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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

by श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या

DevanagariHindipublished380 pages

२. दक्षिण विभाग: विभाव, अनुभाव, सात्त्विक व व्यभिचारी भाव

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६४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु सेवाभाव की उद्भावना होते ही वह महामन्त्र कृष्णनाम के दिव्य स्वरूप को जान जाता है । श्रीमथुरामण्डल में स्थिति ‘पद्मपुराण’ में मथुरामण्डल, द्वारका आदि में वास के सम्बन्ध में एक वाक्य है, “अन्य तीर्थों की यात्रा का मुक्ति ही महाफल है । परन्तु यह मुक्ति परम संसिद्धि नहीं है । मुक्त होने के बाद भगवद्भक्ति के परायण होना है । ब्रह्मभूत हो जाने पर ही भक्तियोग की प्राप्ति होती है । अतः प्रेममयी भगवद्भक्ति ही जीवन का परम लक्ष्य है और क्षणभर के लिए भी मथुरावास करने वाले के लिए यह अत्यन्त सुलभ हो जाती है ।” आगे कहा है, “ऐसा कौन बुद्धिमान है जो मथुरा का सेवन नहीं करेगा ? मथुरा सकामकर्मियों और परमब्रह्म से एक होने जाने के अभि- लाषी मुमुक्षुओं को सर्वाभीष्ट का दान करने वाली है । फिर भक्ति चाहने वाले भक्तों को भक्ति क्यों नहीं देगी, अर्थात् अवश्य देगी ।” वैदिक शास्त्रों में अन्यत्र कहा है—“अहो ! वैकुण्ठ से भी अतिशय महिमामयी यह मथुरा कितनी धन्या है । यहाँ एक दिन रहने से भी हृदय में कृष्णभक्ति उदित हो जाती है ।”

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अध्याय १३ भक्ति के पाँच शक्तिशाली साधन श्रील रूप गोस्वामी का कथन है कि मथुरावास, मूर्ति-अर्चन, श्रीमद्भागवत का आस्वादन, भक्तसेवन तथा हरेकृष्ण महामन्त्र का कीर्तन से भक्ति के ये पाँच साधन इतने शक्तिशाली हैं कि इनमें से किसी एक से तनिक सा सम्बन्ध भी कनिष्ठ भक्त तक में भक्तिभाव को उद्भावित कर देता है । श्रीमूर्त्ति-अर्चन के सम्बन्ध में रूप गोस्वामी लिखते हैं—"हे सखे ! यदि तुम्हें प्राकृत-जगत् में अपने बन्धु-बान्धवों की कुछ भी इच्छा है तो केशीघाट के समीप मुस्कराते हुए त्रिभंगललित मुद्रा में खड़े, तिरछी और दूर तक फैली हुई दृष्टि वाले, अधर पर वेणुवादन करते हुए और मोरपिच्छ के साथ चन्द्रके से चमकते हुए गोविन्द नामक कृष्णरूप को मत देखना ।" इस श्लोक का तात्पर्य यह है कि यदि कोई घर में अर्चना करता हुआ श्रीमूर्त्ति के अनुरक्त हो गया तो तथाकथित घर, परिवार और समाज की सुध-बुध भूल कर उनकी भक्ति में ही डूब जायगा । प्रत्येक गृहस्थ का प्रधान कर्तव्य है कि घर में कृष्णमूर्ति स्थापित करके अपने सब बन्धु-बान्धवों के साथ उनकी आराधना करे । इससे सब क्लब, सिनेमा, नृत्य आदि में जाने और धूम्रपान, मद्यपान जैसे अनर्थों से बच जायेंगे । घर में मूर्ति-अर्चना पर बल देने से इन सब अनर्थों को दूर किया जा सकता है । रूप गोस्वामी आगे लिखते हैं—"हे मूर्ख सखे ! जान पड़ता है कि तुम श्रीमद्भागवत की पावन पद्यावली का कुछ-कुछ श्रवण कर चुके हो, जिसमें सकामधर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सब का निरादर है । अब क्रमशः भगवल्लीलामय दसवें स्कन्ध के श्लोक तुम्हारे कर्णविवरों में प्रविष्ट होकर हृदय में अमृत का संचार करेंगे ।" श्रीमद्भागवत के उपक्रम में ही कहा गया है कि जब तक कोई

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६६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु सकामकर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को कूड़े-करकट की भांति फेंक नहीं देता, तब तक वह श्रीमद्भागवत को हृदयंगम नहीं कर सकता । भागवत केवल भगवद्भक्ति को विषय करती है। अतः त्यागवृत्ति से भागवत का स्वाध्याय करने वाला ही दसवें स्कन्ध में वर्णित भगवच्चरित को समझ सकता है। भाव यह है कि भागवत में अनुराग के बिना दसवें स्कन्ध के रासलीला आदि परम गोपनीय प्रसंगों को समझने का प्रयास न करे। श्रीमद्भागवत के यथार्थ रूप का आस्वादन शुद्धभक्ति में स्थित होने पर ही हो सकता है। श्रील रूप गोस्वामी के पूर्वोक्त दोनों श्लोकों में अलंकारों का प्रयोग है, जो परोक्ष रूप से सांसारिक संग, मित्रता और प्रेम की भर्त्सना करते हैं। लोग प्रायः समाज, मित्रता और प्रेम की ओर आकृष्ट रहते हैं और इन प्राकृत दोषों के विकास के लिए व्यापक आयोजन करते हैं। परन्तु श्रीराधाकृष्ण मूर्ति के दिव्य दर्शन से विषयसंग के ये सब उद्यम समाप्त हो जाते हैं। श्रीरूप गोस्वामी के श्लोक में विरोधाभास अलंकार है; लगता है मानो वे मित्रता, प्रेम आदि प्राकृत संगों की प्रशंसा और गोविन्द मूर्ति के दर्शन की निन्दा कर रहे हों। यह अलंकार इस प्रकार का होता है कि जो वस्तु प्रशंसित प्रतीत होती है, उसकी वास्तव में निन्दा हुई होती है और प्रशंसा के योग्य वस्तु निन्दित हुई लगती है । श्लोक का वास्तविक तात्पर्य यह है कि यदि कोई प्राकृत मित्रता, प्रेम और समाज रूपी अनर्थों को भुलाना चाहता हो तो गोविन्दरूप का दर्शन अवश्य करे । श्रील रूप गोस्वामी ने इसी भांति दिव्य कृष्णकथा का वर्णन किया है। एक भक्त के हृदय का उद्गार है, “बड़ा आश्चर्य है कि अपने आंसुओं से घुले हुए भगवान् के इस रूप को जबसे मैंने देखा है, मेरा तन पुलकावली से मण्डित हो गया है और अपने सांसारिक कर्तव्य को भूल बैठा हूँ। उन्हें देखकर अब मेरा मन चुपचाप घर में नहीं लगता है। न जाने क्यों सदा उनके पास जाने को उत्कण्ठित रहता हूँ।” इस वाक्य का तात्पर्य यह है कि सौभाग्य से शुद्धभक्त का संग होने पर कृष्णकथा सुनने और कृष्ण- विषयक जानने को, अर्थात् पूर्णतः कृष्णभावनाभावित बनने के लिए उत्कण्ठित हो जाना चाहिए । इसी प्रकार, महामन्त्र के श्रवण-कीर्तन के सम्बन्ध में एक वाक्य है—“कहा जाता है कि सन्तजनों को नारदजी के करों में बज रही वीणा की दिव्यध्वनि कर्णगोचर होती है। जब से इस शीतल नाद ने मेरे कानों में प्रवेश किया है, मैं निरन्तर श्रीभगवान् की संनिधि अनुभव कर रहा हूँ,

