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बेताल पच्चीसी

Betal Pachisi

by महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट

DevanagariHindipublished151 pages

उन्नीसवां बेताल: चंद्रस्वामी की कथा

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उन्नीसवां बेताल

चंद्रस्वामी की कथा

राजा विक्रमादित्य ने शिंशपा-वृक्ष से फिर बेताल को उतारा और उसे अपने कंधे पर डालकर चल पड़ा। चलते हुए बेताल ने पुनः कहा—‘‘राजन ! सुनो, मैं तुम्हें इस बार यह मनोहर कथा सुनाता हूं।’’

बहुत पहले वक्रोलस नाम का एक नगर था। जहां इन्द्र के समान एक राजा राज्य करता था। उसका नाम था—सूर्यप्रभ। राजा सूर्यप्रभ हर प्रकार से सुखी था किंतु उसे एक ही दुख था कि बहुत-सी रानियों के होते हुए भी उसे कोई संतान नहीं हुई थी। उस समय ताम्रलिप्ति नाम की एक महानगरी में धनपाल नाम का एक महाजन (सेठ) रहता था, जो उस क्षेत्र के सभी धनवानों में अग्रणी था। उसकी इकलौती पुत्री का नाम धनवती था। वह इतनी सुन्दर थी कि उसे देखकर किसी अप्सरा का भ्रम होता था। जब वह कन्या युवती हुई, तब महाजन की मृत्यु हो गई। राजा का सहारा पाकर महाजन के संबंधियों ने उसका सारा धन हड़प लिया। महाजन की पत्नी हिरण्यवती किसी प्रकार अपने रत्न एवं आभूषणों को छिपाकर अपनी पुत्री सहित, अपने संबंधियों के डर से वहां से भाग निकली। उसके हृदय में दुख का अंधेरा घिरा हुआ था। अपनी पुत्री का हाथ थामे वह बड़ी कठिनाई से नगर से बाहर निकली।

संयोगवश, अंधकार में जाती हुई हिरण्यवती ने दिख न पाने के कारण सूली पर चढ़ाए गए एक चोर को अपने कंधे से धक्का दे दिया। वह चोर जीवित था। उसके कंधे के धक्के से वह तिलमिला उठा और कराहकर कह उठा—‘‘हाय ! मेरे कटे हुए जख्मों पर कौन नमक छिड़क रहा है ?’’ इस पर उस महाजन की स्त्री ने क्षमायाचना करते हुए उस चोर से पूछा—‘‘श्रीमंत, आप कौन हैं ?’’

तब उस चोर ने उत्तर दिया—‘‘मैं एक कुख्यात चोर हूं। चोरी करने एक कारण मुझे सूली पर चढ़ाए जाने का दंड मिला है। लेकिन आर्या, आप बतलाएं कि आप कौन हैं और इस अंधकार में भटकती हुई कहां जा रही हैं ?’’

चोर के पूछने पर महाजन की पत्नी उसे अपना परिचय देने लगी, तभी चंद्रमा निकल आया और उसके प्रकाश में सारा क्षेत्र आलोकित हो गया। तब चोर ने देख लिया कि उस स्त्री के साथ चंद्रमा के मुख के समान एक कन्या भी वहां मौजूद थी। यह देखकर उसने उसकी माता से प्रार्थना की—‘‘आर्ये, तुम मेरी एक प्रार्थना सुनो। मैं तुम्हें एक हजार स्वर्णमुद्राएं दूंगा। तुम अपनी कन्या मुझे दे दो।’’ यह सुनकर धनवती की माता हंसी और चोर से पूछा—‘‘तुम तो मरने वाले हो। सूली पर टंगे


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हुए तुम्हें मरने में विलम्ब नहीं होगा। फिर क्यों मेरी कन्या का हाथ मांगना चाहते हो?''

इस पर उस चोर ने कहा—''यह सत्य है कि मेरी आयु समाप्त हो गई है, पर मैं पुत्रहीन हूं। शास्त्रों में लिखा है कि पुत्रहीन व्यक्ति की सद्गति नहीं होती। अतः यह यदि मेरी आज्ञा से किसी और के द्वारा पुत्र पैदा करेगी तो वह मेरा क्षेत्रज पुत्र होगा। इसी से मैं तुमसे यह निवेदन करता हूं कि मेरा मनोरथ पूरा करो।''

चोर की बात सुनकर महाजन की पत्नी के मन में लोभ पैदा हो गया। उसने चोर की बात स्वीकार कर ली।

तब वह महाजन की पत्नी कहीं से जल ले आई और यह कहकर उसने उस जल को चोर के हाथों पर डाल दिया कि—'मैं अपनी यह कुंवारी कन्या तुम्हें देती हूं।'

तब उस चोर ने उस कन्या को अपना क्षेत्रज पुत्र उत्पन्न करने का आदेश दिया और अपनी सास से बोला—''सामने उस बरगद के विशाल वृक्ष को देखो। उस वृक्ष की जड़ के समीप जमीन खोदो तो वहां जमीन में दबी तुम्हें कुछ स्वर्णमुद्राएं मिलेंगी। वह स्वर्णमुद्राएं निकाल लो और मेरी मृत्यु के बाद विधिपूर्वक मेरा दाह-संस्कार करा देना। तत्पश्चात् मेरी अस्थियों का किसी तीर्थस्थान में विसर्जन करने के पश्चात् अपनी कन्या सहित वक्रोलस नगर में चली आना। वहां राजा सूर्यप्रभ के शासन में वहां के लोग सुखपूर्वक रहते हैं। मुझे आशा है तुम्हें वहां रहने के लिए किसी प्रकार की कठिनाई नहीं आएगी।'' यह कहकर उस प्यासे चोर ने हिरण्यवती द्वारा लाया हुआ जल पीया और सूली पर चढ़ाए जाने की पीड़ा के कारण अपने प्राण त्याग दिए।

हिरण्यवती ने चोर के निर्देशानुसार बरगद के वृक्ष के पास जाकर स्वर्णमुद्राएं निकालीं और किसी गुप्त मार्ग से अपने पति के किसी मित्र के यहां चली गई। वहां रहकर उसने युक्तिपूर्वक उस चोर की दाह-क्रिया करवाई और उसकी अस्थियों को किसी तीर्थ में प्रवाहित कराने आदि की भी व्यवस्था कर दी।

अगले दिन वह उस छिपे धन को लेकर अपनी कन्या के साथ वहां से निकल पड़ी और चलती-चलती क्रमशः वक्रोलस नगर में पहुंच गई। वहां उसने वसुदत्त नाम के किसी श्रेष्ठ वणिक से एक मकान खरीद लिया और पुत्री सहित उस मकान में रहने लगी। उन्हीं दिनों उस नगर में विष्णुस्वामी नाम के एक अध्यापक रहते थे। मनःस्वामी नाम का उनका एक ब्राह्मण-शिष्य बहुत रूपवान था।

यद्यपि वह ब्राह्मण-शिष्य उत्तम कुल का था तथापि यौवन के वशीभूत होकर हंसाबलि नाम की एक विलासिनी के प्रेम में फंस गया था। हंसाबलि शुल्क के रूप में पांच-सौ स्वर्णमुद्राएं मांगती थी और इतना धन उसके पास नहीं था इसलिए वह उसे पाने को दिन-रात बेचैन रहता था।

