल गए और सबको साथ लेकर वे राजधानी लौट आए।

राजधानी में पहुंचकर राजा ने उसकी स्वामिभक्ति का वृत्तांत सबको सुनाया लेकिन उसे भरपूर धन और धरती देकर भी अपने को उऋण नहीं माना। इस तरह सत्त्वशील कृतार्थ हुआ। प्रत्याशी का रूप छोड़कर राजा चंद्रसेन के निकट रहने लगा।

एक बार राजा ने उसे अपने लिए सिंहल नरेश की कन्या मांगने हेतु सिंहल द्वीप भेजा। समुद्र मार्ग से जाने के लिए सत्त्वशील ने अपने अभीष्ट देवता का पूजन किया और राजा की आज्ञा से ब्राह्मणों सहित जहाज पर सवार हुआ। जहाज जब आधे रास्ते में पहुंचा, तभी अचानक एक आश्चर्य हुआ। उस समुद्र के भीतर से एक ध्वज ऊपर उठा। वह ध्वज उत्तरोत्तर ऊपर उठता गया और उसकी ऊंचाई बहुत अधिक हो गई। उस ध्वज का दंड सोने से बना हुआ था और उस पर रंग-बिरंगी पताकाएं फहरा रही थीं। अचानक उसी समय आकाश में घटाएं घिर आईं, मूसलाधार वर्षा होने लगी और हवा की गति तीव्र हो उठी।

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जिस प्रकार हाथी को बलपूर्वक खींचा जाता है, उसी प्रकार वर्षा और वायु के द्वारा खिंचकर सत्त्वशील का जहाज उस ध्वज-स्तंभ से जा बंधा। उस जहाज पर जो ब्राह्मण थे, वे भयभीत होकर अपने राजा चंद्रसेन को पुकारते हुए चिल्लाने लगे—"हे राजन, हमें बचा लो। यह क्या अनर्थ हो रहा है।"

जब उनका रोना-चिल्लाना सत्त्वशील से न सुना गया तो वह स्वामिभक्त हाथ में तलवार लेकर अपने वस्त्र समेटकर ध्वज के निकट समुद्र में कूद पड़ा। वास्तविक कारण न जानने पर भी उसने समुद्र के इस उपद्रव का प्रतिकार करने के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी।

सत्त्वशील जब समुद्र में कूदा, तब वायु के प्रचंड झोंकों और समुद्र की लहरों ने उसके जहाज को दूर फेंक दिया। जहाज खंड-खंड हो गया और उसमें बैठे लोग समुद्री जलचरों का भोजन बन गए। सत्त्वशील ने समुद्र में डुबकी लगाने के बाद जब चारों तरफ देखा तो वहां समुद्र के बदले उसे एक सुन्दर नगरी दिखाई पड़ी। उस नगरी में मणियों के खम्भों वाले चमकते स्वर्ण-भवन थे, उत्तम रत्नजड़ित गलियां थीं और शोभा से परिपूर्ण अनेक उद्यान थे।

वहां उसने मेरु पर्वत के समान ऊंचा कात्यायनी देवी का मंदिर देखा, जिसकी दीवारें अनेक प्रकार की मणियों से बनी थीं और जिसके ध्वज पर अनेक वर्णों के रत्न टंके थे। वहां देवी को प्रणाम करके स्तुतिपूर्वक उनका पूजन करके वह यह सोचता हुआ कि 'यह कैसा इंद्रजाल है', देवी के सम्मुख बैठ गया।

इसी समय किवाड़ खोलकर देवी के आगे वाले प्रभामंडल से अचानक ही एक अलौकिक कन्या निकल आई। उसकी आंखें इन्दीवर के समान थीं और शरीर खिले हुए कमल जैसा। हंसी फूलों की तरह थी और शरीर के अंग कमलनाल के समान कोमल थे। वह किसी चलती-फिरती खिली कमलिनी के समान थी। अपनी सखियों से घिरी वह कन्या देवी मंदिर के प्रकोष्ठ से बाहर निकल आई किंतु सत्त्वशील के हृदय से किसी भी तरह न निकल सकी। वह फिर उस प्रभामंडल के भीतर चली गई और सत्त्वशील भी उसी के पीछे-पीछे चल पड़ा।