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भक्तियोग के पाँच शक्तिशाली साधन [ ६७ और किसी अनिर्वचनीय अपूर्व दशा को धारण करता हुआ मेरा मन विषयवासना से एकदम शान्त-सा हो चला है।" पुनः मथुरामण्डल के माहात्म्य का प्रतिपादन करते हैं, "श्यामल यमुना तट पर त्रिभंगललित मुद्रा में खड़े श्यामसुन्दर की मुझे स्मृति हो रही है। जहाँ अपार शोभा छिटकाती हुई, खिले हुए कदम्ब के ऊपर बैठ कर गुंजारते हुए भौंरों से युक्त, निरवधि मधुरिमा से मण्डित यह वनश्री मेरे मन में न जाने किस अनिर्वचनीय भक्तिभाव को उदित कर रही है।" श्रील रूप गोस्वामी द्वारा वर्णित मथुरा-वृन्दावन की इस असमोर्ध्व माधुरी का अनुभव अभक्तों तक को हो सकता है। यमुना के किनारे चौरासी कोस के मथुरामण्डल के लीलास्थल इतने सुन्दर हैं कि एक बार जो वहाँ चला जायगा वह फिर कभी इस प्राकृत-जगत् में लौटना नहीं चाहेगा। श्रीरूप गोस्वामी के ये वाक्य मथुरा-वृन्दावन के यथार्थ स्वरूप की अनुभूति से ओतप्रोत हैं। इन सब चिद्गुणों से सिद्ध होता है कि मथुरा-वृन्दावन की स्थिति संसार से लोकोत्तर है। अन्यथा, इन स्थानों में जाने पर हृदय में दिव्य भावों की उद्भावना नहीं होती। मथुरा-वृन्दावन में चरण रखते ही तत्काल ये भाव निश्चित रूप से उद्दिष्ट हो उठते हैं। इन भक्तियोग विषयक वाक्यों को सुनकर कभी-कभी प्रतीत होता है कि फल बढ़ा-चढ़ा कर कहा गया है। परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है। यद्यपि यह सब के लिए सम्भव नहीं है, परन्तु शास्त्रों का प्रमाण है कि बहुत से भक्तों को ऐसे सत्संग का तत्काल फल हुआ है। उदाहरणार्थ, मन्दिर में सौरभ का आघ्राण करने मात्र से सनकादि चारों कुमार तत्काल भक्त बन गए। बिल्वमंगल ठाकुर कृष्णकथा को सुनते ही वेश्या को त्याग कर वृन्दावन को चल पड़े और परम वैष्णव बन गए। अतः ये वाक्य अतिश- योक्ति अथवा गल्प नहीं हैं। ये वास्तविक तथ्य हैं, परन्तु ये विशेष भक्तों के लिए ही प्रकट होते हैं, सब पर नहीं घटते। ये वर्णन चाहे बढ़े-चढ़े लगें, पर अपने ध्यान को नश्वर विषय-सौन्दर्य से हटाकर शाश्वत् कृष्ण- भावना माधुर्य में लगाने के लिए हमें इन वर्णनों को इसी रूप में अंगीकार करना चाहिए। जो पहले ही कृष्णभावनाभावित हैं, उसके लिए इनमें कुछ भी आश्चर्य की बात नहीं है। कतिपय विद्वानों का मत है कि केवल वर्णाश्रम-धर्म का पालन करने से भी शनैः-शनैः भक्तियोग के साधन की संसिद्धि हो सकती है। परन्तु महान् आचार्य इसे नहीं मानते। रामानन्द राय के साथ भक्ति के क्रमिक विकास से सम्बन्धित वार्ता में भगवान् चैतन्य महाप्रभु ने भी इस विचार का

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६८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु निराकरण किया है। उन्होंने रामानन्द राय द्वारा प्रतिपादित वर्णाश्रमधर्म की महिमा को अस्वीकार कर दिया। वे कहते हैं कि वर्ण और आश्रम का यह आचरण केवल बाह्य है। इससे ऊँचा सिद्धान्त भी है। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने स्वयं अन्य सब साधनों को त्याग कर कृष्णभावना का पथ अंगीकार करने के लिए जीव का आह्वान किया है। जीवन की परम संसिद्धि का एकमात्र यही मार्ग है। श्रीमद्भागवत (११.२०.६) में भी भगवान् कहते हैं, "वर्ण और आश्रम के कर्तव्यों का पालन तभी तक करे, जब तक मेरी लीला कथा में राग और आसक्ति नहीं हो जाती।" भाव यह है कि वर्णाश्रमधर्मरूपी कर्मकाण्ड अर्थ, इन्द्रियतृप्ति और मोक्ष के लिए है। ये सब उनके लिए हैं, जो कृष्णभावनाभावित नहीं हुए हैं। वास्तव में शास्त्रों में इन सब क्रियाओं का विधान जीव को कृष्णभावना तक लाने के लिए ही है। जिसे श्रीकृष्ण के लिए रागानुगा आसक्ति हो गयी है, उसे शास्त्रविहित कर्तव्यों से प्रयोजन नहीं रहता।

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अध्याय १४ भक्ति की योग्यता कुछ विद्वानों का कहना है कि ज्ञान-वैराग्य भक्ति के अंग हैं; परन्तु यह सत्य नहीं है। वास्तव में भक्ति में प्रवेश के लिए उपयोगी होने पर ज्ञान-वैराग्य को प्रारम्भ में स्वीकार किया जा सकता हैं; पर अन्त में वह अवस्था भी आती है जब उन्हें त्याग दिया जाता है। भक्ति की लालसा के अतिरिक्त भक्ति का और कोई हेतु नहीं है। इसके लिए केवल सरल हृदय चाहिए। दक्ष भक्तों के मत में मनोधर्म (ज्ञान) और योगाभ्यास के कृत्रिम वैराग्य का मार्ग भवबन्धन से मुक्ति के लिए उपयुक्त हो सकता है; परन्तु ये दोनों चित्त को उत्तरोत्तर कठोर बनाने वाले हैं। इनके द्वारा भक्तिभाव का बिल्कुल भी वर्धन नहीं हो सकता। अतः भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में प्रवेश पाने के लिए ये साधन अनुकूल नहीं हैं। वस्तुतः कृष्णभावना- भक्तियोग ही भक्तियोग में प्रगति का एकमात्र मार्ग है। भक्ति अद्वय है, वही कारण है और वही कार्य है। श्रीभगवान् सबके परम कारण हैं। उन अद्वय की प्राप्ति के लिए भक्ति का अद्वय मार्ग ही अंगीकार करना होगा । भगवद्गीता में स्वयं श्रीभगवान् इसकी पुष्टि करते हैं, "केवल भक्ति से ही मेरा तत्त्व जाना जा सकता है।" गीतोपदेश के प्रारम्भ में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, "तू मेरा भक्त है, इसलिए तेरे से यह सम्पूर्ण रहस्य कहूँगा।" वैदिकज्ञान का अन्तिम लाभ भगवान् के तत्त्व को जानना है और उनके वैकुण्ठ धाम में प्रवेश का पथ है भक्तियोग। सभी प्रामाणिक शास्त्र इसमें एकमत हैं। मनोधर्मी लोग भक्तिपथ का तिरस्कार करके दूसरों को दार्शनिक अन्वेषण में परास्त करने में ही लगे रहते हैं, इसलिए उनके हृदय में भक्तिभाव प्रकट नहीं होता। श्रीमद्भागवत (११.२०.३१) में श्रीकृष्ण कहते हैं, "हे उद्धव ! मेरे सच्चे भक्त के लिए ज्ञान-वैराग्य प्रायः श्रेयदायक नहीं होते। मेरा भक्त

