भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु सेवाभाव की उद्भावना होते ही वह महामन्त्र कृष्णनाम के दिव्य स्वरूप को जान जाता है । श्रीमथुरामण्डल में स्थिति ‘पद्मपुराण’ में मथुरामण्डल, द्वारका आदि में वास के सम्बन्ध में एक वाक्य है, “अन्य तीर्थों की यात्रा का मुक्ति ही महाफल है । परन्तु यह मुक्ति परम संसिद्धि नहीं है । मुक्त होने के बाद भगवद्भक्ति के परायण होना है । ब्रह्मभूत हो जाने पर ही भक्तियोग की प्राप्ति होती है । अतः प्रेममयी भगवद्भक्ति ही जीवन का परम लक्ष्य है और क्षणभर के लिए भी मथुरावास करने वाले के लिए यह अत्यन्त सुलभ हो जाती है ।” आगे कहा है, “ऐसा कौन बुद्धिमान है जो मथुरा का सेवन नहीं करेगा ? मथुरा सकामकर्मियों और परमब्रह्म से एक होने जाने के अभि- लाषी मुमुक्षुओं को सर्वाभीष्ट का दान करने वाली है । फिर भक्ति चाहने वाले भक्तों को भक्ति क्यों नहीं देगी, अर्थात् अवश्य देगी ।” वैदिक शास्त्रों में अन्यत्र कहा है—“अहो ! वैकुण्ठ से भी अतिशय महिमामयी यह मथुरा कितनी धन्या है । यहाँ एक दिन रहने से भी हृदय में कृष्णभक्ति उदित हो जाती है ।”