भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १२ भक्ति के अंग (२) शास्त्र-श्रवण श्रील रूपगोस्वामी के अनुसार, जो ग्रन्थ भक्तिमार्ग को प्रकाशित करे, वह शास्त्र है। श्रील मध्वाचार्य का वचन है कि रामायण, महाभारत, पुराण, उपनिषद्, वेदान्तसूत्र आदि ग्रन्थ और इनके अनुगामी अन्य सब ग्रन्थ शास्त्र हैं। ‘स्कन्दपुराण’ में उल्लेख है, “जो वैष्णव शास्त्रों का निरन्तर पठन और श्रवण करते हैं, वे मनुष्यों में धन्य हैं, निस्सन्देह भगवान् श्रीकृष्ण उनसे प्रसन्न होते हैं। वैष्णवशास्त्रों की घर में अर्चना करने वाले पापों से छूट कर देवताओं के वन्दनीय बन जाते हैं।” नारदजी से कहा गया है, “हे नारद ! जो मनुष्य वैष्णवशास्त्रों को लिखकर घर में रखता है, उसके यहाँ साक्षात् श्रीमन्नारायण विराजते हैं।” श्रीमद्भागवत (१२.१३.१५) में कथन है, “यह श्रीमद्भागवत सारे वेदान्त का परम सार है। जो किसी प्रकार श्रीमद्भागवत में रस लेने लगता है, उसकी किसी अन्य साहित्य को पढने में रुचि नहीं होती। भाव यह है कि श्रीमद्भागवत के दिव्यरस से तृप्त हुआ भाग्यवान् ग्राम्यवार्ता में रस नहीं ले सकता।” मथुरामण्डल में वास ‘वराहपुराण’ में मथुरामण्डल की स्तुति है। भगवान् वराह पृथ्वी- वासियों से कहते हैं, “जो मथुरा को छोड़ अन्य स्थान में प्रेम करता है, वह मूढ़ मेरी माया द्वारा मोहित होकर संसार में चक्कर काटता रहेगा।” ‘ब्रह्माण्डपुराण’ में वचन है, “जो परमानन्दमयी सिद्धि तीनों लोकों के तीर्थों में जाने से भी नहीं मिलती, वह मथुरा के स्पर्शमात्र से प्राप्त हो जाती है।” शास्त्रों में स्थान-स्थान पर कहा गया है कि मथुरा