भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)
Bhaishajya Ratnavali Hindi
कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा
स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ४४० | भैषज्यरत्नावली । | [ पाण्डु-आदि- |
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कुष्ठान्यज्वरकं मेहं श्वासं हिक्कारोचकम् ।
विशेषाद्धन्त्यपस्मारं कामलां गुदजानि च ॥ ९८ ॥
यह योगराजनामक प्रसिद्ध प्रयोग अमृतके समान गुणकारी और उत्तम रसायन है। यह रसायन—पाण्डुरोग, विषविकार, खाँसी, राजयक्ष्मा, विषमज्वर, कुष्ठ ज्वर, प्रमेह, श्वास, हिचकी, अरुचि, विशेषकर अपस्मार, कामला और बवासीर आदि रोगोंको शीघ्र नष्ट करता है ॥ ९६–९८ ॥
धात्रयरिष्ट।
धात्रीफलसहस्रे द्वे पीडयित्वा रस भिषक् ।
क्षौद्राष्टभागं पिप्पल्याश्चूर्णाद्धैकुडवान्वितम् ॥ ९९ ॥
शर्कराद्धतुलोन्मिश्रं पक्वं स्निग्धघटे स्थितम् ।
प्रपिबेत्पाण्डुरोगात्र्त्तो जीर्णे हितमिताशनः ॥ १०० ॥
कामलापाण्डुहृद्रोगवातासृग्विषमज्वरान् ।
कासहिक्कारुचिश्वासांश्चैषोऽरिष्टःप्रणाशयेत् ॥ १०१ ॥
उत्तम और पकेहुए दो हजार आंमलोंका स्वरस, पीपलका चूर्ण आधा कुडव (८ तोले) और खाँड २०० तोले सबको एकत्र मिलाकर मन्दमन्द अग्निसे पकावे। जब पाक उत्तम प्रकारसे सिद्ध होजाय तब नीचे उतारकर शीतल होजानेपर उसमें आंमलोंके स्वरसका आठवाँ भाग शहद मिलाकर एक घीके चिकने पात्रमें भरकर रखदेवे। १५ दिनके पश्चात् इसको प्रतिदिन अपनी अग्निके बलानुसार उचित मात्रासे सेवन करे और औषधिके पच जानेपर हितकर पदार्थोंका परिमित भोजन करे। यह अरिष्ट—कामला, पाण्डु, हृदयरोग, वातरक्त, विषमज्वर, खाँसी, हिचकी, अरुचि और श्वासादि विकारोंको नष्ट करता है ॥ ९९–१०१ ॥
हरिद्राद्यघृत ।
हरिद्रात्रिफलानिम्बबलामधुकसाधितम् ।
सक्षीरं माहिषं सर्पिः कामलाहरमुत्तमम् ॥ १०२ ॥
हल्दी, हरड, बहेडा, आमला, नीमकी छाल, खिरेंटी और मुलहठी इन सबके समान भाग मिश्रित एक सेर कल्क, चौगुने गोदुग्ध और अठगुने जलके साथ भैंसके चार सेर घृतको विधिपूर्वक सिद्ध करे। यह घृत कामलारोगको नष्ट करनेके लिये अत्युत्तम है ॥ १०२ ॥