बेताल पच्चीसी
Betal Pachisi
by महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट
Page 7 of 151
Read in contextहोकर अपने घर चला गया। जब अमावस्या आई, तो राजा को भिक्षु को दिए अपने वचन का स्मरण हो आया और वह नीले कपड़े पहन, माथे पर चंदन लगाकर तथा हाथ में तलवार लेकर गुप्त रूप से राजधानी से निकल पड़ा। राजा उस श्मशान में पहुंचा, जहां भयानक गहरा और घुप्प अंधेरा छाया हुआ था। वहां जलने वाली चिताओं की लपटें बहुत भयानक दिखाई दे रही थीं। असंख्य नर-कंकाल, खोपड़ियां एवं हड्डियां इधर-उधर बिखरी पड़ी थीं। समूचा श्मशान भूत-पिशाचों से भरा पड़ा था और सियारों की डरावनी आवाजें श्मशान की भयानकता को और भी ज्यादा बढ़ा रही थीं। निर्भय होकर राजा ने वहां उस भिक्षु को ढूंढा। भिक्षु एक वट-वृक्ष के नीचे मंडल बना रहा था। राजा ने उसके निकट जाकर कहा—‘‘भिक्षु, मैं आ गया हूं। बताओ, मुझे क्या करना होगा?’’ राजा को उपस्थित देखकर भिक्षु बहुत प्रसन्न हुआ। उसने कहा—‘‘राजन ! यदि आपने मुझ पर इतनी कृपा की है तो एक कृपा और कीजिए, आप यहां से दक्षिण की ओर जाइए। यहां से बहुत दूर, श्मशान के उस छोर पर आपको शिंशपा (शीशम) का एक विशाल वृक्ष मिलेगा। उस पर एक मरे हुए मनुष्य का शरीर लटक रहा है। आप उस शव को यहां ले आइए और मेरा कार्य पूरा कीजिए। ’’ राजा विक्रमादित्य भिक्षु की बात मानकर वहां से दक्षिण की ओर चल पड़े।
जलती हुई चिताओं के प्रकाश के सहारे वे उस अंधकार में आगे बढ़ते गए और बड़ी कठिनाई से उस वृक्ष को खोज पाए। वह वृक्ष चिताओं के धुएं के कारण काला पड़ गया था। उससे जलते हुए मांस की गंध आ रही थी। उसकी एक शाखा पर एक शव इस प्रकार लटका हुआ था जैसे किसी प्रेत के कंधे पर लटक रहा हो। राजा ने वृक्ष पर चढ़कर अपनी तलवार से डोरी काट डाली और शव को जमीन पर गिरा दिया। नीचे गिरकर वह शव बड़ी जोर से चीख उठा, जैसे उसे बहुत पीड़ा पहुंची हो। राजा ने समझा कि वह मनुष्य जीवित है। राजा को उस पर दया आई। अचानक उस शव ने जोर से अट्टहास किया। तब राजा समझ गया कि उस पर बेताल चढ़ा हुआ है। राजा उसके अट्टहास करने का कारण जानने की कोशिश कर रहा था कि अचानक शव में हरकत हुई और वह हवा में उड़ता हुआ पुनः उसी शाखा पर जा लटका। इस पर राजा एक बार फिर से वृक्ष पर चढ़ा और शव को पुनः नीचे उतार लिया। फिर राजा ने उस शव को अपने कंधे पर डाला और खामोशी से भिक्षु की ओर चल पड़ा। कुछ दूर चलने पर राजा के कंधे पर सवार शव के अंदर का बेताल बोला—‘‘राजन, मुझे ले जाने के लिए तुम्हें बहुत परिश्रम करना पड़ रहा है। तुम्हारे श्रम के कष्ट को दूर करने एवं समय बिताने के लिए मैं तुम्हें एक कथा सुनाना चाहता हूं। किंतु कथा के दौरान तुम मौन ही रहना। यदि तुमने अपना मौन तोड़ा तो मैं तुम्हारी पकड़ से छूटकर पुनः अपने स्थान को लौट जाऊंगा। राजा द्वारा सहमति जताने पर बेताल ने उसे एक रोचक कथा सुनाई।
8 □ बेताल पच्चीसी