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१०० ] भक्तिरसामृतसिन्धु अपनी भक्ति के प्रभाव से सकामकमों, तप, त्याग, दान, योग, ज्ञान, वैराग्य आदि के लाभ को अपने-आप प्राप्त कर लेता है; परतत्त्व के पर्याप्त ज्ञान से युक्त हो जाता है।" यह भक्ति की कसौटी है। भक्त अन्धकार में नहीं रहता भगवान् स्वयं विशेष कृपा का परिवर्षण करते हुए उसे अन्तर से प्रबुद्ध करते हैं। श्रीमद्भागवत (११.२०.३२-३३) में श्रीकृष्ण उद्धव से आगे कहते हैं, "हे सखे ! मेरी सेवा में अनुरक्त मेरे भक्तों को तप, त्याग, दान, ज्ञान, वैराग्य आदि सम्पूर्ण सत्कर्मों का फल सुलभ हो जाता है। इस पर भी मेरी भक्ति के अतिरिक्त वे और कुछ नहीं चाहते। यदि कोई भक्त स्वर्ग में या मेरे वैकुण्ठधाम को जाना चाहे तो मेरी अहैतुकी कृपा उस से सारी कामनायें सहज ही पूरी हो सकती हैं।" कृष्णभावना के सेवन में लगे पुरुष में यदि कुछ विषयवासना शेष भी हो तो सद्गुरु के आदेशानुसार नियमित रूप से भक्ति का साधन करते रहने से वह इस प्रवृत्ति से शीघ्र मुक्त हो जाता है। श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि प्राकृत इन्द्रियतृप्ति में आसक्ति नहीं होनी चाहिए; परन्तु श्रीकृष्ण से सम्बन्धित प्रत्येक वस्तु का ग्रहण करे। जैसे भोजन आवश्यक है और यह स्वाभाविक ही है कि रसना स्वा- दिष्ट अन्न चाहती है। अतः जिह्वातृप्ति के स्थान पर श्रीकृष्ण की प्रीति के लिए कुछ स्वादु पदार्थ बनाए जा सकते हैं और श्रीकृष्ण को उन का अर्पण किया जा सकता है। तब यह वैराग्य हो जायगा। स्वादिष्ट पदार्थ बनायें, परन्तु श्रीकृष्ण को अर्पण किए बिना उन्हें खाना नहीं चाहिए। जो श्रीकृष्ण को अर्पित न हुए हों, उन पदार्थों को ग्रहण न करने का यह नियम वास्तव में वैराग्य है। साथ ही, इस वैराग्य के द्वारा इन्द्रियों के वेग को शान्त किया जा सकता है। निर्विशेषवादी, जो सब प्राकृत वस्तुओं से बचना चाहते हैं, चाहे कितना भी तप-त्याग क्यों न करें, पर भगवत्सेवा करने का अवसर कभी नहीं पाते। अतः उनका वैराग्य संसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहाँ भक्ति से सम्बन्धरहित कृत्रिम वैराग्य का अभ्यास करते हुए निर्विशेषवादी फिर भवबन्धन में गिर गए हैं। वर्तमान काल में भी बहुत से नामधारी त्यागी हैं, जो संन्यास लेकर 'ब्रह्म सत्यं' का दम्भ करते हैं। इस प्रकार वे प्राकृत-जगत् को त्यागने का ढोंग तो करते हैं, परन्तु भक्ति के स्तर तक न पहुँचने के कारण लक्ष्य को नहीं पा सकते और परिणामतः परोपकार; राजनीतिक संघर्ष जैसी प्राकृत क्रियाओं में

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भक्ति की योग्यता [ १०१ ही लौट आते हैं। कितने ही तथाकथित संन्यासी हुए हैं जिन्होंने जगत् को असत्य कहकर त्यागा था पर फिर प्राकृत-जगत् में ही लौट आए, क्योंकि उन्हें अपने यथार्थ आश्रय भगवान् के चरणकमलों की अभिलाषा नहीं थी। ऐसी किसी भी वस्तु को त्यागना ठीक नहीं, जो भगवान् की सेवा में लग सकती हो। यह भक्तिमार्ग का गूढ़ रहस्य है। कृष्णभावना और भक्ति में प्रगति के अनुकूल कोई भी वस्तु स्वीकार कर लेनी चाहिए। उदाहरणार्थ, अपने इस कृष्णभावनामृत आन्दोलन को बढ़ाने के लिए हम वायुयान आदि नाना यन्त्रों और अनेक उपकरणों का उपयोग कर रहे हैं। कभी-कभी लोग पूछते हैं— “जब आप प्राकृत सभ्यता की निन्दा करते हैं तो फिर प्राकृत पदार्थों का उपयोग क्यों कर रहे हैं? पर वास्तव में हम निन्दा नहीं करते। हम तो केवल इतना कहते हैं कि लोग जो कुछ काम करें वह कृष्णभावनाभावित होकर करें। इसी सिद्धान्त के आधार पर भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को भक्ति के लिए अपने शौर्य का सदुपयोग करने का परामर्श दिया है। हम भी इन यन्त्रों को कृष्णसेवा में लगा रहे हैं। श्रीकृष्ण के लिए इस भाव के साथ, अर्थात् कृष्णभावना- भावित होकर हम कुछ भी ग्रहण कर सकते हैं। यदि टाईप आदि किसी यन्त्र का सदुपयोग कृष्णभावनामृत आन्दोलन को बढ़ाने में किया जा सकता हो तो हमें ऐसा अवश्य करना चाहिए। हमारी दृष्टि में श्रीकृष्ण सर्वरूप हैं। श्रीकृष्ण ही वस्तुमात्र के निमित्त और उपादान हैं, हमारा अपना कुछ भी नहीं है। अतः श्रीकृष्ण की वस्तुएँ श्रीकृष्ण की सेवा में ही लगें, ऐसी हमारी दृष्टि है। इसका यह अर्थ नहीं कि हम भक्ति के साधन को छोड़ बैठें अथवा तत्सम्बन्धी विधि-विधान का तिरस्कार करें। भक्ति की कनिष्ठ (प्रारम्भिक) दशा में गुरुप्रमाण द्वारा नियमित सब सिद्धान्तों का अनुसरण करना चाहिए। कौन सी वस्तु त्यागी जाय और कौन सी अपनायी जाय, यह भक्ति के सिद्धान्तों के अनुसार होना चाहिए; ऐसा नहीं कि स्वतन्त्र रूप से निर्णय करे कि क्या त्यागना है और क्या अपनाना है। अतः भक्त का मार्गदर्शन करने के लिए भगवान् श्रीकृष्ण के प्रतिनिधि और बाह्य प्रकाश के रूप में सद्गुरु का आश्रय आवश्यक है। गुरु को चाहिए कि धनसंचय और बहुशिष्यों के प्रवाह में बह न जाय। सद्गुरु ऐसा कभी नहीं करता। परन्तु कभी-कभी यदि गुरु भली- भाँति अधिकृत नहीं हो, स्वेच्छा से गुरु बना हो तो वह धनराशि और

