भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
पृष्ठ 458, कुल 1416 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४२६ | भैषज्यरत्नावली । | [ पाण्डु-आदि- |
|---|
सप्तरात्रं गवां मूत्रे भावितं चाप्ययोरजः ।
पाण्डुरोगप्रशान्त्यर्थं पयसा प्रपिबेन्नरः ॥ ७ ॥
पित्तज पाण्डुरोगमें निसोतका चूर्ण दो तोले और मिश्री २ तोले मिलाकर सेवन करे। कफज पाण्डुरोगमें हरडको रात्रिमें गोमूत्रमें भिजोकर प्रातःकाल गोमूत्रमें पीसकर पान करे अथवा सोंठ, लोहभस्म, पीपलका चूर्ण, हरडका चूर्ण, शुद्ध शिला-जीत, शुद्ध गूगल, इनमेंसे किसी एक औषधिको गोमूत्रके साथ उचित मात्रासे सेवन करनेसे पाण्डुरोग दूर होता है। लोहभस्मको गोमूत्रमें सात दिनतक भावना देकर दूधके साथ पान करनेसे पाण्डुरोग शमन होता है।
अयस्तिलत्र्यूषणकोलभागैः सर्वैः समं माक्षिकधातुचूर्णम् ।
तैर्मोदकः क्षौद्रयुतोऽनुतक्रः पाण्ड्वामये दूरगतेऽपि शस्तः ॥८॥
लोहकी भस्म, काले तिल, सोंठ, मिरच, पीपल, प्रत्येक औषधि एक एक तोला लेवे और इन सबकी बराबर शुद्ध सोनामाखीका चूर्ण लेवे। सबका एकत्र चूर्ण करके शहदमें मिलाकर लड्डू बनालेवे। इनमेंसे प्रतिदिन एक एक लड्डू तक्रके साथ सेवन करे। ये मोदक पुराने पाण्डुरोगमें अथवा रोगके दूर होजानेपर भी सेवन करने हितकारी हैं ॥ ८ ॥
लौहपात्रे शृतं क्षीरं सप्ताहं पथ्यभोजनः ।
पिबेत्पाण्ड्वामयी शोषी ग्रहणीदोषपीडितः ॥ ९ ॥
पाण्डुरोगी, क्षयी और संग्रहणीवाले रोगी एक सप्ताहपर्यन्त लोहेके पात्रमें चौगुने जलके साथ पकाया हुआ गोदुग्ध पान करे और पथ्य पदार्थोंका भोजन करे तो उक्त रोग नष्ट होते हैं ॥ ९ ॥
अयोमलं तु सन्तप्तं भूयो गोमूत्रशोधितम् ।
मधुसर्पिर्युतं चूर्णं सह भक्तेन योजयेत् ।
दीपनं चाग्निजननं शोथपाण्ड्वामयापहम् ॥ १० ॥
मण्डूरभस्मको सात बार अग्निमें तपाकर सातबार गोमूत्रमें बुझावे। फिर उसका बारीक चूर्ण करके शहद, घृत और भातके साथ मिलाकर सेवन करनेसे अत्यन्त दीपन होती है एवं शोथ और पाण्डुरोग दूर होते हैं ॥ १० ॥
कामला-चिकित्सा ।
रेचनं कामलार्त्तस्य स्निग्धस्यादौ प्रयोजयेत् ।
ततः प्रशमनी कार्या क्रिया वैद्येन जानता ॥ ११ ॥