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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 380 में से

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भक्ति के अंग (२) [ ८६ के श्रवण-स्मरण, कीर्तन, चाहने, दर्शन, गमन, स्पर्श, आश्रय लेने और सेवन करने से अभीष्ट-सिद्धि होती है । वैष्णवसेवन 'पद्मपुराण में वैष्णवसेवन की प्रशंसा में एक सुन्दर वाक्य है । शिवजी पार्वती से कहते हैं । "हे देवि ! सब प्रकार की आराधनाओं में भगवान् की अराधना सर्वोत्तम है । परन्तु भगवद्भक्तों की आराधना उससे भी बड़ी है ।" श्रीमद्भागवत (३.७.१६) में ऐसा ही वाक्य है, "मैं भक्तों का निष्कपट दास बनने का अभिलाषी हूँ, क्योंकि उनकी सेवा करने से भगवत्- चरणारविन्दों की शुद्धभक्ति सुलभ है। भक्तसेवन से सम्पूर्ण दुःखमय भव-उपाधियों का नाश होकर भगवान् में तीव्र रति का उदय हो जाता है ।" 'स्कन्दपुराण' में उल्लेख है—"शंख, चक्र, गदा और पद्म के चिन्ह से युक्त शरीर वाले, सिर पर तुलसीमंजरी धारण किए तथा गोपीचन्दन लगाए हुए भक्त का यदि एक बार भी दर्शन हो जाय तो फिर पाप कैसे रह सकता है ?" श्रीमद्भागवत (१.१६.३३) की उक्ति है, "जिनके स्मरणमात्र से घर-परिवार शुद्ध हो जाता है, उन भक्तों के दर्शन, स्पर्श, चरण-परवारने, आसन देने तथा सेवा करने से होने वाले पुण्य का तो कहना ही क्या है ।" 'आदिपुराण' में स्वयं श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, "हे पार्थ ! जो अपने को मेरा भक्त कहता है, वह मेरा भक्त नहीं है। जो मेरे भक्त का भक्त है, वही मेरा यथार्थ भक्त है ।" कोई भी अपने निजी प्रयास से भगवान् को प्राप्त नहीं कर सकता । उनकी प्राप्ति उनके शुद्धभक्तों के माध्यम से ही होती है । अतएव वैष्णव आचार में पहली क्रिया भक्त को गुरु बनाकर उसका सेवन करना है । श्रील रूप गोस्वामी पुष्टि करते हैं कि भक्तिरसामृतसिन्धु में नाना शास्त्रों से समाहृत सारे उद्धरण महान् आचार्यों और भगवद्भक्तों को मान्य हैं। वैभव-महोत्सव पद्मपुराण में कहा गया है कि अपने वैभव के अनुसार सभी को भगवान् के सब उत्सवों और जयंतियों का आयोजन करना चाहिए । इनमें से ऊर्जव्रत का बड़ा माहात्म्य है। यह ऊर्जव्रत कार्तिक में मनाया जाता

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