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१०२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु शिष्यों की बड़ी संख्या को लेकर गिर सकता है । उसकी भक्ति अधिक उत्तम नहीं समझी जाती । यदि कोई ऐसी सफलताओं से विचलित हो जाय तो उसकी भक्ति शिथिल हो जायगी । अतः परम्परा के सिद्धान्तों का दृढ़ता के साथ पालन करना चाहिए । कृष्णभावनाभावित पुरुष स्वभावतः शुद्ध है, इसलिए उसे मन-वाणी की शुद्धि के किसी अन्य साधन की आवश्यकता नहीं । कृष्णभावना की दिव्य भावभूमि में आरूढ़ हो जाने के कारण उसमें सभी दैवी गुण आ जाते हैं; वह योगपद्धति की विधि का स्वतः पालन करता है । भक्तों द्वारा इन सब नियमों का अनुसरण अनायास हो जाता है । एक प्रत्यक्ष उदाहरण अहिंसा है, जो एक दिव्य गुण माना जाता है । भक्त स्वभाव से अहिंसाप्रिय होता है, उसे अलग से अहिंसा का अभ्यास नही करना पड़ता । कुछ लोग शुद्धि के लिए शाकाहारी संघों में सम्मिलित होते हैं; पर भक्त तो स्वभाव से ही शाकाहारी बन जाता है । उसे इसका पृथक् अभ्यास अथवा किसी शाकाहारी संघ का सदस्य नहीं बनना पड़ता । वह स्वाभाविक रूप में शाकाहारी है । अनेक अन्य प्रकार से सिद्ध है कि कृष्णभावना के अतिरिक्त भक्त को किसी भी अन्य साधन की अपेक्षा नहीं रहती । सब दैवी गुणों का उसमें स्वतः विकास हो जाता है । जो अभ्यास के रूप में शाकाहारी अथवा अहिंसा का आचरण करते हैं उनमें लौकिक दृष्टि से कुछ सद्गुण हो सकता है; परन्तु भक्त बनने के लिए इतना ही पर्याप्त नहीं है । यह आवश्यक नहीं कि शाकाहारी अथवा अहिंसाप्रिय व्यक्ति भक्त भी हो । परन्तु भक्त स्वाभाविक रूप से शाकाहारी भी होता है और अहिंसाप्रिय भी । अस्तु, शाकाहार और अहिंसा के अंग (कारण) नहीं हैं । इस सन्दर्भ में स्कन्दपुराण में एक व्याध की कथा है जो नारद मुनि के उपदेश से महाभागवत बन गया । भक्त हो जाने पर वही व्याध किसी चींटि को भी नहीं मारता था । नारदजी के सखा पर्वत मुनि भक्ति से व्याध में इस आश्चर्यमय परिवर्तन को आया देखकर कहने लगे, “हे व्याध ! तेरे लिए चींटी तक की हिंसा न करना आश्चर्य का विषय नहीं है क्योंकि जो भगवद्भक्ति में लीन हैं, उनमें सब दैवी सद्गुणों का वास रहता है; भक्त कभी किसी को कष्ट नहीं देता ।” श्रील रूप गोस्वामी पुष्टि करते हैं कि अन्तःकरण और क्रियाओं की पवित्रता, शम, दम, आदि सब सद्गुण भक्तिपरायण पुरुष में स्वतः प्रकट हो जाते हैं ।

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भक्ति की योग्यता [ १०३ श्रील रूप गोस्वामी का आगे उल्लेख है कि भक्ति के नौ अंग हैं— श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्म- निवेदन। ये साधन इतने शक्तिसम्पन्न हैं कि इनमें से एक भी साधन का आचरण करने से निश्चित रूप से अभीष्ट-सिद्धि होती है। जो भगवत्कथा के श्रवण में अनुरक्त है और जो नामकीर्तन करता है, वे दोनों ही भक्ति के अभीष्ट लक्ष्य को पाते हैं। चैतन्यचरितामृत में इसका विशद प्रतिपादन है। कोई एक साधन करे, दो, तीन अथवा सब-के-सब साधन अंगीकार करे, अन्त में वह स्पृहणीय भक्तियोग में निष्ठ हो जायगा। भक्ति के उपरोक्त साधनों में से एक भी साधन करने से संसिद्धि को प्राप्त हुए भक्तों के बहुत से उदाहरण हैं। श्रीमद्भागवत के श्रवण- मात्र से महाराज परीक्षित को, श्रीमद्भागवत के कीर्तन से शुकदेव गोस्वामी को, निरन्तर भगवत्स्मरण करने से प्रह्लाद जी को, भगवान् के चरणकमलों के सेवन से लक्ष्मी जी को, मन्दिर में अर्चन करने से राजा पृथु को, वन्दन से अक्रूर को, भगवान् राम के दास्य से हनुमान् को, श्रीकृष्ण के सख्य से अर्जुन को और श्रीकृष्ण के चरणों में सर्वस्व अर्पण करने से बलि महा- राज को जीवन के परम फल की प्राप्ति हुई। ऐसे भी भक्त हुए हैं जिन्होंने भक्ति के सब साधनों का आचरण किया। श्रीमद्भागवत (६.४.१८-२०) में अम्बरीष महाराज की सर्वांग भक्ति का वर्णन है। शुकदेव जी कहते हैं, "राजा अम्बरीष ने सब से पहले अपने मन को श्रीकृष्ण के पादपद्मों में एकाग्र किया; फिर वाणी को श्रीकृष्ण के गुणों और लीला के वर्णन में, हाथों को मन्दिर का मार्जन करने में तथा कानों को भगवत्कथा के श्रवण में लगाया; मन्दिर में सुन्दर श्रीमूर्ति के दर्शन में नेत्रों को और शुद्धभक्तों का संग करने में शरीर को नियोजित किया (जब किसी का संग किया जाता है तो उसके साथ उठना-बैठना और खाना पड़ता है। इस प्रकार उसके साथ अपने शरीर का स्पर्श अपरिहार्य सा होता है। अम्बरीष महाराज केवल शुद्धभक्तों का संग करते थे, किसी अन्य को अपने शरीर का स्पर्श नहीं होने देते)। उन्होंने अपनी घ्राणेन्द्रिय को श्रीकृष्ण के चरणारविन्द में समर्पित पुष्प और तुलसी को सूंघने में और जिह्वा को कृष्णप्रसाद का आस्वादन करने में; सिर को वन्दन में और चरणों को हरितीर्थों की यात्रा में लगा रखा था। वे राजा थे, धन का अभाव न था, अतः श्रीकृष्ण को अतिशय उत्तम भोग निवेदित करते और फिर उनका प्रसाद ग्रहण करते थे। उनका एक सुन्दर-सा मन्दिर था, जिसमें भगवान् का बहुमूल्य वस्त्र, अलंकार आदि से मनोहारी शृंगार किया जाता और