एक दिन उस महाजन की कन्या धनवती ने अपने मकान की छत पर से उस

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सुन्दर युवक को देखा। धनवती उसकी सुन्दरता पर मोहित हो गई। उसे अपने चोर पति की आज्ञा का स्मरण हो आया। तब उसने अपनी माता को बुलाया और उससे कहा—‘‘मा, नीचे खडे उस ब्राह्मण युवक के रूप और यौवन को तो देखो। उसके नेत्र कितने सुन्दर हैं। इस वेश मे तो वह साक्षात् कामदेव जैसा दिखाई दे रहा है।’’ यह सुनकर उसकी माता हिरण्यवती समझ गई कि धनवती को यह युवक पसंद आ गया है। तब उसने मन में सोचा—‘पति की आज्ञा से पुत्र-प्राप्ति के लिए मेरी पुत्री को किसी पुरुष का वरण तो करना ही है, फिर क्यों न इसी युवक से अनुरोध किया जाए ?’ यह सोचकर उसने इच्छित संदेश के साथ भेद जानने वाली एक दासी को भेजा कि वह उस ब्राह्मण युवक को यहां ले आए।

उस दासी ने जाकर उस ब्राह्मण युवक को एकांत में बुलाया और सारी बातें कहीं। उन्हें सुनकर वह व्यसनी ब्राह्मण युवक बोला—‘‘यदि मुझे हंसावली के लिए पाच सौ सोने की मोहरें दे, तो मैं एक रात के लिए वहां जा सकता हूं।’’ उसके ऐसा कहने पर दासी ने यह बात महाजन की स्त्री से कही। महाजन की स्त्री ने उसी के हाथ उतना धन भेज दिया। वह धन लेकर मनःस्वामी उस दासी के साथ महाजन की कन्या उस धनवती के महल में गया, जो एक रात्रि के लिए उसे अर्पित कर दी गई थी।

वहां मनःस्वामी ने अत्यंत उत्कंठित उस कन्या को देखा, जिसने धरती को विभूषित कर रखा था। चकोर जिस प्रकार चांद को देखता है, वैसे ही वह धनवती को देखकर प्रसन्न हुआ। उसने धनवती के साथ समागम करते हुए वह रात बिताई। सवेरा होने पर जिस प्रकार से वह वहां आया ता, उसी प्रकार वहां से निकलकर चला गया। समय पाकर धनवती गर्भवती हुई और उसने मनःस्वामी के अंश-रूप एक सुन्दर बालक को जन्म दिया। बालक के लक्षण उसके उज्ज्वल भविष्य की सूचना दे रहे थे। पुत्र के रूप में उस बालक को पाकर धनवती बहुता संतुष्ट हुई। रात में भगवान शिव ने स्वप्न में उन्हें दर्शन देकर आदेश दिया कि—‘‘सहस्त्र स्वर्णमुद्राओं के साथ, पालने में लेटे हुए इस बालक को सवेरे राजा सूर्यप्रभ के दरवाजे पर छोड़ आओ। इससे इसका और तुम्हारा दोनों का कल्याण होगा।’’ शिव-नी के ऐसा कहने पर वह वणिकपुत्री और उसकी माता जागकर आपस में विचार-विमर्श करने लगी और भगवान की बातों पर विश्वास पर वे राजा सूर्यप्रभ के सिंहद्वार पर उस बालक को स्वर्णमुद्राओं सहित छोड़ आई। उधर भगवान शिव ने पुत्र की चिंता में सदा दुखी रहने वाले राजा सूर्यप्रभ को भी स्वप्न में आदेश दिया—‘‘राजन ! उठो, तुम्हारे सिंहद्वार पर किसी ने पालने में लेटे हुए एक सुंदर बालक को रख दिया है। उसे स्वीकार करो और उसका पुत्रवत् पालन करो।’’

राजा की नींद खुली और उसने सिंहद्वार पर जाकर देखा तो उसे भगवान शिव के कथन की सत्यता का पता चला। बालक के साथ धनराशि भी रखी हुई थी और

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उसके हाथ-पैरों में छत्र, ध्वज आदि के चिन्हों की रेखाएं थीं। वह बालक बहुत ही सुंदर आकृति वाला था।

“भगवान शिव ने मेरे योग्य पुत्र ही मुझे दिया है।” ऐसा कहते हुए राजा ने उस बालक को अपने हाथों में उठा लिया और महल में चला गया। तब राजा ने पुत्र प्राप्ति के उपलक्ष्य में इतना धन गरीबों में लुटाया कि नगर में कोई दरिद्र ही न रहा। नृत्य-वाद्य आदि के साथ राजा ने विधिपूर्वक बालक को अपनाया और उसका नाम रखा—चंद्रप्रभ। राजमहल में हर प्रकार के सुखों के साथ धीरे-धीरे राजकुमार बड़ा होने लगा। जब वह युवक हुआ तो राज ने उसे राज्यभार सौंप दिया और वह तीर्थाटन के लिए वाराणसी चला गया।

नीति जानने वाला उसका पुत्र जब अपनी प्रजा पर धर्मपूर्वक शासन चला रहा था, तभी सूचना मिली कि वाराणसी में उसके पिता का देहान्त हो गया है। पिता की मृत्यु का संवाद पाकर राजा चंद्रप्रभ ने उसके लिए शोक किया तथा उसके लिए श्राद्ध आदि किए। फिर वह धर्मात्मा अपने मंत्रियों से बोला—'पिताजी से भला मैं किस प्रकार उऋण हो सकता हूं। फिर भी मैं अपने हाथों उनका एक ऋण चुकाऊंगा। मैं उनकी अस्थियां ले जाकर विधिपूर्वक गंगा में प्रवाहित करूंगा तथा गया जाकर सभी पित्तरों को पिंडदान दूंगा। मैं इसी प्रसंग में पूर्व समुद्र तक की तीर्थयात्रा भी करूंगा।”

राजा के ऐसा कहने पर उसके मंत्री उससे बोले—'देव ! आपको किसी प्रकार ऐसा नहीं करना चाहिए। आप यदि राज्य को इस प्रकार अरक्षित छोड़कर चले गए तो पीछे से शत्रुओं को राज्य पर आक्रमण करते देर न लगेगी। अतः आप पिता के संबंध में यह कार्य किसी और के हाथों करा लें। एक राजा के लिए प्रजापालन के अतिरिक्त और कोई बड़ा धर्म नहीं है।”

अपने मंत्रियों की बात सुनकर राजा चंद्रप्रभ ने कहा—"हम जो कुछ निश्चय कर चुके हैं, वह अटल है। पिता के लिए मुझे तीर्थयात्रा अवश्य करनी है। इस क्षणभंगुर शरीर का क्या विश्वास ? पता नहीं कब पूज्य पिताजी की तरह मेरा साथ छोड़ दे। अतः मेरा आदेश है कि जब तक मैं इस तीर्थयात्रा से वापस न लौट आऊं, मेरे स्थान पर तुम लोग मेरे राज्य की रक्षा करोगे।”

राजा की यह आज्ञा सुनकर मंत्रिगण चुप ही रहे। तब वह राजा अपनी यात्रा की तैयारियां करने लगा। एक शुभ दिन स्नानादि करके उसने अग्निहोत्र की विधि सम्पन्न की और ब्राह्मणों का पूजन किया। फिर शांत वेश धारण करके जुते हुए रथ में बैठकर उसने नगर से प्रस्थान किया।

जो सामंत, राजपुत्र, नगरवासी तथा ग्रामीण, राजा को छोड़ने सीमान्त तक आए थे, उनकी इच्छा न होने पर भी राजा चंद्रप्रभ ने बड़ी कठिनता से उन्हें समझा-बुझाकर वापस लौटा दिया और मंत्रियों को राज्य-शासन का भार सौंपकर, वाहनों पर आरूढ़ ब्राह्मणों तथा पुरोहितों के साथ वे आगे बढ़े।

