भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० ] भक्तिरसामृतसिन्धु है। वृन्दावन में भगवान् के दामोदर रूप की अर्चना का विशेष आयोजन होता है। दामोदर नाम का सम्बन्ध श्रीकृष्ण की ऊखल-बन्धन लीला से है। कहा जाता है जैसे भगवान् दामोदर अपने भक्तों को अतिशय प्रिय हैं, वैसे ही दामोदर अथवा कार्तिक मास भी है। कार्तिक में ऊर्जव्रत की भक्ति का साधन विशेषतः मथुरा में करना चाहिए। बहुत से भक्त अद्यावधि इसका पालन करते हैं। वे कार्तिक में मथुरा अथवा वृन्दावन में वास करते हुए भक्तियोग का साधन करते हैं। पद्मपुराण में आया है, "अन्य स्थानों पर सेवा करने वाले को श्रीकृष्ण भोग और मोक्ष तो दे सकते हैं पर भक्ति नहीं देते, क्योंकि वह (भक्ति) भगवान् को वश में कर लेने वाली है। किन्तु मथुरा में कार्तिक मास में एक बार भी भगवान् दामोदर की सेवा कर लेने से मनुष्यों को वह भक्ति तत्काल ही प्राप्त हो जाती है। फिर उन्हें मुक्ति-भुक्ति की इच्छा नहीं रहती, वे केवल शुद्धभक्ति चाहते हैं।" तात्पर्य यह है कि यथार्थ उत्कण्ठा से रहित साधारण मनुष्यों को भगवान् अपनी भक्ति नहीं देते। परन्तु ऐसे व्यक्ति भी यदि कार्तिक मास में मथुरा में विधि से भक्ति का साधन करें तो वे सुगमता से भगवत्सेवा प्राप्त कर लेते हैं। जन्मदिन-यात्रा भगवान् के जन्मोत्सव आदि दिव्य क्रियाओं के सम्बन्ध में 'भविष्य- पुराण में उल्लेख है—"हे जनार्दन ! जिस दिन देवकी से आप प्रकट हुए, वह दिन बताइए, जिससे उस दिन हम महोत्सव मनायें। हे केशव ! हम आपके पूर्णतः शरणागत जन आपको इन महोत्सवों के द्वारा प्रसन्न करना चाहते हैं।" 'भविष्यपुराण' का यह वाक्य इस बात का प्रमाण है कि भगवत्- महोत्सव मनाने वाला अवश्य भगवान् की प्रीति-लाभ करता है। प्रगाढ़ भक्ति से श्रीमूर्त्ति-सेवन 'आदिपुराण' में उल्लेख है—"जो पुरुष निरन्तर नामकीर्तन और भगवत्सेवा में तन्मय होकर दिव्य सुख का आस्वादन करता है, वह भक्ति का पात्र है, उसे केवल मुक्ति कभी नहीं दी जाती।" मुक्ति का अर्थ है—भवबन्धन से छूट जाना। मुक्त हो जाने पर प्राकृत-जगत् में फिर जन्म नहीं लेना पड़ता। निर्विशेषवादी भगवान् में लीन होकर अपने स्वरूप को नष्ट करना चाहते हैं। परन्तु श्रीमद्भागवत