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१०४] भक्तिरसामृतसिन्धु नाना व्यंजनों का भोग लगता। इस प्रकार वे निरन्तर पूर्णरूपेण कृष्ण- भावना के परायण थे।'' इस सम्पूर्ण विवरण का भाव यह है कि हमें महा- भागवतों के चरणचिह्नों का अनुसरण करना चाहिए। यदि कोई भक्ति के सब साधनों को न कर सके तो कम से कम एक तो अवश्य ही करे, जैसे पूर्वाचार्यों के उदाहरण से प्रत्यक्ष है। यदि अम्बरीष महाराज के समान भक्ति के सब साधन किए जायें तो फिर इन सभी के द्वारा भक्तियोग की सिद्धि निश्चित है। पूर्ण रूप से भक्ति के परायण होते ही विषयों से निवृत्ति हो जाती है और मुक्ति भक्त की अनुचरी बन जाती है। बिल्व- मंगल ठाकुर इसके प्रमाण हैं। भगवान् में अनन्य भक्ति होने पर मुक्ति सेविका के समान भक्त के पीछे-पीछे चला करती है। श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि वैधीभक्ति को आचार्यगण ऐश्वर्य (मर्यादा) का मार्ग भी कहते हैं।

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अध्याय १५ रागानुगाभक्ति रागानुगाभक्ति के उदाहरण वृन्दावन में श्रीकृष्ण के पार्षदों में सहज से दर्शनीय हैं। श्रीकृष्ण के साथ ब्रजवासियों के रागात्मक (रागमय) स्वाभाविक व्यवहार को रागानुगा कहते हैं। उन्हें भक्ति सीखनी नहीं पड़ती, वे पहले ही विधि-विधान में पूर्ण हैं और रागमय भगवत्सेवा को प्राप्त कर चुके हैं। उदाहरणार्थ, श्रीकृष्ण के साथ क्रीड़ामग्न गोपबालकों को यह तप, त्याग अथवा योगाभ्यास के द्वारा नहीं सीखना पड़ता । पूर्वजन्मों में वे सब विधि-विधानों का पालन कर चुके हैं, इसलिए अब उन्हें साक्षात् श्रीकृष्ण का परम प्रिय सखारूप पार्षदपद प्राप्त हुआ है। इस स्वाभाविक आकर्षण का नाम ही रागानुगाभक्ति है। श्रील रूप गोस्वामी के अनुसार इष्ट के चिन्तन में तन्मयता और राग की परम आविष्टता के साथ उसके प्रति जो स्वाभाविक आकर्षण होता है, उसे रागानुगाभक्ति कहते हैं। रागानुगाभक्ति-१. कामरूपा और २. सम्बन्धरूपा—दो प्रकार की होती है। इस सन्दर्भ में नारदजी युधिष्ठिर से श्रीमद्भागवत (७.१.३०) में कहते हैं, “हे राजन् ! बहुत से भक्त पहले-पहल काम से, द्वेष से, भय से अथवा स्नेहवश भी भगवान् की ओर आकृष्ट हुआ करते हैं। परन्तु अन्त में उनका यह आकर्षण सम्पूर्ण पापों से शुद्ध हो जाता है और शनैः-शनैः भगवत्प्रेम को प्राप्त होकर आराधक जीवन के उस परमलक्ष्य को पा जाता है, जो शुद्धभक्तों द्वारा अभिलाषित है । गोपीजन काममय राग और आकर्षण की प्रत्यक्ष मूर्ति हैं। गोपियाँ युवती हैं और श्रीकृष्ण नवकिशोर हैं। बाह्य दृष्टि से लगता है कि श्रीकृष्ण के प्रति गोपियों का आकर्षण काम पर आधारित है। इसी प्रकार कंस भय से कृष्ण के प्रति आकृष्ट रहता था। श्रीकृष्ण के हाथों अपने मरण की भविष्यवाणी के कारण उसे सदा श्रीकृष्ण का भय बना रहता था।

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१०६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु शिशुपाल सदा श्रीकृष्ण के लिए द्वेषभाव से भरा रहा। तथा राजा यदु के वंशज कुलसम्बन्ध के कारण उन्हें अपना बान्धव समझते रहे। इन नाना प्रकार के भक्तों में नाना रूपों में श्रीकृष्ण के लिए सहज राग रहता है और उन्हें जीवन का वही अभिलाषित लक्ष्य प्राप्त होता है। श्रीकृष्ण में गोपियों का काम और यदुवंशियों का स्नेह दोनों रागा- नुगा हैं। श्रीकृष्ण से कंस के भय और शिशुपाल के द्वेष को भक्ति में नहीं गिना जाता, क्योंकि उनका भाव अनुकूल नहीं है। भक्ति अनुकूलभाव से ही होती है। अतः श्रील रूप गोस्वामी के अनुसार भय आदि प्रतिकूल आकर्षण भक्ति के अंतर्गत नहीं आते। फिर वे यादवों के स्नेह की मीमांसा करते हैं। यदि वह सख्य के स्तर पर है तो रागानुगा है और यदि विधि के स्तर पर है तो रागानुगा भक्ति के अन्तर्गत नहीं आयेगा। रागानुगा- भक्ति के स्तर पर ही सख्य को शुद्ध भक्ति की श्रेणी में गिना जाता है। यह समझने में कुछ कठिनाई हो सकती है कि गोपियों और कंस दोनों को एक ही लक्ष्य की प्राप्ति हुई, क्योंकि कंस, शिशुपाल आदि का भाव गोपीजनों से भिन्न था। अतः इस बात का भलीभाँति विवेचना करना आवश्यक है। यद्यपि उपरोक्त सब उदाहरणों में केन्द्र श्रीकृष्ण ही हैं और अनुकूल-प्रतिकूल सब को वैकुण्ठ-जगत् की प्राप्ति होती है, फिर भी दोनों प्रकार के जीवों में भेद रहता है। श्रीमद्भागवत, प्रथम स्कन्ध में उल्लेख है कि परतत्त्व एक (अद्वय) है; वही ब्रह्म, परमात्मा और भगवान् इन तीन प्रकारों से प्रकट है। यहाँ अप्राकृत भेद है। यद्यपि ब्रह्म, परमात्मा और भगवान् एक ही परतत्त्व हैं, पर कंस, शिशुपाल जैसे भक्तों को ब्रह्म- ज्योति की ही प्राप्ति हुई, वे परमात्मा अथवा भगवान् को प्राप्त नहीं कर सके। यही भेद है। इस सन्दर्भ में सूर्यमण्डल और सूर्यज्योति की उपमा दी जा सकती है। सूर्यज्योति में रहने का यह अर्थ नहीं कि सूर्यमण्डल में भी प्रवेश हो गया है। सूर्यमण्डल का तो ताप भी सूर्यज्योति के बराबर नहीं होता। यदि किसी ने अन्तरिक्षयान से सूर्यज्योति में विचरण किया है तो इसका यह अर्थ नहीं कि वह सूर्यमण्डल में भी हो आया है। सूर्यज्योति और सूर्य- मण्डल एकतत्त्व होने पर भी भिन्न हैं- एक शक्ति है तो दूसरा शक्तिमान् है। इसी प्रकार परतत्त्व श्रीकृष्ण और उनकी अंगकांति ब्रह्मज्योति में भी भेद-अभेद है। कंस और शिशुपाल को ब्रह्मप्राप्ति हुई, पर गोलोक वृन्दा- वन धाम में उनका प्रवेश नहीं हो सका। निर्विशेषवादियों और भगवान् के द्वेषियों का भगवान् में एक प्रकार का आकर्षण होता है; इस कारण