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विचित्र प्रकार के वेशों और भाषाओं को देख-सुनकर प्रसन्न होते तथा अनेक प्रकार के देशों को देखते हुए वे सब क्रमशः गंगातट पर जा पहुंचे। राजा ने उस गंगा नदी के देखा, जिसमें जल-कल्लोल से बनने वाली लहरियां, प्राणियों के स्वर्गारोहण के लिए बनाई जा रही सीढ़ियों के समान जा पड़ती थीं। राजा ने रथ से उतरकर विधिपूर्वक पतित-पावनी गंगा में स्नान किया और राजा सूर्यप्रभ की अस्थियां उसमें प्रवाहित कीं।

दान देकर और श्राद्धादि सम्पन्न करके वह फिर रथ पर सवार होकर चल पड़ा और क्रमशः ऋषियों से वंदित प्रयाग में जा पहुंचा। राजा ने वहां उपवास रखकर स्नान, दान, श्राद्ध आदि सभी उत्तम क्रियाएं सम्पन्न कीं और उसके बाद वाराणसी गया। वाराणसी में तीन दिन रुककर विधिपूर्वक सभी धार्मिक क्रियाएं सम्पन्न करके राजा ‘गयाशिर’ नामक स्थान पर पहुंचा। वहां राजा ने पर्याप्त दक्षिणा के साथ विधिपूर्वक श्राद्ध किया और फिर धर्मारण्य चला गया। ‘गया कूप’ में जब वह पिंड देने लगा तो उस पिंड को लेने के लिए उस कुएं के भीतर से मनुष्य के तीन हाथ ऊपर निकले। यह देखकर राजा घबरा गया कि यह क्या बात है ? उसने अपने ब्राह्मणों से पूछा—‘‘इनमें से किस हाथ में मैं पिंड दूं ?’’

तब उन ब्राह्मणों ने राजा से कहा—‘‘राजन, इनमें से एक हाथ तो निश्चित ही किसी चोर का है क्योंकि लोहे की हथकड़ी पड़ी रहने का निशान उसकी कलाई में स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा है। दूसरा हाथ किसी ब्राह्मण का है क्योंकि उसमें ‘पवित्री’ पड़ी हुई है। तीसरा उत्तम हाथ लक्षणों वाले किसी राजा का है क्योंकि उसकी उंगलियों में बहुमूल्य रत्नों से जड़ी कई अंगूठियां पड़ी हैं। अतः हम लोग यह समझ पाने में असमर्थ हैं कि आपको पिंडदान इन तीनों हाथों में से किस हाथ में दिलाएं।’’

ब्राह्मणों के ऐसा कहने पर राजा अनिश्चय में घिर गया और कोई फैसला न कर सका।

राजा विक्रमादित्य के कंधे पर बैठा बेताल इतनी कथा सुनाकर राजा से बोला—‘‘राजन, वे ब्राह्मण और राजा चंद्रप्रभ पिंडदान देने के विषय में कोई निर्णय न ले सके किंतु तुम अवश्य जानते होंगे कि पिंड लेने का अधिकारी कौन था ? जानते हुए भी यदि तुम मेरे इस प्रश्न का उत्तर नहीं दोगे तो तुम्हें पहले वाला ही शाप लगेगा।’’

धर्मज्ञ राजा विक्रमादित्य ने बेताल की यह बात सुनी। तब उसने मौन त्यागकर बेताल को यह उत्तर दिया—‘‘हे योगेश्वर ! राजा चंद्रप्रभ को उस चोर के हाथ में ही पिंड देना चाहिए क्योंकि वह उसी का क्षेत्रज पुत्र था, शेष दोनों का नहीं। उसे जन्म देने वाले ब्राह्मण को उसका पिता नहीं माना जा सकता क्योंकि उसने तो धन लेकर एक रात के लिए स्वयं को बेच दिया था। राजा सूर्यप्रभ ने यद्यपि उसके जातकर्म संस्कार आदि कराए थे और उसका पालन-पोषण भी किया था, फिर भी वह उसका

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पुत्र नहीं माना जा सकता। कारण, जब राजा ने उस बालक को पाया था, तब बच्चे के सिर के पास पालने में जो स्वर्णमुद्राएं रखी हुई उसे मिली थीं, वह उस बालक का अपना ही धन था, जो उसके पालन-पोषण का मूल्य था। अतः उसकी माता जल से संकल्प करके जिसको दी गई थी और जिसने उसे पुत्र उत्पन्न करके ही आज्ञा दी थी तथा अपना सारा धन उसे सौंप दिया था, राजा चंद्रप्रभ उस चोर का ही क्षेत्रज पुत्र था। मेरे विचार से चंद्रप्रभ का उसी के हाथ में पिंड देना उचित था।”

राजा के इस सटीक उत्तर से बेताल संतुष्ट हो गया और पहले की भांति उसके कंधे से उतरकर पुनः उसी शिंशपा-वृक्ष की ओर उड़ गया, जहां से राजा विक्रम उसे लाया था। राजा विक्रमादित्य भी पहले की भांति उसे वापस लाने के लिए उसी स्थान की ओर चल पड़ा।

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बीसवां बेताल: राजा और ब्राह्मण-पुत्र की कथा

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बीसवां बेताल

राजा और ब्राह्मण-पुत्र की कथा

राजा विक्रमादित्य ने शिंशपा-वृक्ष के नीचे जाकर पुनः बेताल को अपने कंधे पर उठाया और अपने गंतव्य की ओर चल पड़ा।

मार्ग में बेताल ने पुनः राजा से कहा—‘‘राजन ! यह तुम्हारा कैसा दृढ़ निश्चय है ? जाकर राज-पाठ का सुख भोगो। तुम मुझे जो उस दुष्ट भिक्षु के पास ले जा रहे हो, यह उचित नहीं है। किंतु यदि तुम्हारा ऐसा ही आग्रह है तो मेरी यह कथा सुन लो।’’

आर्यावर्त्त में अपने नाम को सार्थक करने वाला चित्रकूट नाम का एक नगर है। वहां के लोग वर्ण-व्यवस्था की सीमा का उल्लंघन नहीं करते, अर्थात् सभी वर्णों के लोग अपनी मर्यादा के भीतर रहते हुए ही अपने-अपने कार्य करते हैं।

उस नगर में चंद्रावलोक नाम का एक राजा राज्य करता था। वह राजा बहुत धीर-वीर, गंभीर एवं एक महान योद्धा था। उसकी शूरवीरता की कीर्ति दूर-दूर तक फैली हुई थी। लेकिन जैसा कि कहा गया है, हर व्यक्ति को अपनी समस्त इच्छित वस्तुएं कभी नहीं मिल पातीं। इसी प्रकार समस्त संपत्तियों के होते हुए भी वह राजा चंद्रावलोक इस बात से बहुत दुखी रहता था कि उसे अपनी पसंद के अनुसार पली नहीं मिली थी।