प्रभामंडल में प्रवेश करके सत्त्वशील ने देवताओं के योग्य एक दूसरा नगर देखा। वह नगर मानो समस्त भोग-संपदाओं के मिलन-उद्यान के समान था।

वहां उसने उस कन्या को एक मणि-पर्यंक पर बैठे देखा। सत्त्वशील भी आगे बढ़कर उसके समीप ही बैठ गया। चित्रलिखित-सा सत्त्वशील, टकटकी लगाकर उस कन्या की ओर देखने लगा। उसके अंग कांप रहे थे और शरीर रोमांचित हो रहा था जिससे आलिंगन की उत्कंठा प्रकट होती थी। सत्त्वशील को इस प्रकार कामातुर देखकर कन्या ने अपनी सखियों की ओर देखा। उसका इशारा समझ कर सखी बोली—"आप यहां हमारे अतिथि हैं, श्रीमंत, अतः हमारी स्वामिनी का आतिथ्य ग्रहण कीजिए। उठिए, चलकर स्नान करके, उसके बाद भोजन कीजिए।"

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यह सुनकर सत्त्वशील को कुछ आशा बंधी और वह नहाने के लिए उस कन्या की सखी के साथ एक सरोवर की ओर चल पड़ा जो वहीं निकट ही था।

सत्त्वशील ने सरोवर में डुबकी लगाई लेकिन जब वह ऊपर आया तो वहां का सारा दृश्य ही बदला हुआ नजर आया। वह कन्या और उसकी सखियां गायब हो चुकी थीं और वह स्वयं भी ताम्रलिप्त नगर में राजा चंद्रसेन के उद्यान के एक तालाब में आ पहुंचा था। यह देखकर मत्त्वशील को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह सोचने लगा—‘अरे, यह कैसा आश्चर्य है! मै तो उस अलौकिक नगरी के सरोवर में नहाने के लिए जल में उतरा था और आ पहुंचा यहा। वह कन्या और उसकी सखियां भी गायब हैं, तो उस कन्या ने मुझे मूर्ख बनाया है?’

यह सोचता हुआ वह उस उद्यान में घूमने और विलाप करने लगा। कन्या से मिलने की इच्छा में उसकी दशा पागलों जैसी हो गई।

उस उद्यान के माली ने उसे ऐसी हालत में देखा तो उसने तुरंत राजा चंद्रसेन को सूचना पहुंचाई। इस पर राजा चंद्रसेन स्वयं ही सत्त्वशील को देखने अपने उद्यान में पहुंचा। राजा चंद्रसेन ने उसे सांत्वना दी और पूछा—‘‘मित्र, तुम्हें यह पागलपन कैसे हो गया? मुझे बताओ मित्र, शायद मैं कुछ तुम्हारी सहायता कर सकूं।’’

सांत्वना-भरे शब्द सुनकर सत्त्वशील के हृदय को थोड़ा धैर्य-सा मिला, तब उसने अपने साथ जो कुछ भी घटा था, सब सिलसिलेवार राजा चंद्रसेन से कह सुनाया।

सुनकर राजा ने कहा—‘‘तुम व्यर्थ का शोक मत करो, मित्र। मैं तुम्हें उसी मार्ग से ले जाकर तुम्हारी प्रिया, उस असुर कन्या के पास पहुंचा दूंगा।’’