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उन्हें भगवान् के राज्य में तो प्रवेश करने दिया जाता है; परन्तु श्रीभगवान् के वैकुण्ठ धामों अथवा गोलोक-वृन्दावन धाम में नहीं । राज्य में प्रवेश करना और राजमहल में जाना एक वस्तु नहीं है । यहाँ श्रील रूप गोस्वामी निर्विशेषवादियों और भक्तों की भिन्न- भिन्न गति का वर्णन करने का प्रयास कर रहे हैं । सामान्यतः निर्विशेष- वादी और भगवान् से द्वेष करने वाले जब कभी यदि अपनी आध्यात्मिक सिद्धि तक पहुँचते हैं, तो केवल निर्विशेष ब्रह्मज्योति में ही प्रवेश कर सकते हैं। निर्विशेष दार्शनिक इस दृष्टि से भगवान् के शत्रुओं की श्रेणी में हैं कि दोनों को केवल ब्रह्मज्योति में प्रवेश करने दिया जाता है । वास्तव में भी निर्विशेषवादी भगवान् के शत्रु ही हैं, क्योंकि वे भगवान् के अतुलनीय ऐश्वर्य को सहन नहीं कर सकते । वे सदा अपने को श्रीभगवान् के समान कहते हैं । यह उनके द्वेषभाव का ही परिणाम है । इसीलिए भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु ने निर्विशेषवादियों को भगवत्-अपराधी घोषित किया है । परन्तु भगवान् इतने अतिशय दयामय हैं कि अपने शत्रुओं को भी परव्योम में प्रवेश करके निर्विशेष ब्रह्मज्योति में रहने देते हैं । कभी-कभी कोई निर्विशेषवादी शनैः-शनैः प्रगति करता हुआ भगवान् की सविशेष धारणा में स्थित हो जाता है । भगवद्गीता में इसका प्रमाण है, "बहुत जन्म-जन्मान्तरों के बाद यथार्थ ज्ञानी मेरी शरण लेता है ।" इस शरणागति से निर्विशेषवादी वैकुण्ठधाम को प्राप्त हो सकता है, जहाँ शरणागत जीव के रूप में उसे भगवान् का सारूप्य मिलता है । 'ब्रह्माण्डपुराण' में लिखा है, "ब्रह्म में लीन सिद्ध और भगवान् के हाथों मरे दैत्य ब्रह्मलीन होकर ब्रह्मज्योति में निवास करते हैं।" भगवद्गीता में भी प्रमाण है कि वह सनातन सिद्धलोक प्राकृत-जगत् से अति परे है । भगवान् के शत्रुओं और निर्विशेषवादियों का केवल ब्रह्मज्योति में प्रवेश हो सकता है, परन्तु कृष्णभक्त सीधे वैकुण्ठधामों में प्रविष्ट हो जाते हैं । शुद्धभक्तों में भगवान् की रागानुगाभक्ति रहती है, इसलिए भगवान् के सान्निध्य में दिव्यआनन्दरस का आस्वादन करने के लिए दिव्य धामों में उन्हें प्रवेश मिलता है । श्रीमद्भागवतं (१०.८७.२३) में श्रीभगवान् का स्तवन करते हुए मूर्तिमान् वेद कहते हैं, "हे नाथ ! योगीजन आपकी एकदेशीय विभूतियों का ध्यान करके निर्विशेष ब्रह्मज्योति में लीन हो जाते हैं । आपके रिपु भी ध्यान किए बिना इस सिद्धि को पाते हैं । कामवती व्रजगोपियों ने आपकी

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१०८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु सर्प जैसी भुजाओं के आलिंगन से यही गति पाई है। वैदिक ज्ञान के विविध अंगों के अधिपति हम देवता निरन्तर व्रजगोपियों के ही अनुगामी हैं। अतः इसमें सन्देह नहीं कि उन्हीं की गति को प्राप्त होंगे।" इस सन्दर्भ में हमें सूर्य एवं सूर्यज्योति का उदाहरण स्मरण रखना चाहिए। निर्विशेषवादी ब्रह्मज्योति में लीन होते हैं, जबकि भगवत्प्रेमीजन भगवान् के परमधाम गोलोक वृन्दावन में प्रवेश करते हैं। गोपियों के 'कामभाव' का किसी प्रकार के मैथुन से कोई सम्बन्ध नहीं है। श्रील रूप गोस्वामी स्पष्ट करते हैं कि इस 'कामभाव' का अभि- प्राय श्रीकृष्ण के संग में भक्त का भाव-विशेष ही है। सिद्धावस्था में प्रत्येक भक्त में श्रीकृष्ण के प्रति रागमय आकर्षण रहता है। इसी आकर्षण को कदाचित् भक्त का 'कामभाव' कह दिया जाता है। वस्तुतः भक्त में किसी विशेष रूप में भगवान् की सेवा करने की गाढ़ तृष्णा ही कामरूपाभक्ति है। ऐसे काम से भगवान् को भोगने की इच्छा प्रतीत हो सकता है, परन्तु वास्तव में तो उस रूप में श्रीकृष्ण के सुख के लिए ही यत्न किया जाता है। जैसे कोई भक्त भगवान् से ग्वालसखा के रूप में संग करना चाहे। उसकी इस अभिलाषा के मूल में गो चारण में श्रीकृष्ण की साहाय्य करने की उत्कण्ठा है। यह भगवान् के संग को भोगने की कामना लग सकती है, पर वास्तव में तो यह रागानुगाभक्ति है—दिव्य गोधन के चारण में उनकी सेवा की लालसा। कामरूपा भगवान् के सेवन की यह तृष्णा दिव्य व्रजधाम में प्रकट है तथा गोपियों में अतिशय प्रसिद्ध रूप में विराजित है । गोपीप्रेम इतना अनिर्वचनीय एवं हमारे मन-वाणी से अतीत है कि इसी कारण उसे कभी- कभी 'काम' कह दिया जाता है । श्री चैतन्यचरितामृत के रचयिता कृष्णदास कविराज गोस्वामी ने कामविकार और प्रेममय सेवाभाव के भेद को इस प्रकार अभिव्यक्त किया है, "काम का अर्थ अपनी इन्द्रियों को तृप्त करने की इच्छा है, जबकि प्रेम का तात्पर्य है भगवान् की इन्द्रियों को तृप्त करने की अनन्य अभिलाषा ।" प्राकृत-जगत् में ऐसा कोई प्रेमी नहीं है जो अपने प्रियतम की इन्द्रियों का सुखविधान करने को आतुर हो; सब अपनी ही इन्द्रियों की तृप्ति चाहते हैं। परन्तु गोपीजन श्रीकृष्ण की इन्द्रियतृप्ति के अतिरिक्त और कुछ नहीं, चाहतीं। ऐसा कोई उदाहरण प्राकृत-जगत् में नहीं है। इसीलिए श्रीकृष्ण