एक दिन वह अपने मन का उद्वेग मिटाने के लिए घोड़े पर सवार होकर अपने अनुचरों के साथ वन में शिकार खेलने गया। वहां उसने कई दुर्दात हिंसक पशुओं का शिकार किया। एक सिंह का शिकार करने की इच्छा से वह अकेला ही उस विकट वन में घुस गया। वहां उसने एक हृष्ट-पुष्ट एवं कद्दावर सिंह को देखा तो लगा जैसे उसका लक्ष्य उसे मिल गया हो। उसने सिंह की ओर कई अचूक तीर छोड़े। उनमें से एक तीर सिंह को जा लगा और वह घबराकर घने जंगल की ओर भाग चला गया। राजा ने भी अपने घोड़े की एड़ लगाई ताकि वह जल्दी से उस सिंह के पास पहुंचकर उसका वध कर सके। किंतु एड़ कुछ ज्यादा ही लग गई। उसका घोड़ा राजा के पांव की एड़ एवं चाबुक की फटकार सुनकर बेहद उत्तेजित हो उठा। सम और विषम भूमि का ध्यान छोड़कर वह वायु-वेग जैसी तीव्रता से दौड़ता हुआ राजा को वहां से दस योजन दूर एक दूसरे प्रदेश में ले आया। वहां पहुंचकर जब घोड़ा रुका, तब राजा को दिशा-भ्रम हो गया। वह किसी प्रकार घोड़े से उतरा और सही दिशा पाने के लिए इधर-उधर भटकने लगा। तभी उसकी निगाह अपने से कुछ आगे एक विशाल सरोवर पर पड़ी। उस सरोवर में कमल खिले हुए थे और भांति-भांति के जलचर उसमें तैरते दिखाई दे रहे थे।

सरोवर के किनारे पहुंचकर राजा ने अपने घोड़े की जीन खोल दी। पहले उसने

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घोड़े को पानी पिलाया और खुला छोड़ दिया ताकि वहा उगी हरी-भरी दूब खाकर वह अपना पेट भर सके। फिर स्वयं स्नान करके जल पिया। थकावट दूर होने पर वह उस रमणीक स्थान में इधर-उधर नजर डालने लगा।

तभी उसकी निगाह एक अशोक-वृक्ष के नीचे अपनी सखी के साथ बैठी एक मुनि-कन्या पर पड़ी। वह फूलों के गहने एवं वल्कल वस्त्र पहने हुए थी। प्राकृतिक श्रृंगार करने से वह बहुत मनोरम प्रतीत हो रही थी। राजा उसके रूप को देखकर मोहित हो गया। उसने मन में सोचा—'अरे कौन है यह ? क्या यह कोई दूसरी सावित्री है जो सरोवर में स्नान करने आई हुई है या शिव की गोद में छूटी पार्वती है जो फिर भगवान शिव को पाने के लिए तपस्या करने आई है ? अथवा यह दिन में अस्त हुए चंद्रमा की कान्ति है, जिसने व्रत धारण कर रखा है। तो मैं धीरे-धीरे इसके पास जाकर वरदान प्राप्त करूं।'

ऐसा सोचकर वह राजा उस कन्या के पास पहुंचा। उस कन्या ने भी जब राजा को अपने निकट आते देखा तो उसकी आंखों में चमक आ गई। फूलों की माला गूंथते उसके हाथ सहसा ही रुक गए। वह सोचने लगी—'ऐसे विकट वन में आने वाला यह पुरुष कौन है ? कोई विद्याधर है या कोई सिद्ध ? इसका रूप तो मेरी आंखों को चकाचौंध किए दे रहा है।'

मन-ही-मन ऐसा सोचकर लज्जा के कारण तिरछी नजरों से देखती हुई, वह उठ खड़ी हुई। यद्यपि उसके पांव जकड़-से गए थे तथापि वह जाने को उद्यत हुई। तब चतुर और विनम्र राजा उसके पास पहुंचा और बोला—"सुन्दरी ! जो व्यक्ति दूर से आया है, जिसे तुमने पहली बार देखा है और जो तुम्हारा दर्शन मात्र चाहता है, उसके स्वागत-सत्कार का तुम आश्रम वासियों का यह कैसा ढंग है कि तुम उससे दूर भागी जा रही हो ?"

राजा के ऐसा कहने पर उस कन्या की सखी ने, जो राजा के समान ही चतुर थी, राजा को वहां बिठाया और उसका आतिथ्य-सत्कार किया। उत्सुक राजा ने विनम्र स्वर में पूछा—"भद्रे ! तुम्हारी इस सखी ने किस पुण्यवान वंश को अलंकृत किया है ? इसके नाम के वे कौन से अक्षर हैं, जो कानों में अमृत उड़ेलते हैं ? और इस निर्जन वन में, पुष्प के समान कोमल अपने शरीर को तपस्वियों जैसी चर्या से क्यों कष्ट दे रही हैं ?"

राजा की यह बातें सुनकर उसकी सखी ने उत्तर दिया—"श्रीमंत ! यह महर्षि कण्व की पुत्री इंदीवर प्रभा है। यह आश्रम में ही पाली-पोसी गई है। इसकी माता स्वर्ग की अप्सरा मेनका है। पिता की आज्ञा से यह इस सरोवर पर स्नान करने के लिए आई है। इसके पिता का आश्रम यहां से अधिक दूर नहीं है।"

राजा यह बातें सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ और घोड़े पर सवार होकर उस कन्या का हाथ मांगने के लिए कण्व ऋषि के आश्रम में पहुंचा।

वहा पहुंचकर राजा ने मुनि के चरणों की वंदना की। मुनि ने भी उसका

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यथोचित स्वागत-सत्कार किया। उसे विश्राम करने के लिए उचित स्थान दिया।

जब राजा विश्राम कर चुका तो मुनि ने उससे कहा—"वत्स चंद्रावलोक ! तुम मेरी एक बात ध्यानपूर्वक सुनो। इस संसार में प्राणियों को मृत्यु से जैसा भय है, उसे तुम भली-भांति जानते हो, फिर भी तुम अकारण ही इन बेचारे मृगों की हत्या क्यों करते हो ? विधाता ने क्षत्रियों का निर्माण तो दुष्टजनों से सज्जनों की रक्षा हेतु ही किया है अतः तुम धर्मपूर्वक राजसुख का भोग करो। हे राजन ! तुम स्वयं ही सोचो कि निर्बल निरीह पशुओं का वध करने से आखिर लाभ ही क्या है ? हे राजा चंद्रावलोक ! क्या तुमने राजा पांडु का वृत्तांत नहीं सुना जिन्हें इसी शौक के कारण शापवश अपने प्राण त्यागने पड़े थे। इसीलिए मैं तुम्हें समझ रहा हूं कि मृगया (आखेट) के बहाने पर निरीह पशुओं का शिकार करना तुरंत बंद कर दो।"

मुनि के बार-बारे ऐसा समझाने का राजा के मन पर भारी प्रभाव पड़ा। उसने मुनि से कहा—"हे मुनिश्रेष्ठ ! आज से पहले किसी ने मुझे इस प्रकार समझाने की चेष्टा नहीं की थी इसीलिए अज्ञानवश मैं ऐसा करता रहा। किंतु मैं वचन देता हूं कि आज के बाद फिर कभी मृगया करने का विचार मन में नहीं लाऊंगा। आज के बाद मेरी ओर से सभी वन-प्राणी अभय हैं।"

यह सुनकर मुनि ने कहा—"राजन ! तुमने वन-प्राणियों को अभयदान दिया, इससे मैं बहुत संतुष्ट हुआ हूं। अतः तुम मुझसे कोई इच्छित वर मांगो।"

मुनि के ऐसा कहने पर समय को जानने वाले राजा चंद्रावलोक ने कहा—"हे मुनिवर ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो आप अपनी कन्या इंदीवर प्रभा को मुझे दे दें।"

राजा के इस प्रकार याचना करने पर मुनि ने अपनी वह कन्या राजा को दे दी, जिसका जन्म एक अप्सरा की कोख से हुआ था और जो सिर्फ राजा के ही योग्य थी।

