Skip to content
BharatKosha
बेताल पच्चीसी

बेताल पच्चीसी

Betal Pachisi

by महाकवि सोमदेव / बेताल भट्ट

DevanagariHindipublished151 pages

Page 8 of 151

Read in context
Page 8

प्रथम बेताल

पद्मावती की कथा कथा

आर्यावर्त्त में वाराणसी नाम की एक नगरी है, जहां भगवान शंकर निवास करते हैं। पुण्यात्मा लोगों के रहने के कारण वह नगरी कैलाश-भूमि के समान जान पड़ती है। उस नगरी के निकट अगाध जल वाली गंगा नदी बहती है जो उसके कंठहार की तरह सुशोभित होती है। प्राचीनकाल में उस नगरी मे एक राजा राज करता था, जिसका नाम था प्रताप मुकुट।

प्रताप मुकुट का वज्रमुकुकट नामक एक पुत्र था जो अपने पिता की ही भांति बहुत धीर, वीर और गंभीर था। वह इतना सुंदर था कि कामदेव का साक्षात् अवतार लगता था। राजा के एक मंत्री का बेटा बुद्धिशरीर उस वज्रमुकुट का घनिष्ठ मित्र था। एक बार वज्रमुकुट अपने उस मित्र के साथ जंगल में शिकार खेलने गया। वहां घने जंगल के बीच उसे एक रमणीक सरोवर दिखाई दिया, जिसमें बहुत-से कमल के सुंदर-सुंदर पुष्प खिले हुए थे। उसी समय अपनी कुछ सखियों सहित एक राजकन्या वहां आई और सरोवर में स्नान करने लगी। राजकन्या के सुंदर रूप को देखकर वज्रमुकुट उस पर मोहित हो गया। राजकन्या ने भी वज्रमुकुट को देख लिया था और वह भी पहली ही नजर में उसकी ओर आकृष्ट हो गई। राजकुमार वज्रमुकुट अभी उस राजकन्या के बारे में जानने के लिए सोच ही रहा था कि राजकन्या ने खेल-खेल में ही उसकी ओर संकेत करके अपना नाम-धाम भी बता दिया। उसने एक कमल के पत्ते को लेकर कान में लगाया, दंतपत्र से देर तक दांतों को खुरचा, एक दूसरा कमल माथे पर तथा हाथ अपने हृदय पर रखा। किंतु राजकुमार ने उस समय उसके इशारों का मतलब न समझा।

उसके बुद्धिमान मित्र बुद्धिशरीर ने उन इशारों का मतलब समझ लिया था, अतः मंद-मंद मुस्कराता हुआ अपने मित्र की हालत देखता रहा, जो उस राजकन्या के प्रेमबाण से आहत होकर, राजकन्या और उसकी सखियों को वापस जाते देख रहा था।

राजकुमार घर लौटा तो वह बहुत उदास था। उसकी दशा जल बिन-मछली की भांति हो रही थी। जब से वह शिकार से लौटा था, उस राजकन्या के वियोग में उसका खाना-पीना छूट गया था। राजकुमारी की याद आते ही उसका मन उसे पाने के लिए बेचैन होने लगता था।

एक दिन बुद्धिशरीर ने राजकुमार से एकान्त में इसका कारण पूछा। कारण जानकर उसने कहा कि उसका मिलना कठिन नहीं है। तब राजकुमार ने अधीरता से कहा—"जिसका न तो नाम-धाम मालूम है और न जिसके कुल का ही कोई पता है, वह भला कैसे पाई जा सकती है? फिर तुम व्यर्थ ही मुझे भरोसा क्यों दिलाते हो?"


बेताल पच्चीसी ❒ 9