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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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६२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु भागवतपुरुष के मुखपद्म से ही सुने । श्रीमद्भागवत तो वास्तव में जीवन्मुक्तों के लिए भी आस्वाद्य हैं। स्वयं शुकदेव गोस्वामी ने कहा है कि यद्यपि वे माँ के गर्भ से मुक्त थे, परन्तु श्रीमद्भागवत का रसपान करने पर महा- भागवत भक्त बने। अतएव जो कृष्णभावनाभावित होने का अभिलाषी हो, वह भक्तगोष्ठी में श्रीमद्भागवत की कथा का आस्वादन करे। श्रीमद्भागवत (२.१.६) में शुकदेव गोस्वामी कहते हैं कि वे निर्विशेष ब्रह्म में अत्यन्त निष्ठ थे, परन्तु पिता व्यासदेव के मुख से जब उन्होंने श्रीभगवान् की दिव्य लीलाकथा सुनी तो श्रीमद्भागवत में अतिशय अनु- रक्त हो गए। व्यासदेव भी आत्मज्ञानी थे और इस प्रकार दिव्यज्ञान की अपनी इस प्रौढ़ रचना को उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से शुकदेव गोस्वामी को प्रदान किया। शुद्धभक्तों का संग शुद्धभक्तों की गोष्ठी में श्रीमद्भागवत की वार्ता का माहात्म्य शौनक मुनि ने नैमिषारण्य की सभा में सूत गोस्वामी के सामने अभिव्यक्त किया है। शुद्धभक्त के क्षणभर के सत्संग की इतनी अधिक महिमा है कि स्वर्ग- मोक्षदायक पुण्य भी उसकी तुलना नहीं कर सकते। भाव यह है कि श्रीमद्- भागवत के अनुरागीजन किसी प्रकार का स्वर्ग अथवा निर्विशेषवादियों द्वारा चिर अभिलाषित मुक्ति नहीं चाहते। अस्तु, शुद्धभक्त के सत्संग के दिव्य माहात्म्य के समान कोई भी प्राकृतसुख नहीं हो सकता। 'हरिभक्तिसुधोदय' में प्रह्लाद महाराज और उनके पिता हिरण्यक- शिपु में एक संवाद है। वहाँ हिरण्यकशिपु प्रह्लाद से कहता है, "हे वत्स ! संग की बड़ी महिमा है। मनुष्य जिसका संग करता है, मणि के समान वह उसके गुण को धारण कर लेता है।" इस नियम के अनुसार यदि हम सुमन जैसे निर्मल भगवद्भक्तों का संग करेंगे और यदि हमारा हृदय स्वच्छ होगा तो हमसे भी वही कर्म बनेंगे। एक सन्दर्भ में एक अन्य दृष्टान्त यह है—यदि मनुष्य समर्थ है और स्त्री भी रुग्ण नहीं है तो दोनों के संग से गर्भाधान हो जायगा। इसी प्रकार, यदि अध्यात्मविद्या के दाता और ग्राहक दोनों सच्चे अधिकारी हैं तो अच्छा परिणाम होगा। भगवन्नाम का कीर्तन श्रीमद्भागवत (२.१.११) में हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे महामन्त्र के कीर्तन की बड़ी महिमा