अगले दिन मंत्री को राज्य-भार सौंपकर और एक जहाज पर सवार होकर राजा चंद्रसेन सत्त्वशील के साथ चल पड़ा। बीच समुद्र में पहुंचकर सत्त्वशील ने पहले की ही तरह पताका के साथ ध्वज को उठता देखकर राजा से कहा—‘‘यही वह दिव्य प्रभाव वाला महाध्वज है। ध्वज के पास जब मैं कूद पडूं तब आप भी कूद जाइएगा। तब वे दोनों ध्वज के निकट पहुंचे और जब ध्वज डूबने लगा, तब बीच में ही सत्त्वशील समुद्र में कूदा। डुबकी लगाने के बाद वे दोनों उसी दिव्य नगर में जा पहुंचे। वहां राजा ने आश्चर्यपूर्वक देखते हुए देवी पार्वती को प्रणाम किया और सत्त्वशील के साथ वहीं बैठ गया।

उसी समय उस प्रभामंडल से अपनी सखियों सहित वह कन्या बाहर निकल आई, जिसे देखकर सत्त्वशील ने बताया—‘‘राजन, यही है वह सुन्दरी, जिससे मै प्रेम करने लगा हूं।’’

उस कन्या ने भी राजा को देख लिया था। वह कन्या जब कात्यायनी देवी के मंदिर में पूजन करने चली गई तो राजा चंद्रसेन सत्त्वशील को साथ लेकर उद्यान में चला गया।

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कन्या जब पूजन समाप्त करके मंदिर से बाहर निकली तो उसने अपनी सखी से कहा—"सखी, जरा जाकर देखो तो मैंने जिन महापुरुष को यहां देखा था, वे कहां है ? मुझे वह कोई श्रेष्ठ व पूज्य पुरुष महसूस हुए थे, अतः उनसे प्रार्थना करो कि वे यहां पधारें और हमारा आतिथ्य स्वीकार करें।"

सखी जब राजा चंद्रसेन और सत्त्वशील के पास पहुंची और उन्हें कन्या का संदेश सुनाया तो चंद्रसेन ने उपेक्षा से कहा—"हमारा इतना ही आतिथ्य बहुत है। अधिक की कोई आवश्यकता नहीं है।"

कन्या की सखी ने लौटकर जब यही बात उसे बताई तो वह असुर कन्या उससे मिलने को और भी व्यग्र हो गई। इस बार वह स्वयं उन दोनों के पास पहुंची और उनसे आतिथ्य ग्रहण करने का निवेदन किया। इस पर राजा चंद्रसेन ने सत्त्वशील की ओर संकेत करते हुए उस कन्या से कहा—"मैं इनके कहने के अनुसार देवी का दर्शन करने के लिए ध्वज-मार्ग से यहां आया था। मैंने माता कात्यायनी के परम अद्भुत मंदिर और उसके बाद तुमको भी देखा। उसके बाद हमें और किस आतिथ्य की आवश्यकता है ?"

यह सुनकर वह कन्या बोली—"तब आप लोग त्रिलोक में अद्भुत मेरे दूसरे नगर को देखने के लिए कौतूहल से ही मेरे साथ चलिए।" उस कन्या के ऐसा कहने पर राजा चंद्रसेन ने हंसकर कहा—"इस सत्त्वशील ने मुझे उसके बारे में भी बतलाया है, वहां पर स्नान करने के लिए एक सरोवर भी है।"

तब उस कन्या ने कहा—"देव, आप ऐसी बात न कहें। मैं यों ही धोखा देने वाली नहीं हूं। तब फिर, आप जैसे पूज्य को कैसे धोखा दे सकती हूं। मैं आप लोगों की वीरता के उत्कर्ष से आपकी अनुचरी हो गई हूं। अतः आपको इस प्रकार मेरी प्रार्थना अस्वीकार नहीं करनी चाहिए।"