अनन्तर, उसके साथ विवाह करके राजा वहां से चलने को तैयार हुआ। आश्रम के समस्त मुनिकुमार आंखों में अश्रु लिए उन्हें आश्रम की सीमा तक पहुंचा आए।

जब राजा ने मुनि कण्व और उनके शिष्यों से विदा ली, तब सूर्यास्त होने को ही था। मार्ग में चलते हुए उन्हें रात्रि हो गई लेकिन राजा फिर भी चलता ही रहा।

एक स्थान पर रुककर राजा ने मार्ग में एक पीपल का वृक्ष देखा। तब राजा ने सोचा कि रात्रि में वही विश्राम करना चाहिए। यही सोचकर वह वहीं घोड़े से उतर पड़ा। उस रात वह राजा वहां उस मुनिकन्या के साथ पुष्प शय्या पर सोया।

सुबह जब वह अपने नगर की ओर चलने को हुआ तो अचानक एक ब्रह्मराक्षस से उसका सामना हो गया। उस राक्षस का विकराल शरीर देखकर राजा की पत्नी, वह मुनिकन्या सिहर उठी। वह राक्षस काजल के समान काला था और कालमेघ के समान प्रतीत होता था। उसने अंतड़ियों की माला पहन रखी थी। उस समय वह किसी मनुष्य

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का मांस खा रहा था और उसकी खोपड़ी का रक्त पी रहा था। क्रोध के कारण उसके मुख से अग्नि-सी निकल रही थी। उसकी दाढ़ें बड़ी भयानक थीं।

प्रचंड अट्टहास करके, राजा का तिरस्कार करते हुए वह बोला—“अरे नीच, मैं ज्वालामुखी नाम का राक्षस हूं। पीपल का वह वृक्ष मेरा निवास-स्थान है। देवता भी इसकी अवमानना नहीं कर सकते। मैं रात को जब घूमने-फिरने गया, तभी तूने यहां रात बिताई। अब तू इस अविनय का फल भोग। अरे दुराचारी, वासना से तेरी सुध-बुध जाती रही है। मैं तेरा हृदय निकालकर खाऊंगा और तेरा रुधिर पी जाऊंगा।”

राजा ने ब्रह्मराक्षस की बातें सुनीं। ब्रह्मराक्षस बड़ा भयानक था। राजा ने महसूस किया कि उसे मार डालना किसी भी प्रकार संभव नहीं है, अतः उसने विनयपूर्वक कहा—“अनजाने में मुझसे जो अपराध हुआ है, आप उसे क्षमा कर दें। मैं आपके आश्रय में आया हुआ अतिथि हूं, आपकी शरण में हूं। मैं आपको मनचाहा आखेट ला दूंगा जिससे आपकी तृप्ति हो जाएगी। अतः क्रोध त्यागकर आप प्रसन्न हों।”

राजा की बातें सुनकर राक्षस कुछ शांत हुआ और उससे बोला—“अगर तुम सात दिनों के अंदर मुझे किसी ऐसे ब्राह्मण-पुत्र की भेंट लाकर दो जो सात वर्ष का होने पर भी बड़ा वीर हो, विवेकी हो और अपनी इच्छा से तुम्हारे लिए अपने को दे सके और जब वह मारा जाए तो भूमि पर डालकर उसकी माता उसके हाथ और पिता उसके पांव मजबूती से पकड़े रहें तथा तलवार के प्रहार से तुम्हीं उसे मारो तो मैं तुम्हारे इस अपराध को क्षमा कर दूंगा, नहीं तो राजन मैं शीघ्र ही तुम्हें और तुम्हारे लश्कर को मार डालूंगा।”

प्राण जाने के भय से राजा ने तुरंत उसकी शर्त स्वीकार कर ली। तब वह ब्रह्मराक्षस तत्काल वहां से अन्तर्ध्यान हो गया।

राजा अपनी पत्नी को लिए घोड़े पर सवार होकर आगे चल दिया लेकिन उसका मन बहुत उदास था। वह सोचने लगा—“मैं भी कैसा पागल हूं जो उस ब्रह्मराक्षस की शर्त मान ली। भला वैसा उपहार मुझे मिलेगा भी कहां? मैंने प्राण जाने के भय से व्यर्थ ही उस राक्षस की शर्त स्वीकार की। इससे तो बेहतर था कि वह मुझे ही अपना आहार बना लेता। अब मैं अपने नगर को चलूं और देखूं कि होनहार क्या है?’

राजा ऐसा ही कुछ सोचता जा रहा था कि उसकी सेना उसे खोजती हुई वहां पहुंच गई। तब वह अपनी सेना व अपनी पत्नी के साथ अपने नगर चित्रकूट में आया। राजा को उसके अनुकूल पत्नी मिली है, यह जानकर राजधानी में उत्सव मनाया गया लेकिन मन का दुख मन में ही दबाए हुए राजा ने बाकी दिन बिता दिया।

अगले दिन एकान्त में उसने अपने मंत्रियों से सारा वृत्तांत कह सुनाया।

सुनकर उनमें से सुमति नामक एक मंत्री ने कहा—“राजन, आप चिंता न करें,

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मै वैसा ही उपहार खोजकर ला दूंगा क्योकि यह धरती अनेक आश्चर्यो से भरी पड़ी है। "

राजा को इस प्रकार आश्वासन देकर उस मंत्री ने शीघ्र ही सात वर्ष की उम्र वाले एक बालक की मूर्ति बनवाई। उसने मूर्ति को रत्न से सजाकर एक पालकी में बिठा दिया। फिर वह पालकी इस घोषणा के साथ अनेक नगरो, गांवों में जहां-तहां घुमाई गई—'सात वर्ष का एक ब्राह्मण पुत्र, जो समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए अपनी इच्छा से अपना शरीर एक ब्रह्मराक्षस को सौपेगा और इस कार्य में वह न केवल अपने माता-पिता की अनुमति ही ले लेगा, बल्कि जब वह मारा जाएगाः तब स्वयं उसके माता-पिता उसके हाथ-पैर पकड़े रहेंगे। अपने माता-पिता की भलाई चाहने वाले ऐसे बालक को राजा सौ गांवों के साथ यह सोने और रत्नों से जड़ी मूर्ति भी दे देंगे।'

इस प्रकार जब बालक की वह मूर्ति घुमाई जा रही थी, तब एक ब्राह्मण-पुत्र ने यह घोषणा सुनी। वह बालक बड़ा वीर और अद्भुत आकृति वाला था। पूर्वजन्म के अभ्यास से वह बचपन से ही सदा परोपकार में लगा रहता था। ऐसा जान पड़ता था मानो प्रजा के पुण्य-फल ने ही उसके रूप में शरीर धारण कर रखा हो। ढिंढोरा पीटने वालों के पास जाकर उसने कहा—"प्रजा के हित में मै अपने को अर्पित करूंगा। मै अपने माता-पिता को समझाकर अभी आता हूं।"

उसकी यह बातें सुनकर ढिंढोरा पीटने वाले प्रसन्न हो गए। उन्होंने उसे अनुमति दे दी। घर जाकर बालक ने हाथ जोड़कर अपने माता-पिता से कहा—"समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए मैं अपना यह नश्वर शरीर दे रहा हूं। अतः आप लोग मुझे आज्ञा दें और इस प्रकार अपनी दरिद्रता का भी अंत करें। इसके लिए यहां के राजा सौ गांवों सहित सोने और रत्नों वाली मेरी यह प्रतिकृति (मूर्ति) मुझे देंगे, जिसे मैं आप लोगों को सौंप दूंगा। हे पिताश्री, तब मैं आप लोगों से भी उऋण हो जाऊंगा और पराया कार्य भी सिद्ध कर सकूंगा। दरिद्रता से छुटकारा पाकर आप भी अनेक पुत्र प्राप्त कर सकेंगे।"

पुत्र की यह बातें सुनकर उसके माता-पिता ने कहा—"बेटा ! क्या तू पागल हो गया है जो ऐसी बहकी-बहकी बातें कह रहा है ? भला धन के लिए कौन अपने पुत्र की हत्या करना चाहेगा और कौन बालक अपना शरीर देना चाहेगा ?"

