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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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भक्ति के अंग (२) [ ६१ ] के अनुसार मुक्ति तो अपनी स्वाभाविक स्थिति को फिर से पा लेने की केवल प्रारम्भिक दशा है। भगवान् की भक्ति करना ही जीवमात्र की स्वाभाविक स्थिति है। 'आदिपुराण' के वाक्य से ज्ञान होता है कि भक्त केवल भक्ति करने में सन्तोष मानता है। वह भवबन्धन से कोई सी मुक्ति नहीं चाहता। भाव यह है कि जो भक्ति के परायण है वह भवबन्धन में नहीं है, चाहे ऐसा प्रतीत भले ही हो। भक्तगोष्ठी में श्रीमद्भागवत का आस्वादन श्रीमद्भागवत वैदिकज्ञानरूपी कल्पवृक्ष का परिपक्व अमृतफल है। वेद शब्द ज्ञान के सम्पूर्ण समवाय का वाचक है। मानवसमाज के लिए जिस भी ज्ञान की अपेक्षा है, वह सब श्रीमद्भागवत में पूर्ण रूप से प्राप्त है। वैदिक शास्त्रों में समाजशास्त्र, राजनीति, आयुर्वेद, धनुर्वेद आदि ज्ञान के अनेक वर्ग हैं। ज्ञान के इन सभी वर्गों का वेदों में सांगोपांग प्रतिपादन हुआ है। वेद अध्यात्मविद्या में पूर्ण हैं और श्रीमद्भागवत को इस वेद रूप कल्पवृक्ष का परिपक्व अमृतफल कहा गया है। किसी भी वृक्ष की महिमा उसके फलों से ही होती है। उदाहरणार्थ, आम का पेड़ बड़ा मूल्यवान् समझा जाता है क्योंकि आम फलों का राजा है। पका हुआ आम उस वृक्ष का सर्वोत्तम उपहार है। श्रीमद्भागवत भी इसी प्रकार वेदकल्पतरु का पक्व फल हैं। जैसे तोते की चोंच से कटा हुआ फल अधिक मधुर हो जाता है, वैसे ही शुकदेव गोस्वामी के दिव्य मुखारविन्द से गायी जा कर भागवती कथा भी अधिक रसमय़ी हो गयी है। श्रीमद्भागवत को अखण्ड शिष्यपरम्परा से ग्रहण करना चाहिए। पेड़ पर चढ़े मनुष्यों द्वारा एक शाखा से दूसरी शाखा पर क्रम से उतर कर भूमि पर गिरा हुआ पक्व फल नष्ट नहीं होता। परम्परा से ग्रहण करने पर श्रीमद्भागवत भी अखण्ड (अविकृत) रहती है। भगवद्गीता में उल्लेख है कि दिव्यज्ञान परम्परा से ही हो सकता है। शास्त्र के यथार्थ प्रयोजन को जानने वाले प्रामाणिक आचार्य ही ज्ञान का संचार कर सकते हैं। भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु ने कहा है कि श्रीमद्भागवत को भागवत पुरुष के मुख से सीखना चाहिए। भागवत का अर्थ है—"भगवान् का।" अतः भक्त को भी भागवत कहा जाता है और भगवान् की भक्ति से सम्बन्धित ग्रन्थ को भी भागवत कहा जाता है। श्रीचैतन्य महाप्रभु का आग्रह है कि श्रीमद्भागवत का यथार्थ रसास्वादन करने के लिए उसे