भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभगवत्सेवा के नाना रूप [ ८५ की भक्ति में अधिकार का कारण तथा भक्ति में दृढ़ विश्वास को भक्ति का का अंग कहा गया है । कभी-कभी अन्तरंग सखा की भाँति भगवान् के सेवन के लिए शुद्ध- भक्त मन्दिर के भीतर ही सो जाते हैं। भक्त के इस सख्य-व्यवहार को रागानुगा कहा जा सकता है। यद्यपि यह विधि है कि भगवत्-मन्दिर में कोई नहीं सो सकता, फिर भी यह रागानुगाभक्ति सख्य के वर्ग में मानी जा सकती है। आत्मनिवेदन आत्मनिवेदन के सम्बन्ध में श्रीमद्भागवत (११.२६.३४) में भगवान् का सुन्दर कथन है—“जो पुरुष मेरे चरणों में पूर्ण समर्पण करके अन्य सब कर्मों को त्याग देता है, उसकी लोक-परलोक में मैं स्वयं रक्षा करता हूँ । आत्मनिवेदन के पथ पर उत्तरोत्तर आगे बढ़ने में मैं उसकी सहायता करता हूँ । ऐसा पुरुष साष्टि को प्राप्त हो चुका है।” भगवद्गीता में भी प्रमाण है कि जैसे ही कोई श्रीकृष्ण के चरणसरोज की शरण लेता है, श्रीकृष्ण उसकी बागडोर अपने हाथों में पकड़ लेते हैं और सम्पूर्ण पापों से मुक्ति का वचन देते हैं। वे अन्तरतर से उपदेश भी करते हैं जिससे वह परमार्थ के पथ पर शीघ्र अग्रसर हो सके । पूर्ण शरणागति का नाम ही आत्मनिवेदन है। प्रसंग के अनुसार ‘आत्म शब्द के विभिन्न-भिन्न अर्थ होते हैं। इसका प्रयोग कभी ‘आत्मा’ के अर्थ में होता है तो कभी यह शरीर अथवा मन का निर्देश करता है । अतः पूर्ण आत्मनिवेदन का अर्थ अपने आत्मा, अपने मन और शरीर को भगवान् की सेवा में समर्पित कर देना है। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने इस सम्बन्ध में अतिशय सुन्दर भजन गाया है। भगवच्चरणों में पूर्ण आत्मनिवेदन करते हुए वे कहते हैं, “मेरा मन, मेरा घर-परिवार, मेरा शरीर—जो कुछ भी मेरा है, हे नाथ ! वह सब आपकी सेवा में समर्पित है। अब आप जो चाहें उनके साथ वैसा ही करें । आप स्वामी हैं, मैं नित्यदास हूँ, इसलिए चाहें तो मुझे मार डालें अथवा इच्छा हो तो मेरी रक्षा करें । आपका पूर्ण अधिकार है, मेरा अपना कुछ नहीं ।” श्रीयामुनाचार्य ने भी भगवत्स्तवन में यही उद्गार अभिव्यंजित किए हैं—‘शरीर से मैं मनुष्य, देवता आदि जो कोई भी हूँ और जिस किसी गुण से युक्त हूँ, मुझे चिन्ता नहीं, क्योंकि यह सब त्रिगुणमयी माया का कार्य है, मैंने तो अपने-आपको आपके चरणकमलों में समर्पित कर दिया है ।' .