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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 120

भक्ति के अंग (२) [ ६३ है । शुकदेव गोस्वामी परीक्षित महाराज से कहते हैं—"हे राजन ! यदि हरेकृष्ण महामन्त्र के कीर्तन में किसी का सहज अनुराग हो तो समझना चाहिए कि वह परम संसिद्धि को प्राप्त हो गया है ।" यह विशेष रूप से उल्लेख है कि कर्मफल के अभिलाषी सकाम कर्मी, परमेश्वर से एक होने की इच्छा वाले मुमुक्षु तथा सिद्धिकामी योगी केवल हरेकृष्ण महामन्त्र के कीर्तन से सम्पूर्ण संसिद्धियों को पा सकते हैं । शुकदेवजी ने इस कथन को 'निर्णीत' अर्थात् 'निश्चित' बताया है । शुकदेव मुक्तपुरुष थे; वे ऐसे किसी मत को स्वीकार नहीं करते, जो निर्णीत (सिद्ध) न हुआ हो । उन्होंने इस निर्णय पर बल दिया है कि जो मनुष्य दृढ़ता और स्थिरता से हरे- कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन करने लगा है, वह सकामकर्म, मनोधर्म और ध्यानयोग को लाँघ चुका है । 'आदिपुराण' में श्रीकृष्ण ने भी यही कहा है । वे अर्जुन से कहते हैं—"हे अर्जुन ! जो मेरे दिव्य नाम का गान करता है, वह मेरे ही सांनिध्य में रहता है । हे सखे ! मैं सत्य कहता हूँ । वह मुझे खरीद लेता है ।" 'पद्मपुराण' में उल्लेख है, "जिसने हजारों जन्मों तक भगवान् वासुदेव की सेवा की है, उसी की जिह्वा पर हरेकृष्ण महामन्त्र विराजता है ।" पद्मपुराण में कहा है, "भगवान् के पावन नाम और स्वयं भगवान् में कुछ भी भेद नहीं है । अतः भगवन्नाम भगवान् के समान ही पूर्ण, शुद्ध एवं नित्यमुक्त है । चैतन्यरसविग्रह कृष्णनाम चिन्तामणि-स्वरूप है; वह कोई प्राकृत ध्वनि नहीं है और न विकारी है ।" अतः जिसने अपनी इन्द्रियों को शुद्ध नहीं कर लिया है, ऐसा पुरुष कृष्णनाम का निरपराध उच्चारण नहीं कर सकता । भाव यह है कि प्राकृत विकारमयी कुंठित इन्द्रियाँ हरे- कृष्ण महामन्त्र का अच्छी प्रकार से उच्चारण नहीं कर सकतीं । परन्तु इस कीर्तन-पद्धति का सेवन करने से अन्तःकरण की शुद्धि होती है, जिससे अति शीघ्र अपराधरहित जप होने लगता है । भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु का आग्रह है कि मल से चित्तरूप दर्पण को स्वच्छ करने के लिए सब लोग हरेकृष्ण महामन्त्र का जप-कीर्तन करें । हृदयशुद्धि हो जाने पर ही कृष्णनाम की यथार्थ महिमा समझ में आती है । जो हृदय को अशुद्ध बनाए रखना चाहते हैं, वे हरेकृष्ण जप के दिव्य लाभ से वंचित रह जाते हैं । अतः भगवान् के प्रति सेवाभाव का उत्साह के साथ विकास करना चाहिए, क्योंकि उससे वह निरपराध जप कर सकेगा । इसलिए गुरुदेव के मार्गदर्शन में शिष्य को एक साथ भगवत्सेवा और हरे- कृष्ण जप करने की शिक्षा दी जाती है । हृदय में स्वरूपभूत रागानुगा