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रागानुगाभक्ति [ १०६ के लिए गोपियों के भावमय प्रेम को कभी-कभी विद्वानों द्वारा प्राकृत- जगत् के काम जैसा कह दिया जाता है, परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है। यह तो अनिर्वचनीय स्थिति को समझाने की एक भंगी मात्र है। उद्धव जैसे महाभागवत भगवान् श्रीकृष्ण के प्राणप्रिय हैं। वे भी गोपियों की अनुगति को लालायित रहते हैं। अतः गोपियों का कृष्णप्रेम प्राकृत काम कदापि नहीं हो सकता। अन्यथा उद्धव जी उनके चरणचिह्नों का अनुगमन करना क्यों चाहते ? स्वयं श्रीचैतन्य महाप्रभु इसके अन्यतम- धन्यतम उदाहरण हैं। संन्यास आश्रम ग्रहण करने के बाद वे स्त्रीसंग-त्याग के सम्बन्ध में बड़े ही कठोर थे। फिर भी उन्होंने सिखाया है कि गोपियों द्वारा प्रवर्तित मार्ग श्रीकृष्ण की आराधना का सर्वोत्तम पथ है। इस प्रकार कामप्रेरित दीखने वाली गोपियों के श्रीकृष्ण-आराधना के मार्ग की श्रीचैतन्य महाप्रभु ने बड़ी महिमा गायी है। इस सत्य से स्पष्ट है कि यद्यपि श्रीकृष्ण में गोपियों का आकर्षण कामप्रेरित प्रतीत होता है, परन्तु वह प्राकृत बिलकुल नहीं है। पूर्ण रूप से शुद्धसत्त्व में स्थित हुए बिना तो श्रीकृष्ण से गोपीजनों के दिव्य सम्बन्ध को जाना भी नहीं जा सकता। परन्तु सामान्य युवक-युवतियों का कामक्रीड़ा में लगने के कारण उसे कभी- कभी मिथ्या रूप से प्राकृत-जगत् का काम समझ लिया जाता है। दुर्भाग्य- वश, जो गोपीजनों और श्रीकृष्ण के प्रेममय सम्बन्ध के दिव्य स्वरूप को समझने में असमर्थ हैं, वे लोग यह पूर्वाग्रह कर बैठते हैं कि श्रीकृष्ण और गोपियों का प्रेमविनिमय प्राकृत क्रिया है। इसीलिए वे आधुनिक कला में उसपर मनमाने चित्र बनाने का दुस्साहस भी कर बैठते हैं। दूसरी ओर, कुब्जा की रति को विद्वानों ने 'कामप्राया' कहा है। कुब्जा, अर्थात् कुबड़ी को भी श्रीकृष्ण की प्रगाढ़ तृष्णा थी। परन्तु श्रीकृष्ण के लिए उसकी अभिलाषा प्रायः प्राकृत ही थी, अतएव उसकी रति की गोपीप्रेम से तुलना नहीं हो सकती। इसीलिए श्रीकृष्ण में उसकी रति को 'कामप्राया', अर्थात् 'गोपीप्रेम जैसी' कहा गया है।

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अध्याय १६ रागानुगाभक्ति (२) सम्बन्धरूपा नन्दमहाराज और यशोदा मैया आदि वृन्दावनवासियों में आदिपुरुष भगवान् श्रीकृष्ण के पितृत्व-मातृत्व के अभिमान का दिव्य भाव पाया जाता है। वास्तव में कोई भी श्रीकृष्ण का माता-पिता नहीं बन सकता; परन्तु भक्त से इस भाव का आश्रय वात्सल्यप्रेममय कृष्णप्रेम कहा जाता है। द्वारका में श्रीकृष्ण के बान्धव वृष्णिवंशी भी इसी भाव से भावित रहते हैं। अतएव वात्सल्यरति में श्रीकृष्ण की भक्ति व्रजवासियों और द्वारिकावासी वृष्णियों, दोनों में पायी जाती है। वृष्णियों और व्रजवासियों में प्रकट रागानुगाभक्ति उन-उन आश्रयों में नित्यसिद्ध है। साधनभक्ति के सम्बन्ध में इस रागानुगाप्रेम के वर्णन का प्रयोजन नहीं है, क्योंकि अधिक उन्नत अवस्था में यह स्वयं प्रकट होगा। रागानुगा भक्ति के पात्र वृष्णियों और व्रजवासी आदि नित्यसिद्ध भगवद्भक्तों की अनुगति के लोभी पुरुष रागानुगा भक्त कहलाते हैं, अर्थात् वे उन-उन भक्तों की संसिद्धि को प्राप्त करने के लिए यत्नशील हैं। ये रागानुग भक्त भक्ति के विधि-विधान का दृढ़ता से अनुसरण नहीं करते; वरन् सहज स्वभाव से ही नन्द, यशोदा आदि नित्य भक्तों के भाव के लोभी हो जाते हैं और फिर स्वतः ही उनकी अनुगति करने लगते हैं। किसी भक्त-विशेष के भाव की प्राप्ति का यह लोभ शनैः-शनैः बढ़ता जाता है। इसी क्रिया का नाम 'रागानुगा' है। यह सदा स्मरणीय है कि व्रजवासियों की अनुगति की यह लालसा तब तक सम्भव नहीं जब तक भवदोषों की निवृत्ति नहीं हो जाती। विधि- भक्ति के आचरण में एक अनर्थ-निवृत्ति नामक अवस्था आती है, जब सारे प्राकृत अनर्थ दूर हो जाते हैं। कदाचित् देखने में आता है कि अनर्थों

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रागानुगाभक्ति (२) [ १११ से मुक्त न होते हुए भी कोई इस रागानुगाभक्ति का दम्भ करता है। ऐसा नामधारी भक्त अपने को नन्द, यशोदा अथवा गोपियों का अनुग बताता है; पर साथ ही उसमें मैथुन के लिए निन्दनीय आकर्षण भी दृष्टिगोचर होता है। दिव्य प्रेम की ऐसी अभिव्यक्ति तुच्छ कपटमात्र है। जिसमें गोपीप्रेम के प्रति यथार्थ राग है, उनके चरित्र में किसी प्राकृत दोष की गन्ध भी शेष नहीं रह सकती। अतः प्रारम्भ में सब को शास्त्र और गुरु के आज्ञानुसार विधिभक्ति का दृढ़ता से पालन करना चाहिए। प्राकृत विकारों से मुक्ति के अनन्तर ही व्रजवासियों की अनुगति की यथार्थ लालसा का उदय हो सकता है। श्रील रूप गोस्वामी का वाक्य है, "जब साधक यथार्थ में भवबन्धन से मुक्त हो जाता है, तब वह श्रीकृष्ण के किसी व्रजवासी नित्यभक्त का सदा स्मरण कर सकता है, जिससे वह भी उसी रूप में श्रीकृष्ण से प्रेम कर सके। इस भाव के उद्भावित होने पर वह मन द्वारा सदा व्रजवास करता है।" भाव यह है कि यदि सम्भव हो तो शरीर से ही व्रजवास करता हुआ वृन्दावन के भक्तों की अनुगति में निरन्तर भगवत्सेवा के परायण रहे। यदि शरीर से वृन्दावन में न रह सके तो कहीं भी रहते हुए वृन्दावन में रहने का ध्यान किया जा सकता है। जहाँ भी रहना हो, सदा व्रजधाम के जीवन और भगवत्सेवा में किसी भक्त-विशेष की अनुगति का चिन्तन करना चाहिए। जो वास्तव में कृष्णभावना में उन्नति कर चुका है और निरन्तर भक्ति में तत्पर रहता है, उस भक्त को पूर्णतः सिद्ध हो जाने पर भी अपने को प्रकट नहीं करना चाहिए। भाव यह है कि जब तक प्राकृत देह है, वह निरन्तर कनिष्ठ साधन के अनुसार ही साधन करता रहे। शुद्धभक्त को भी विधि भक्ति का आचरण करते रहना चाहिए। परन्तु जब श्रीभगवान् के सम्बन्ध में अपने यथार्थ स्वरूप की अनुभूति हो जाती है, तब विधिभक्ति के साथ ही किसी भगवद्भक्त-विशेष के मार्गदर्शन में वह अपने अन्तर में भगवान् का चिन्तन करता हुआ उसी भक्त की अनुगति में अपने दिव्य भाव को विकसित कर सकता है। इस सन्दर्भ में तथाकथित 'सिद्धिप्रणय' से सावधान रहना चाहिए। 'सिद्धिप्रणय' के पथ का अनुगमन एक प्रकार के अप्रामाणिक लोग करते हैं, जिन्होंने भक्ति का अपना ही मार्ग कल्पित कर रखा है। उनकी कल्पना है कि अपने को भगवान् का पार्षद समझने मात्र से उन्होंने यह पद प्राप्त कर लिया है। यह बाहरी आचरण विधि-विधान के बिल्कुल प्रतिकूल है।