"माता-पिता की यह बातें सुनकर उस बालक ने फिर कहा—"पिताश्री, न तो मेरी बुद्धि नष्ट हुई है और न ही मैं कोई प्रलाप कर रहा हूं। अतः आप मेरी अर्थयुक्त बातें सुनिए। मानव का यह शरीर अपवित्र वस्तुओं से भरा है। जन्म से ही यह जुगुप्सित (व्याधियों का घर) है। अतः शीघ्र ही इसे नष्ट हो जाना है। इसलिए बुद्धिमान लोगों का कहना है कि इस क्षणभंगुर शरीर से संसार में जितना भी पुण्य उपार्जित किया जा सके, वही सार वस्तु है। हे पिताश्री समस्त प्राणियों का उपकार करने से बड़ा और कौन-सा पुण्य हो सकता है ? और उसमें भी अगर माता-पिता की भक्ति हो तो देह-धारण करने का अधिक फल और क्या होगा ?"

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इस तरह की बातें कहकर उस दृढ़प्रतिज्ञ बालक ने शोक करते हुए अपने माता-पिता से अपनी मनचाही बात स्वीकार करा ली। फिर वह राजा के सेवकों के पास गया और वह सुवर्णमूर्ति तथा उसके साथ सौ गांवों का दानपत्र लाकर अपने माता-पिता को दे दिया। इसके पश्चात् उन राजसेवकों को आगे करके अपने माता-पिता के साथ वह शीघ्रतापूर्वक राजा के साथ चित्रकूट की ओर चल पड़ा।

चित्रकूट में जब राजा चंद्रावलोक ने अखंडित तेज वाले उस बालक को देखा, तब वह बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने फूलों और चन्दन के लेप से बालक को सजाया और उसे हाथी की पीठ पर बैठाकर, उसके माता-पिता के साथ उस ब्रह्मराक्षस के स्थान पर ले गया।

उस पीपल के वृक्ष के निकट बेदी बनाकर राजा के पुरोहित ने विधिपूर्वक जैसे ही अग्नि में आहुति डाली, त्योंही अट्टहास करता हुआ, मंत्र पढ़ता हुआ, वह ब्रह्मराक्षस प्रकट हुआ। लाल रंग की मदिरा पीने के कारण उन्मत्त होकर वह झूम रहा था, जम्हाइयां ले रहा था और तेजी से सांसें छोड़ रहा था। उसकी आंखें जल रही थीं, मुख से ज्वाला निकल रही थी और उसके शरीर की छाया से दिशाओं में अंधकार-सा फैला प्रतीत होने लगा था।

राजा चंद्रावलोक ने उसे देखकर नम्रतापूर्वक कहा—“भगवन् आज मेरी प्रतिज्ञा का सातवां दिन है। अपने वचन के अनुसार मै यह मानव उपहार आपके लिए लाया हूं। अतः आप प्रसन्न होकर विधिपूर्वक उसे ग्रहण करें।”

राजा के इस प्रकार निवेदन करने पर ब्रह्मराक्षस ने अपनी जीभ से होंठों के किनारों को चाटते हुए उस ब्राह्मण ने बालक की ओर देखा। यह देखकर भी वह बालक तनिक भी नहीं डरा बल्कि यही सोचने लगा कि 'इस प्रकार अपने शरीर का दान करके मैंने जो पुण्य अर्जित किया है, उससे मुझे ऐसा स्वर्ग अथवा मोक्ष नहीं मिलना चाहिए जिससे दूसरों का उपकार न होता हो, बल्कि जन्म-जन्मांतर में मेरा यह शरीर परोपकार के काम में ही आए।' ज्योंही ही उसने मन में यह बातें सोचीं, त्योंही क्षण भर में फूल बरसाते हुए देवसमूह के विमानों से आकाश भर गया।

अनन्तर, उस बालक को ब्रह्मराक्षस के सम्मुख लाया गया। मां ने उसके हाथ पकड़े और पिता ने पैर। इसके बाद ज्योंही राजा तलवार उठाकर उसे मारने चला, त्योंही उस बालक ने ऐसा अट्टहास किया कि ब्रह्मराक्षस सहित सब लोग विस्मय में पड़ गए। अपना-अपना काम छोड़कर हाथ जोड़कर वे उस बालक का मुंह देखने लगे।

इस प्रकार, यह विचित्र और सरस कथा सुनाकर बेताल ने फिर राजा विक्रमादित्य से पूछा— “राजन ! अब तुम मेरे इस प्रश्न का उत्तर दो कि प्राणान्त के ऐसे समय में भी वह बालक क्यों हंसा था ? मुझे इस बात का बहुत कौतूहल है। जानते हुए भी यदि तुम इसका कारण नहीं बताओगे तो तुम्हारा सिर अनेक टुकड़ों में खंड-खंड होकर बिखर जाएगा।”

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बेताल की यह बात सुनकर राजा ने कुछ इस प्रकार उसका निराकरण किया—‘‘हे बेताल ! जो प्राणी दुर्बल होता है, वह भय के उपस्थित होने पर अपने प्राणों की रक्षा के लिए अपने माता-पिता को पुकारता है। उनके न होने पर राजा को पुकारता है क्योंकि आर्तजनों की रक्षा के लिए ही तो राजा बनाए जाते हैं। यदि उसे राजा का भी सहारा नहीं मिलता तो फिर वह अपने कुलदेवता का स्मरण करता है। उस बालक के तो सभी सहायक वहां उपस्थित थे लेकिन वे सब-के-सब प्रतिकूल हो गए थे। माता-पिता ने धन के लोभ में उस बालक के हाथ-पैर पकड़ रखे थे। राजा अपने प्राणों की रक्षा के लिए स्वयं उसका वध करने को उद्यत था और वहां देवता के रूप में जो ब्रह्मराक्षस था, वही उसका भक्षक था। जो शरीर नाशवान है, जिसका अंत कड़वा है तथा जो अधिकाधिक जर्जर है, उसके लिए भी उन मूढ़मति वाले लोगों की ऐसी विडम्बना देखकर उसे आश्चर्य हुआ। जिन शरीरों में ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र और शंकर का निवास होता है, वे भी अवश्य नष्ट हो जाते हैं और उसी शरीर को स्थिर बनाए रखने की इन सबमें कैसी विचित्र वासना है ! वह बालक उन लोगों की देह-ममता की यह विचित्रता देखकर अचरज में पड़ गया और अपनी अभिलाषा को पूर्ण जानकर प्रसन्न हुआ और इसी आश्चर्य व प्रसन्नता से वह हंस पड़ा था।’’

राजा विक्रमादित्य जब ऐसा कहकर चुप हो गए, तब वह बेताल अपनी माया के बल से विक्रमादित्य के कंधे से गायब होकर फिर अपनी जगह पर जा पहुंचा। राजा भी बिना आगा-पीछा देखे शीघ्रतापूर्वक पुनः उसके पीछे-पीछे चल पड़ा।