असुर कन्या का ऐसा आग्रह सुनकर राजा चंद्रसेन मान गया और वह सत्त्वशील सहित प्रभा-मंडल के निकट जा पहुंचा। वह कन्या उन्हें किसी प्रकार खुले दरवाजे से अंदर ले गई, जहां उन्होंने उसके दूसरे अलौकिक नगर को देखा। वह सचमुच एक विलक्षण नगर था। वहां सभी वस्तुएं सदा वर्तमान रहती थीं। वृक्षों में फूल और फल बने रहते थे और वह समूची नगरी रत्न तथा सुवर्ण से बनी हुई थी। उस नगरी की भव्यता ऐसी थी जैसे वे दोनों सुमेरु पर्वत पर आ पहुंचे हों।

असुर कन्या ने एक सुन्दर कक्ष में उन्हें ले जाकर बहुमूल्य रत्न जड़ित सिंहासन पर बैठाया और अनेक प्रकार से उनका आतिथ्य सत्कार करके अपना परिचय दिया—"मैं असुरराज कालनेमि की कन्या हूं। मेरे पिताजी की मृत्यु चक्रधारी विष्णु के चक्र से हुई थी। यहां जरा (वृद्धापन) और मृत्यु की बाधा नहीं होती और सभी मनोकामनाएं स्वतः ही पूरी हो जाती है।" फिर उसने राजा चंद्रसेन से प्रार्थना की—"अब आप ही मेरे पिता हैं और इन दोनों नगरों के साथ मैं आपके अधीन हूं। मेरी प्रार्थना स्वीकार करके आप मुझे अनुग्रहित कीजिए।" इस प्रकार जब उस

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कन्या ने अपना सब कुछ राजा को सौप दिया, तब वह कन्या से बोला—"बेटी। यदि ऐसी ही बात है तो मैं तुम्हें इस सत्त्वशील के साथ विवाह बंधन में बांधता हूं। यह वीर है, धीर है और दोषरहित है। अब यह मेरा मित्र भी है और संबंधी भी।"

राजा के इस आग्रह को असुर कन्या ने तत्काल स्वीकार कर लिया और सत्त्वशील के साथ विवाह रचा लिया। सत्त्वशील के मन की साध पूरी हो गई और उसने राजा चंद्रसेन का बहुत-बहुत आभार माना। विदाई के समय राजा चंद्रसेन ने सत्त्वशील से कहा—"मित्र, तुम्हारे मैंने दो आंवले खाए थे। उनमें से एक का ऋण तो मैंने चुका दिया है, एक का ऋण मुझ पर अभी बाकी है।" फिर उसने असुर कन्या से कहा—"बेटी, मुझे मार्ग दिखलाओ क्योंकि अब मैं अपने नगर को लौट जाना चाहता हूं।" राजा के ऐसा कहने पर उस असुर कन्या ने उन्हें 'अपराजित' नाम का खड्ग और खाने के लिए एक ऐसा फल दिया जिससे न तो राजा पर कभी बुढ़ापा आए और न ही उसे मृत्यु का भय सताए।

फिर उन दोनों चीजों को लेकर असुर कन्या द्वारा बतलाए सरोवर में डुबकी लगाकर राजा वापस अपने देश जा पहुंचा। सत्त्वशील भी सुखपूर्वक उस असुर कन्या के साथ दोनों नगरों पर शासन करने लगा।

यह कथा सुनाकर बेताल ने विक्रमादित्य से पूछा—"राजन, अब तुम मुझे यह बतलाओ कि समुद्र में डुबकी लगाने का उन दोनों में से किसने अधिक साहस दिखाया ? जानते हुए भी यदि तुम इस प्रश्न का उत्तर न दोगे तो तुम्हारे सिर के कई टुकड़े हो जाएंगे।"

तब बेताल के प्रश्न का उत्तर राजा ने इस प्रकार दिया—"हे बेताल, उन दोनों में मुझे सत्त्वशील ही अधिक साहसी लगा क्योंकि वह वस्तुस्थिति को न जानते हुए, बिना किसी आशा के समुद्र में कूदा था। जबकि, राजा चंद्रसेन को सभी बातें पहले से ही मालूम थीं और वह विश्वास के साथ समुद्र में कूदा था। वह असुर कन्या को भी नहीं जानता था क्योकि वह जानता था कि इच्छा होने पर भी वह उसे पा नहीं सकेगा।"

