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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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भगवत्सेवा के नाना रूप [ ८७ शरण में आ जाता है, अपने उस आश्रित का मैं सब क्लेशों से उद्धार करता हूँ।” तुलसीसेवन ‘स्कन्दपुराण’ में तुलसी का माहात्म्य है, “जिसके दर्शन से पापों और रोगों का नाश होता है, स्पर्श से शरीर शुद्ध होता है, वंदन करने और सींचने से यमभय जाता रहता है, संरोपण करने से जो भगवान् की भक्ति देने वाली है और श्रीकृष्ण के चरणों में अर्पित करने से जो पूर्ण भगवत्प्रेम का दान करती है, उस तुलसीदेवी के चरणों में सादर प्रणाम करता हूँ।” अवैष्णव हिन्दुओं के घरों में भी तुलसी की विशेष शुश्रूषा की जाती है। महानगरों में तुलसी रखना बड़ा कठिन है, परन्तु फिर भी लोग इसे बड़ी सावधानी से लगाते हैं। वे इसे जल से सींच कर प्रणाम करते हैं क्योंकि भक्तिपथ में तुलसीसेवा बहुत महत्त्वपूर्ण है। ‘स्कन्दपुराण’ में तुलसीमाहात्म्य का एक अन्य वाक्य है, “तुलसी सर्वमंगलमयी हैं। इसे देखने, स्पर्श, स्मरण, स्तुति, वन्दना, श्रवण अथवा रोपण करने से सब प्रकार का कल्याण होता है। इन नौ विधियों से तुलसीसेवन करने वाला शाश्वत् काल तक वैकुण्ठ-जगत् में वास करता है।