बड़े लोगों का हृदय समुद्र के समान होता है, उसे किसी भी तरह से क्षुब्ध नहीं किया जा सकता।

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इक्कीसवां बेताल: अनंगमंजरी व मणिवर्मा की कथा

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इक्कीसवां बेताल

अनंगमंजरी व मणिवर्मा की कथा

राजा विक्रमादित्य फिर उसी शिंशपा-वृक्ष के निकट पहुंचा। बेताल की वृक्ष से उतारा और उसे कंधे पर लादकर लौट पड़ा। मार्ग में बेताल ने फिर राजा को एक रोचक कथा सुनाई।

विशालपुर नाम की एक नगरी में पद्मनाम नामक एक महाप्रतापी राजा राज करता था। उसकी नगरी में अर्थदत्त नाम का एक व्यापारी भी रहता था, जिसने अपने वाणिज्य-कौशल से अकूत सम्पदा एकत्रित की हुई थी। अर्थदत्त की एक ही संतान थी—अनंगमंजरी नाम की एक अजीब सुन्दर कन्या। अनंगमंजरी जब विवाह योग्य हुई तो उसके पिता ने ताम्रलिप्ति नगर के एक संभ्रान्त व्यापारी युवक मणिवर्मा से उसका विवाह कर दिया। अपनी पुत्री से अधिक स्नेह करने के कारण अर्थदत्त ने उसे उसकी ससुराल नहीं भेजा बल्कि अपने दामाद को वहीं रहने के लिए बुला लिया। जैसे किसी रोगी को कड़वी व तीखी दवाएं अप्रिय लगती हैं, उसी प्रकार अनंगमंजरी को अपना पति मणिवर्मा भी अप्रिय जान पड़ता था, लेकिन मणिवर्मा को अपनी पत्नी प्राणों से भी अधिक प्रिय थी। वह हर समय इसी प्रयास में लगा रहता था कि उसकी अतीव सुन्द पत्नी को कोई कष्ट न होने पाये।

एक बार अपने माता-पिता से मिलने के लिए मणिवर्मा ताम्रलिप्ति चला गया और काफी दिन तक वहीं रहता रहा। उन्हीं दिनों एक बार जब अनंगमंजरी अपनी विश्वस्त सखियों के साथ अपने भवन के एक ऊंचे झरोखे में बैठी थी। उसने नीचे एक गली में एक सुन्दर और तरुण ब्राह्मण कुमार को आते देखा। उसके चेहरे का तेज देखकर वह उसकी ओर आकर्षित हो गई। वह राजपुरोहित का पुत्र था और उसका नाम था—कमलाकर। कमलाकर ने भी ऊंचे झरोखे में बैठी अनंगमंजरी को देखा तो वह उसके रूप पर मुग्ध हो गया। वह कुछ क्षण उसी की ओर टकटकी लगाए देखता रहा, फिर एक मनोहारी मुस्कान उसकी ओर फेंकता हुआ वह वहां से चला गया। अनंगमंजरी उसकी मधुर मुस्कान पर जैसे मर मिटी। कमलाकर उसके मन पर काम-बाण चला गया था। उस दिन से सारी सुध-बुध खोकर वह उसी की याद में विदग्ध रहने लगी। उसका खाना-पीना छूट गया और वह लज्जा, भय एवं विरहोन्माद में दुबली तथा पीली पड़ गई।

प्रिय मिलन बड़ा कठिन था। अनंगमंजरी निराश-सी हो गई थी। कमलाकर को पाने की लालसा में वह एक दिन इतनी व्याकुल हो गई कि उसने प्राण त्यागने का ही निश्चय कर डाला। एक रात वह चुपके से अपनी कुलदेवी चामुंडा के मंदिर में पहुंची और वहां देवी के सम्मुख हाथ जोड़कर विनती की—'हे देवी ! इस जन्म में तो मैं कमलाकर को पति रूप में

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पा नहीं सकती किंतु मुझे आशीर्वाद दो कि अगले जन्मो मे वह मेरा ही पति हो।"

देवी के सम्मुख ऐसा कहकर उसने अपनी पिछौरी से एक फंदा तैयार किया और उसे एक अशोक-वृक्ष की शाखा में लटका दिया। इसी बीच महल मे जब उसकी अंतरंग सखी मालतिका की नींद खुली और उसने अनंगमंजरी को वहां न देखा तो वह उसे ढूंढने निकल पड़ी। मंदिर के समीप जब उसने अनंगमंजरी को अपनी गरदन में फंदा डालते देखा तो वह घबरा उठी और दौड़ती हुई उसके समीप जा पहुंची। उसने उसके गले में फांसी का फंदा निकाला और व्यग्र स्वर में अनंगमंजरी से पूछा—"सखी, ऐसी क्या बात हो गई जिसके कारण तुम अपनी जान देने पर तैयार हो गई। देखो, मैं तुम्हारी सखी हूं, तुम्हारी हितैषी। मुझे अपना दुख बता दो, मैं अपने प्रयास से तुम्हारा दुख दूर करने की कोशिश करूंगी।"

तब अनंगमंजरी ने अपने मन की सारी व्यथा सुनाकर उससे कहा—"सखी, मेरे हृदय में उस तरुण के न मिलने से विरह की अग्नि जल रही है। यदि तुम मुझे जीवित देखना चाहती हो तो मुझे मेरे प्रियतम से मिला दो।"

अनंगमंजरी के ऐसा कहने पर मालतिका ने उसे आश्वासन दिया—"सखी, आज तो बहुत रात हो गई है। सवेरा होने पर मैं कुछ प्रबंध करूंगी और तुम्हारे प्रियतम को इसी जगह बुला दूंगी। इस बीच तुम धीरज धरो और अपने घर जाओ।"

सवेरा होने पर मालतिका छिपती-छिपाती कमलाकर के पास पहुंची। वह उस समय बगीचे में एक वृक्ष के नीचे चन्दन जल से भीगे कमल-पत्रों की शय्या पर लेटा हुआ था। उसका एक घनिष्ठ मित्र, जो उसके सारे रहस्य जानता था, काम-ज्वाला में जलते हुए अपने मित्र को केले के पत्ते से हवा कर रहा था। यह दृश्य देखकर मालतिका ने सोचा कि 'क्या मेरी सखी अनंगमंजरी के विरह में ही इसकी यह दशा हो रही है?' ऐसा सोचकर वह सत्य का पता लगाने के लिए एक वृक्ष के पीछे छिप गई।

उसी समय कमलाकर के उस मित्र ने कहा—"मित्र, जरा देर तुम इस सुहावने बगीचे को देखकर अपना जी बहलाओ और अपने हृदय में जलती हुई विरह-वेदना की आग को ठंडा करने की कोशिश करो। मैं अभी आता हूं।" ऐसा कहकर उसका मित्र जाने के लिए उद्यत हुआ लेकिन उसे रोककर कमलाकर ने कहा—"मित्र, कैसे बहलाऊं अपने मन को। उस व्यापारी की कन्या ने मेरे मन को चुराकर मुझे सूना कर दिया है। मेरे सूने हृदय को कामदेव ने अपने बाणों का तरकस बना दिया है इसलिए तुम कोई ऐसा उपाय करो, जिससे मैं उसे पा सकूं।"