"तुमने सही उत्तर दिया राजन ! किंतु मेरे प्रश्न का उत्तर देने में तुमने अपना मौन भंग कर दिया इसलिए मैं चला।" यह कहकर बेताल विक्रमादित्य के कंधे से खिसककर पुनः उसी वृक्ष की ओर उड़ गया।

राजा भी उसी प्रकार फिर से उसे लाने के लिए तेजी से लौट पड़ा।

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आठवां बेताल: तीन चतुर पुरुषों की कथा

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आठवां बेताल

तीन चतुर पुरुषों की कथा

पहले की तरह राजा विक्रमादित्य फिर उस शिंशपा (शीशम) के वृक्ष के पास जा पहुंचा। बेताल को वृक्ष से उतारकर उसने कंधे पर डाला और मौन भाव से अपने गंतव्य की ओर चल पड़ा।

कुछ आगे चलने पर बेताल ने फिर मौन भंग किया और राजा से बोला—‘‘राजन ! उस योगी के कारण तुम सचमुच बहुत परिश्रम कर रहे हो। तुम्हारे परिश्रम की थकान मिटाने के लिए मै तुम्हें एक और कथा सुनाता हूं किंतु शर्त वही रहेगी। कहानी सुनाते समय मौन ही रहना, अन्यथा मैं फिर इसी स्थान पर लौट आऊंगा। ’’

राजा की सहमति पर बेताल ने फिर एक कथा सुनाई।

अंगदेश में ‘वृक्षघट’ नाम का एक ग्राम था जो ब्राह्मणों को दान में मिला था। वहां विष्णुस्वामी नाम का एक बहुत धनवान अग्निहोत्री ब्राह्मण रहता था। उस ब्राह्मण के तीन पुत्र थे जो अपने पिता के समान ही बुद्धिमान थे। एक बार उनके पिता ने एक यज्ञ का आयोजन किया, जिसके निमित्त उसने अपनी तीनों पुत्रों से एक कछुआ लाने को कहा। पिता की आज्ञा मानकर उसके तीनों पुत्र एक समुद्र तट पर कछुआ लाने के लिए पहुंचे। कछुआ पाकर सबसे बड़े भाई ने छोटे भाइयों से कहा—‘‘सुनों बंधुओं, मुझे तो इस कछुए की दुर्गंध और चिकनेपन से घृणा हो रही है। अतः पिताजी के यज्ञ के लिए तुम दोनों ही इसे उठाओ और ले जाकर पिताजी को सौंप दो। ’’

इस पर उसके दोनों छोटे भाइयो ने कहा—‘‘यदि तुम्हें इससे घृणा है तो हमको क्यों न होगी ? अतः जब तक तुम इसे ले जाने में सहयोग नहीं करोगे, हम इसे लेकर नहीं जाएंगे। ’’

यह सुनकर बड़ा भाई बोला—‘‘तुम्हें इसे लेकर जाना ही होगा। यदि तुम इसे लेकर नहीं गए तो पिताजी का यज्ञ पूरा नहीं हो सकेगा और तुम लोग नरक के भागी बनोगे। ’’

बड़े भाई के मुख से यह बात सुनकर उसके दोनो छोटे भाई हंसे और बोले—‘‘भैया, तुम हमें धर्म का ज्ञान कराते हो। इस अवस्था में जो हमारा धर्म है, तुम्हारा भी तो वही है। ’’

