भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु के फल का श्रीकृष्ण को अर्पण करना चाहिए । इसी का नाम दास्यभाव है, अर्थात् भगवान् स्वामी और भक्त उनका दास । ‘नारदीयपुराण’ में इस दास्यभाव को दिव्य बताया गया है। वहाँ उल्लेख है कि जो पुरुष मन, वचन और कर्म से निरन्तर भगवद्भक्ति के परायण है अथवा जो केवल इसकी अभिलाषा भी करता है, वह सब अवस्थाओं में जीवन्मुक्त है। सख्य सख्यभक्ति के दो भेद हैं—एक विश्वासवृत्ति और दूसरा मित्रवृत्ति । भगवद्भक्ति में विश्वास रखनेवाला क्रम से विधि-विधान का पालन करता है क्योंकि उसे यह दृढ़ श्रद्धा रहती है कि वह शुद्धसत्त्व में अवश्य स्थित हो जायगा । दूसरे प्रकार का सखाभाव श्रीभगवान् का हितैषी (सुहृद) बन जाना है। भगवद्गीता में कहा है कि प्रचारक भगवान् का परम प्रिय प्रेमपात्र है। गीता का गोपनीय सन्देश जनसाधारण में प्रसारित करने वाला श्रीकृष्ण का इतना प्यारा है कि जगत् में कोई भी उसकी तुलना नहीं कर सकता । महाभारत में द्रौपदी कहती है, “हे गोविन्द ! आपकी प्रतिज्ञा है कि मेरे भक्त का कभी नाश नहीं होता । मुझे इस पर विश्वास है, इसलिए महान् विपत्तियों में भी इसे याद कर-कर के प्राणधारण किए हुए हूँ।” द्रौपदी और उसके पति पाँचों पाण्डवों को दुर्योधन आदि बान्धवों ने बड़े- बड़े दुःख दिए । उनके दुःख इतने भयंकर थे कि महान् पराक्रमी और नैष्ठिक ब्रह्मचारी भीष्मदेव भी उनका विचार करके कभी-कभी रो पड़ते थे। उन्हें विस्मय होता कि यद्यपि पाण्डव इतने धर्मात्मा थे, द्रौपदी साक्षात् लक्ष्मी जैसी थी और स्वयं श्रीकृष्ण उनके बन्धु थे, फिर भी उन्हें इतना दुःख उठाना पड़ा । ऐसे अपार दुःख में भी द्रौपदी विचलित नहीं हुई । वह जानती थी कि श्रीकृष्ण उनके सुहृद हैं, अतः अन्त में विजय उन्हीं की होगी । श्रीमद्भागवत (११.२.५३) में भगवान् ऋषभ के पुत्र हवि राजा निमि से कहते हैं, “हे राजन् ! जो त्रिभुवन के ऐश्वर्य के लिए भी श्रीभगवान् के चरणकमलों की सेवा से जो देवताओं की भी चिर अभिलाषा है, विचलित नहीं होता, इसी को परम, आराध्य मानने के दृढ़ निश्चय से युक्त रहता है, वह उत्तम भक्त है ।’’ श्रीरूप गोस्वामी ने कनिष्ठ भक्त की सामान्य श्रद्धा को भगवान्