कमलाकर की ऐसी बातें सुनकर मालतिका का संदेह जाता रहा। वह अपने छिपे स्थान से निकली और कमलाकर के समीप जाकर बोली—"भद्र, मुझे अनंगमंजरी ने आपके पास भेजा है। उसने संदेश दिया है कि यदि शीघ्र ही आप उससे न मिले तो वह अपने प्राण त्याग देगी। आपके विरह में उसकी बहुत बुरी दशा हो रही है। शरीर सूख गया है और उसके चेहरे की कांति आभाहीन हो गई है। यदि

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आप उसे बचाना चाहते है तो जैसा मै कहू वैसा ही करे। ''

इस पर विरह की आग में जलते हुए कमलाकर पर मानो अमृत की वर्षा हो गई। उसने तुरंत उससे अपनी सहमति व्यक्त कर दी।

तब मालतिका ने कहा—''आज रात को मै गुप्त रूप से अनंगमंजरी को उसके महल के बगीचे में ले आऊंगी। आप वहीं बाहर ठहरियेगा, उसके बाद मैं कोई उपाय करके आपको भी भीतर बुला लूगी और इस तरह आप दोनो का मनचाहा मिलन हो सकेगा। ''

इस प्रकार मालतिका ने अपनी बातों से उस ब्राह्मण-पुत्र को प्रसन्न किया ! अपना काम पूरा करके वह वापस लौटी और उसने अनंगमंजरी को भी आनंदित किया।

उस रात जब वह कामी और उत्कंठित कमलाकर सज-धजकर अपनी प्रिया के गृहोद्यान के दरवाजे पर पहुंचा तो मालतिका उसे युक्तिपूर्वक उस उद्यान में ले गई। कमलाकर ने अनंगमंजरी को एक आम्रकुंज की छाया में बैठे हुए देखा। बटोही जिस प्रकार छाया को देखकर खिल उठता है, वैसा ही कुछ हाल उस समय कमलाकर का हुआ। उसे देखकर कमलाकर का चेहरा खिल उठा। वह आगे बढ़ ही रहा था कि अनंगमंजरी ने उसे देख लिया। काम के आवेग ने उसकी लज्जा नष्ट कर दी थी। उसने दौड़कर कमलाकर को गले से लगा लिया—''कहां जाते हो ? मैंने तुम्हें पा लिया है ! '' ऐसा कहकर अनंगमंजरी प्रलाप करने लगी। अत्यधिक प्रसन्नता के मारे उसकी सांस रुक गई और उसके प्राण जाते रहे।

वायु से छिन्न लता के समान वह धरती पर गिर पड़ी। अहा ! प्रेम का पंथ भी निराला है, जिसका परिणाम सदा दुखदायी ही होता है। यह आकस्मिक और भयावह वज्रपात देखकर—''हाय-हाय, यह क्या हो गया ?'' कहता हुआ कमलाकर भी मूर्छित होकर गिर पड़ा। कुछ क्षणों बाद जब उसे चेतना आई, तब उसने अपनी प्रिया को गोद में ले लिया और उसका आलिंगन तथा चुम्बन करता हुआ अनेक प्रकार से विलाप करने लगा।

कठोर दुख की अधिकता से वह इतना विकल हो गया कि पलक झपकते ही उसका हृदय फट गया और उसकी भी मृत्यु हो गई। मृत्यु को प्राप्त हुए दोनों प्रेमियों के लिए मालतिका जब शोक कर रही थी, तब मानो शोक के कारण ही रात भी समाप्त हो गई।

सवेरा होने पर, बगीचे के रखवालो से सारा समाचार जानकर उन दोनों के परिवार के लोग लज्जा, आश्चर्य, दुख और मोह से विकल होते हुए वहां आए। खेद से मस्तक झुकाए दोनों पक्ष के लोग बहुत देर तक इस दुविधा में पड़े रहे कि अब क्या करना चाहिए। सच है, बुरी स्त्रियां कुल को बिगाड़ने वाली और सन्तापदायक ही होती है।

इसी बीच उसका पति मणिवर्मा, अनंगमंजरी के लिए उत्कंठित, ताम्रलिप्ति से लौट आया।

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पत्नी को याद करता हुआ वह भी बगीचे में जा पहुंचा। वहां उसने अपनी स्त्री को पर-पुरुष के निकट मरी हुई देखा। फिर भी उस पर अत्यंत अनुराग होने के कारण हृदय मे शोक की अग्नि जल उठी और उसने भी वहीं पर अपने प्राण त्याग दिए।

तत्पश्चात्, वहां इकट्ठे हुए लोगों की चीख-पुकार सुनकर नगर के सभी लोगों को सारा वृत्तांत मालूम हो गया और वे विस्मित होते हुए वहां आ पहुंचे। अनंगमंजरी के पिता ने चामुंडा देवी का जो मंदिर बनवाया था, वह निकट ही था। यह दृश्य देखकर गणों ने देवी से निवेदन किया—'‘हे देवी ! अर्थदत्त ने ही यहां आपकी प्रतिष्ठा की है। यह व्यापारी सदा से ही आपका भक्त रहा है। अतः इस दुख के समय इस पर दया करें।’'

गणों की प्रार्थना सुनकर देवी ने उन्हें पुनर्जीवित होने का आशीर्वाद प्रदान कर दिया। देवी की कृपा से वे तीनों ही इस प्रकार जीवित हो उठे मानो सोते से जाग पड़े हों। अब उनके काम-विकार भी नष्ट हो चुके थे।

यह आश्चर्यजनक घटना देखकर वहां उपस्थित सभी लोग बहुत आनंदित हुए। कमलाकर लज्जा से मस्तक झुकाकर अपने घर चला गया। अर्थदत्त भी लजाई हुई अपनी कन्या को उसके पति सहित घर ले गया।

उस रात को मार्ग में जाते हुए बेताल ने यह कथा सुनाकर पृथ्वीपति विक्रमादित्य से पुनः पूछा— “राजन, अब तुम मेरी इस शंका का समाधान करो कि प्रेम में अंधे बने हुए उन तीनों में से किसकी आसक्ति अधिक थी ? अनंगमंजरी को कमलाकर की अथवा अनंगमंजरी के पति मणिवर्मा की ? यदि जानते हुए भी तुमने मेरी शंका का समाधान नहीं किया तो मेरा वही शाप तुम पर फट पड़ेगा।”

बेताल की यह बातें सुनकर राजा ने उत्तर दिया—‘‘हे बेताल ! मुझे तो इन तीनों में से मणिवर्मा ही अधिक मोहान्ध जान पड़ता है। कारण यह कि शेष दोनों तो एक-दूसरे के प्रति अनुरक्त थे और समय पाकर उनकी आसक्ति पक्की हो चुकी थी, अतः उन दोनों ने प्राण त्याग दिए, तो ठीक ही था; लेकिन मणिवर्मा तो बहुत ही मोहान्ध था। उसको तो पर-पुरुष के प्रति आसक्त अपनी पत्नी पर क्रोध करना चाहिए था। लेकिन ऐसा न करके उसकी प्रीति के कारण शोक से उसने अपने प्राण ही त्याग दिए थे, अतः सबसे ज्यादा मोहान्ध वही हुआ। उसी की आसक्ति सबसे अधिक थी।‘’

राजा का उत्तर बिल्कुल सटीक था, अतः बेताल संतुष्ट हो गया और पहले की ही भांति अपनी माया से राजा के कंधे से उतरकर अन्तर्ध्यान हो गया। तत्पश्चात् फिर वह उसी शिंशपा-वृक्ष पर जाकर उलटा लटक गया। दृढ़ निश्चयी राजा विक्रमादित्य भी पुनः उसे लाने के लिए उस शिंशपा-वृक्ष की ओर दौड़ चला।

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