भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु 'हरिभक्तिविवेक' में शरीर के समर्पण का प्रकार कहा गया है। भक्त कहता है, 'हे स्वामिन् ! बिका हुआ पशु अपने शरीर की रक्षा के लिए चिन्ता नहीं करता । मेरा शरीर-आत्मा आपको समर्पित हो गया है, इसलिए अपने रक्षण की चिन्ता से विरत हो गया हूँ।' भाव यह है कि अपने अथवा परिवार के रक्षण-मरण की चिन्ता न करे । यदि कोई वास्तव में शरीर-आत्मा से समर्पित हो गया है तो सदा स्मरण रखे कि उसका एकमात्र कार्य भगवत्सेवा के परायण रहना है । श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि सख्य और आत्मनिवेदन, भक्ति के ये दोनों अंग दुष्कर हैं, बहुत कम पाये जाते हैं और केवल उत्तर भक्तों के लिए ही साधना में सुखसाध्य हैं। भाव यह है कि शुद्ध भावभक्ति से युक्त आत्मनिवेदन बड़ा ही दुर्लभ है। यह तभी होगा जब पूर्ण रूप से भगवान् की इच्छा के परायण (शरणागत) हो जाय । निज प्रिय वस्तु का समर्पण श्रीमद्भागवत (११.११.४१) में भगवान् श्रीकृष्ण उद्धव से कहते हैं, "हे सखे ! अपने पास जो-जो परम श्रेष्ठ वस्तु हो या संसार में जो प्रिय हो, उसे मेरे अर्पण करने से अनन्त लाभ होता है ।" भगवान् की प्रीति के लिए सब चेष्टा करना भगवान् के लिए सब चेष्टा करने का दृष्टान्त 'नारदपंचरात्र' में है । उल्लेख है कि भक्ति के अभिलाषी को भगवान् की सेवा के लिए सब लौकिकी-वैदिकी क्रियायें करनी चाहियें । तात्पर्य यह है कि भक्ति के शास्त्रविहित विधान का पालन करने के साथ-साथ भक्त को अपने व्याव- हारिक जीवन के कर्त्तव्यों का आचरण भी कृष्णभावनाभावित होकर ही करना चाहिए । जैसे किसी भक्त का कोई बड़ा उद्योग हो, तो वह इस लौकिक सम्पत्ति के फलों को भगवान् की सेवा में लगा सकता है। शरणापत्ति हरिभक्तिविलास' का वचन है, "जिस शरणागत भक्त को यह दृढ़ विश्वास है कि मैं भगवान् का हूँ और जो इस भाव के अनुरूप वास्तव में मन, वचन और कर्म से क्रिया भी करता है, वह यथार्थ दिव्य आनन्दमय का आस्वादन करता है।" नृसिंहपुराण में भगवान् नृसिंह कहते हैं—"हे देवदेव ! जनार्दन ! मैं आप की शरण में आया हूँ, इस प्रकार कहकर जो