भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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पृष्ठ 438
४०६भैषज्यरत्नावली ।[ अग्निमान्द्य-

बडीबडी १०० हरडोंको लेकर मट्ठेमें भिगोदेवे। जब अच्छे प्रकारसे वे फूल जाय तब उनकी गुठलियाँ निकालडाले। फिर पीपल, पीपलामूल, चव्य, चीतेकी जड, सोंठ, मिरच, पाँचोंनमक, अजवायन, अजमोद, जवाखार, सज्जी, सुहागा, हींग और लौंग इन प्रत्येक औषधिके दो दो कर्ष परिमाण लेकर बारीक पीसकर भरदेवे। पश्चात् उन हरडोंको चूकेके रसमें और जम्बीरी नीम्बूके रसमें तीन तीन दिनतक भावना देवे। इनमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक हरड खानेसे सर्व प्रकारका अजीर्ण दूर होता है। यह हरीतकीप्रयोग चारों प्रकारके अजीर्ण, मन्दाग्नि, विषूचिका, वायुगोला, शूल प्रभृति रोगोंको निश्चय नष्ट करता है ॥ १७७-१८० ॥

अमृता-हरीतकी ।

तक्रे समुत्स्वेद्य शिवाशतानि तद्वीजमुद्धृत्य च कौशलेन ।
षडूषणं पञ्च पटूनि हिङ्गु क्षारावजाजीमजमोदकं च ॥ ८१ ॥
षडूषणास्त्रिवृदद्धभागा गणस्य देया स्वरगालितस्य ।
विभाव्य चुक्रेण रजांस्यमीषां क्षिपेच्छिवाबीजनिवासगर्भे ८२
समूह्य घर्मे च विशोष्य तासां हरीतकीमन्यतमां निषेवेत ।
अजीर्णमन्दानलजाठरामयान सगुल्मशूलग्रहणीगुदाङ्कुरान् ॥
विबन्धमानाहरुजौ जयत्यसौतथामवातांस्त्वमृताहरीतकी ८४

बडी बडी सौ हरडोंको मट्ठेमें उबालकर उनकी गुठलियोंको निकाल डाले। फिर सोंठ, पीपल, मिरच, पीपलामूल, चव्य, चीता, पाँचोंनमक, हींग, जवाखार, सज्जी, कालाजीरा और अजमोद इन सबका चूर्ण दो दो तोले एवं निसोतका चूर्ण १ तोला लेवे। इन सब औषधियोंके चूर्णको चूकेके द्वारा भावना देकर उक्त हरडोंमें भरदेवे और उनको धूपमें सुखाकर रखदेवे। उनमेंसे प्रतिदिन प्रातःकाल एक एक हरड भक्षण करे तो यह अमृता-हरीतकी अजीर्ण, मन्दाग्नि, उदरविकार, गुल्मशूल, ग्रहणी, बवासीरके अंकुर, मलविबन्ध और आनाह इन समस्त रोगोंको शीघ्र दूर कर देती है ॥ ८१-८४ ॥

शार्दूलकाञ्जिक ।

पिप्पलीं शृङ्गवेरं च देवदारु सचित्रकम् ।
चविकां बिल्वपेशीं च अजमोदं हरीतकीम् ॥ ८५ ॥
महौषधं यमानीं च धान्यकं मरिचं तथा ।
जीरकं चापि हिङ्गुं च काञ्जिकं साधयेद्भिषक् ॥ ८६ ॥