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११२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु इस ‘सिद्धिप्रणय’ नामक पद्धति का आचरण प्राकृत सहजिया नामक तथा- कथित वैष्णवों का कपट-संप्रदाय करता है। श्रील रूप गोस्वामी के अनुसार ऐसी क्रियायें आदर्श भक्ति के मार्ग में उत्पातकारी ही सिद्ध होती हैं। श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि सभी मनीषी आचार्यों के मत में रागानुगा कृष्णभक्ति का उदय होने पर भी विधि-विधान का पालन करना चाहिए। जैसा पूर्ववर्णन है, विधिभक्ति के नौ अंग हैं; इनमें भी उस साधन का आचरण विशेष रूप से करना चाहिए जिसमें अपनी स्वाभाविक रुचि हो । किसी की श्रवण में विशेष रुचि होती है तो किसी की जप अथवा मूर्ति-अर्चन में। अतः श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, वन्दन, अर्चन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन आदि भक्ति के किसी भी अंग का पूर्ण निष्ठा के साथ पालन करना चाहिए। इस प्रकार सब अपनी-अपनी रुचि के अनुसार भक्ति का साधन करें । माधुर्यरति वृन्दावन धाम की गोपियों अथवा द्वारका की महिषियों की अनुगति करने वाली भक्ति को माधुर्यरति कहते हैं।" इसके दो वर्ग हैं, एक अप्रत्यक्ष माधुर्यरति और दूसरा प्रत्यक्ष माधुर्यरति । इन दोनों ही प्रकारों में गोलोक-वृन्दावन में उस-उस सेवा में लगी हुई उस-उस गोपीविशेष की अनु- गति करनी होती है। माधुर्य में श्री श्रीभगवान् से सीधी रति को 'केलि' कहा जाता है। केलि का अर्थ साक्षात् भगवान् की सेवा में लग जाना है। ऐसे अन्य भक्त भी हैं जो पुरुषोत्तम से सीधा संपर्क तो नहीं चाहते, पर गोपियों के साथ उनके माधुर्यप्रेम सम्बन्ध का आस्वादन करते हैं। इस श्रेणी के भक्त गोपीजनों और श्रीकृष्ण की लीलाकथा के श्रवण में ही रमण करते हैं। इस माधुर्य का उदय उसी में हो सकता है, जो विधि-भक्ति का आचरण कर रहा हो, विशेषतः जो मन्दिर में राधाकृष्ण की अर्चना में संलग्न हो । इन भक्तों में शनैः-शनैः मूर्ति में रागानुगाभक्ति का विकास होता है; फिर गोपियों और भगवान् के प्रेमरस-विनिमय की कथा सुनकर वे इन लीलाओं में अनुरक्त हो जाते हैं। इस रागानुगा आकर्षण का उच्च कोटि तक विकास होने पर भक्त उपरोक्त दोनों श्रेणियों में से एक में स्थान पाता है। माधुर्यरति का प्रकाश केवल स्त्रियों में ही नहीं होता । दिव्य प्रेम- लीला का प्राकृत देह से कोई सम्बन्ध नहीं है। स्त्री में श्रीकृष्ण के सखा- भाव का और पुरुष में वृन्दावन में श्रीकृष्ण की सखी गोपी बनने के भाव का

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रागानुगाभक्ति (२) [ ११३ उदय हो सकता है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण पद्मपुराण में है—"पूर्वकाल में दण्डकारण्य के निवासी सारे ऋषि-मुनि भगवान् श्रीराम की रूपमाधुरी को देखकर इतने लुब्ध हो गए कि स्त्रीरूप में उनका आलिंगन करने की इच्छा करने लगे। कालान्तर में गोलोक वृन्दावन में श्रीकृष्ण का अवतरण होने पर ये ऋषिगण भी गोपियों के रूप में वहाँ उत्पन्न हुए। इस प्रकार भगवान् को प्राप्त होकर उनका जीवन सिद्ध हो गया।" दण्डकारण्य के ऋषियों की कथा इस प्रकार है। जब भगवान् रामचन्द्र जी दण्डकारण्य में विराज रहे थे तो वहाँ भक्तियोग में लगे हुए तपस्वी मुनिजन उनकी रूपमाधुरी पर मुग्ध होकर श्रीकृष्ण के साथ माधुर्य- प्रेमलीला का आस्वादन करने वाली गोपियों के चिन्तन में मग्न हो गये। यहाँ स्पष्ट है कि यह जानते हुए भी कि श्रीरामचन्द्र और श्रीकृष्ण एक ही परमेश्वर हैं, उन्होंने गोपियों की ही माधुर्यरति की इच्छा की। उन्हें ज्ञात था कि रामचन्द्र आदर्श राजा होने के कारण एक से अधिक पत्नी अंगीकार नहीं कर सकते; परन्तु भगवान् श्रीकृष्ण वृन्दावन में उन सब की अभिलाषा पूर्ण कर सकते हैं। उन ऋषियों ने यह भी निर्णय किया कि कृष्णरूप श्रीराम के रूप से अधिक मधुरिमामय (आकर्षक) है। अतः उन्होंने भावी जन्म में गोपी बनकर श्रीकृष्ण का संग पाने के लिए प्रार्थना की। भगवान् राम ने उनके इस निवेदन को मौन सम्मति प्रदान की थी। श्रीराम के इस वर के फलस्वरूप अगले जन्म में वे भगवान् श्रीकृष्ण का संग करने के हेतु गोकुल की गोपियों के गर्भ से स्त्रीरूप में जन्मे और अपनी पूर्व अभि- लाषा के अनुसार गोकुल वृन्दावन में विराजमान भगवान् श्रीकृष्ण के संग का आस्वादन किया। इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण के साथ माधुर्य- प्रेम के विनिमय की दिव्य भावना को उद्भावित करके उन्होंने अपने मानव जीवन को कृतार्थ कर लिया। माधुर्यरति के दो भेद हैं--पति-पत्नी का स्वकीया प्रेम और प्रियतम में होने वाला परकीया प्रेम। जिसमें श्रीकृष्ण का स्वकीया प्रेम का उदय होता, वह भक्त द्वारका में उनकी महिषी बनता है। श्रीकृष्ण से परकीया प्रेम वाले गोलोक-वृन्दावन में प्रविष्ट होकर गोपियों के साथ श्रीकृष्ण से प्रेमरस का विनिमय-आस्वादन करते हैं। यह ध्यान रहे कि गोपी अथवा महिषी के रूप में भी यह कृष्णप्रेम स्त्रियों तक ही सीमित नहीं है। पुरुष भी इस भाव का सेवन कर सकते हैं, जैसे दण्डक वन के ऋषियों ने किया था। यदि कोई माधुर्यप्रेम तो चाहता है पर गोपियों के चरणचिह्नों की अनुगति नहीं करता, तो वह द्वारका में श्रीकृष्ण का महिषी-पद पाता है।