भारतकोश
भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

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चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ४४१


द्राक्षाघृत ।

पुराणसर्पिषः प्रस्थो द्राक्षार्द्धप्रस्थसाधितः ।
कामलागुल्मपाण्ड्वर्त्तिज्वरमेहोदरापहः ॥ १०३ ॥

पुराना गोघृत १ प्रस्थ ( ६४ तोले ) कल्कके लिये दाख आधाप्रस्त ( ३२ तोले, ) गोदुग्ध ४ प्रस्थ और जल ४ प्रस्थ सबको एकत्र मिलाकर पकावे । जब पकते पकते घृतमात्र शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । प्रतिदिन इस घृतका सेवन करनेसे कामला, गुल्म, पाण्डुरोग, ज्वर, प्रमेह और उदरविकार आदि रोग दूर होते हैं ॥ १०३ ॥

मूर्वाद्यघृत ।

मूर्वातिक्ता निशायासकृष्णाचन्दनपर्पटैः ।
त्रायन्तीवत्सभूनिम्बपटोलाम्बुददारुभिः ॥ १०४ ॥
अक्षमात्रैर्घृतप्रस्थं सिद्धं क्षीरचतुर्गुणम् ।
पाण्डुता ज्वरविस्फोटशोथाऽर्शोरक्तपित्तनुत् ॥ १०५ ॥

गौका घी १ प्रस्थ, मूर्वाकी जड, कुटकी, हल्दी, ध . मा, पीपल, चन्दन, पित्तपापडा त्रायमाण, कुडेकी छाल, चिरायता, पटोलपांत, नाग पोथा और दारुहल्दी इन सब औषधियोंका कल्क दो दो तोले, पाकके लिये जल ४ प्रस्थ और दूध ४ प्रस्थ सबको मिलाकर यथाविधि घृतको सिद्ध करे । जब घृतमात्र शर रहजाय तब उतारकर छान लवे । इस घृतको प्रतिदिन छः छः माशे पारेमाण पान करनेसे पाण्डु, ज्वर, विस्फोट, सूजन, बवासीर और रक्तपित्त ये सब रोग नष्ट होते हैं ॥ ४-५ ॥

व्योषाद्यघृत ।

व्योषं बिल्वं द्विरजनी त्रिफला द्विपुनर्नवम् ।
मुस्तान्ययोरजः पाठा विडङ्गं देवदारु च ॥ १०६ ॥
वृश्चिकाली च भार्गी च सक्षीरैस्तैः शृत घृतम् ।
सर्वान् प्रशमयत्येतद्विकारान्मृत्तिकाकृतान् ॥ १०७ ॥

साठ, मिरच, पीपल, बेलगिरी, हल्दी, दारुहल्दी, त्रिफला, सफेद और लाल दोनों पुनर्नवा, नागरमोथा, लाहभस्म, पाठ, वायविडंग, देवदारु, बिछौटीघास और भारङ्गी इन सब औषधोंका कल्क एक सेर, गोघृत ४ सेर और जल ६४ सेर एवं दुग्ध १६ सेर लेवे । इसको एकत्र मिलाकर घृतको सिद्ध करे । जब शीतल