छोटे भाइयों की बात सुनकर बड़ा भाई कुछ क्रुद्ध हो गया और बोला—‘‘तुम लोग मेरी दक्षता नहीं जानते, इसलिए मैं किसी घृणित वस्तु को नहीं छू सकता। इस पर मंझला भाई बोला—‘‘दक्षता की बात क्या करते हो, मैं भी कुछ कम नहीं। मै तुमसे अधिक दक्ष हूं। ’’ तब बड़े भाई ने कहा—‘‘यदि ऐसी बात है तो हममें से सबसे छोटा इस कछुए को लेकर चले। ’’


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यह सुनकर सबसे छोटे की मूंछें तन गईं। बोला-“तुम दोनों ही मूर्ख हो इसलिए मुझसे ऐसी आशा रखते हो। जानते नहीं कि मैं तुम दोनों से अधिक चतुर हूं। मै शय्या दक्ष हूं।”

इस प्रकार वे तीनों भाई आपस में ही झगड़ने लगे और कछुए को छोड़कर अपने झगड़े के निबटारे हेतु उस प्रदेश के राजा के पास, विटंकपुर नामक उसके नगर की ओर चल पड़े।

राजा के महल में अंदर गए और राजा को सारा वृत्तांत सुनाया।

सुनकर राजा ने कहा—“आप तीनों यहीं ठहरिए। मैं आप तीनों की परीक्षा लूंगा।”

भोजन के समय राजा ने उस तीनों को बुलवाया और अपने रसोइए को कहकर उनके सामने नाना-प्रकार के व्यंजन परोसवाए।

दोनों छोटे भाई तो उस स्वादिष्ट भोजन के खाने लगे किंतु बड़ा भाई भोजन की उपेक्षा कर एक ओर मुंह बनाए बैठा रहा। उसने एक ग्रास भी मुंह में न डाला।

जब राजा ने स्वयं उससे पूछा-“आर्य, भोजन तो स्वादिष्ट और सुगंधित है। आप खाते क्यों नहीं ?” तो उसने उत्तर दिया-“राजन, इस भात में मुर्दे के धुएं की दुर्गंध है, इसीलिए स्वादिष्ट होने पर भी मेरी इच्छा इसे खाने को नहीं हो रही।”

उसके ऐसा कहने पर, राजाज्ञा से सबने उस भात को सूंघने के बाद कहा-“उत्तम कोटि का यह चावल बिल्कुल दोषरहित है। इसमें किसी प्रकार की गंध भी नहीं है।”

भोजनदक्ष बड़े भाई ने भी उसे नाक से सूंघा, पर खाया नहीं। इस पर राजा ने उन चावलों के स्रोत का पता लगवाया कि वह कहां पैदा किए गए थे, तो पता चला कि चावल एक ऐसे खेत के थे, जो श्मशान के बिल्कुल पास था। भोजनदक्ष का कहना बिल्कुल सच था, श्मशान में मुर्दे जलते ही हैं, उन्हीं के जलने की बदबू चावलों में रच-बस गई थी।

राजा भोजनदक्ष की योग्यता को मान गया। उसने अपने रसोइया को दूसरा भोजन बनाकर लाने का आदेश दिया। भोजन के उपरान्त राजा ने उन तीनों को अलग-अलग कमरों में भेज दिया। फिर उसने नगर की एक गणिका को बुलवा भेजा। उस सर्वांग सुन्दरी को अच्छी तरह सजा-संवारकर राजा ने उस दूसरे, नारीदक्ष ब्राह्मण के पास भेजा। पूर्णिमा के समान मुख वाली और काम को जगाने वाली वह स्त्री, राजा के अनुचरों के साथ उस नारीदक्ष के शयन गृह में गई।

ज्योंही वह गृह में प्रविष्ट हुई, उसकी कांति से कमरा दमक उठा। किंतु उस नारीदक्ष को मूर्छा-सी आने लगी। उसने अपनी नाक दबा ली और राजा के अनुचरों से कहा-“इसे यहां से ले जाओ, नहीं तो मैं मर जाऊंगा क्योंकि इसके भीतर से बकरी की दर्गध आ रही है। उसकी यह बातें सुनकर राजा के अनुचर उस घबराई हुई गणिका को राजा के पास ले गए और उससे सारा वृत्तांत कह सुनाया। राजा ने

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तत्काल ही नारीदक्ष को बुलवाकर कहा—"इस गणिका ने चंदन, कपूर आदि उत्तम सुगंधियां लगा रखी हैं, जिनकी सुगंध चारों ओर फैल रही है। यह सजी-संवरी है फिर भला इसके शरीर से बकरी की गंध कैसे आ सकती है ?"

राजा के ऐसा कहने पर भी जब नारीदक्ष ने यह बात नहीं मानी, तो राजा सोच में पड़ गया। युक्तिपूर्वक उस गणिका से पूछताछ करने पर मालूम हुआ कि बचपन में उसकी माता तथा भाई के मर जाने पर उसे बकरी का दूध पिलाकर पाला गया था।

तब राजा नारीदक्ष की चतुराई पर बहुत विस्मित हुआ और उसकी प्रशंसा की। अनन्तर, उसने तीसरे ब्राह्मण को, जो शय्यादक्ष था, उसकी इच्छा के अनुसार शय्या दी। उस पलंग पर सात गद्दे बिछे हुए थे।

बहुमूल्य कक्ष में वह शय्यादक्ष पलंग पर सोया, जिस पर धुली हुई और मुलायम चादर बिछी हुई थी। अभी रात आधी हीं बीती थी कि वह नींद से जाग उठा और हाथ से बगल को दबाए हुए पीड़ा से कराहने लगा। राजा के जो अनुचर वहां थे, उन्होंने देखा कि उसके शरीर में केश का एक गहरा और कठोर दाग बन गया है। अनुचर ने जब राजा से जाकर यह बात कही तो उसने कहा— "तुम लोग जाकर देखो कि गद्दों के नीचे कुछ है या नहीं।" उन लोगों ने एक-एक गद्दे के नीचे देखा, तो सबसे अंतिम गद्दे के नीचे पलंग पर एक केश पड़ा मिला। उसे लाकर जब राजा को दिखलाया गया तो साथ आए शय्यादक्ष के अंग पर वैसा ही निशान देखकर राजा को विस्मय हुआ। राजा यह सोचकर बहुत देर तक आश्चर्य करता रहा कि सात गद्दों के नीचे उसे केश का दाग शय्यादक्ष के शरीर पर कैसे पड़ गया। इसी सोच-विचार में किसी तरह उसने वह रात बिताई।

दूसरे दिन राजा ने उन तीनों को उनकी अद्भुत चतुरता और सुकुमारता के लिए तीन लाख स्वर्णमुद्राएं दीं। तब वे तीनों सुखपूर्वक रहने लगे और कछुए को तथा पिता के यज्ञ में विघ्न पड़ने से जो पाप हुआ था, उसको भूल गए।

यह अद्भुत कथा सुनाकर बेताल ने विक्रमादित्य से पूछा—"राजन, पहले कहे गए मेरे शाप को याद करते हुए अब तुम यह बताओ कि उन तीनों—भोजनदक्ष, नारीदक्ष और शय्यादक्ष—में से कौन अधिक चतुर था ?"

यह सुनते ही राजा ने बेताल को उत्तर दिया—"बेताल ! मैं उन तीनों में शय्या-दक्ष को ही श्रेष्ठ समझता हूं क्योंकि उसकी बात में कुछ छिपा-ढका नहीं था। उसके अंग में केश का दाग स्पष्ट रूप से देखा गया था। दूसरों ने जो कुछ कहा, हो सकता है औरों के मुंह से शायद वे बातें उन्होंने पहले से जान ली हों।"

राजा के ऐसा कहने पर पहले की ही तरह वह बेताल उसके कंधे से उतरकर चला गया। राजा भी उसी तरह घबराए बिना उसके पीछे-पीछे चल पड़ा।

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