भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ११ भगवत्सेवा के नाना रूप दास्यभाव कर्मियों के मत में कर्मफल का अर्पण दास्य है; परन्तु रूप गोस्वामी आदि वैष्णव आचार्यों के अनुसार किसी-न-किसी रूप में भगवत्सेवा में निरन्तर संलग्न रहना दास्य का स्वरूप है। 'स्कन्दपुराण' में कहा है कि कर्मकाण्ड और वर्णाश्रम का आचरण करने वाले भक्त हैं। परन्तु जो यथार्थ में प्रत्यक्ष रूप से भगवत्सेवा में लगे रहते हैं, वे भागवत, अर्थात् शुद्धभक्त हैं। सकाम कर्मी अथवा वर्णाश्रमधर्म का पालन करने वाले शुद्धभक्त नहीं हो सकते । फिर भी, भगवान् को कर्मफल का अर्पण करते हैं, इस कारण उन्हें भी भक्त मान लिया है। जब अन्य कोई अभिलाषा नहीं रहती और वह भगवत्प्रेम से भरकर स्वाभाविक रागानुगा भगवत्सेवा करता है, तब उसे शुद्धभक्त समझना चाहिए। प्राकृत-जगत् के संसर्ग में आए सभी बद्धजीव न्यूनाधिक रूप में माया पर प्रभुत्व करना चाहते हैं। वर्णाश्रम पद्धति और तत्सम्बन्धी कर्तव्य इस विधि से निर्धारित हैं कि बद्धजीव स्वेच्छानुसार प्राकृत-जगत् को भोग सके, पर साथ ही शनैः-शनैः पारमार्थिक ज्ञान को भी प्राप्त हो जाय। वर्णाश्रमधर्म के अन्तर्गत ऐसे अनेक कर्तव्य हैं, जो कृष्णभावनाभावित भक्तियोग के अंग हैं। गृहस्थ भक्त वैदिककर्म और भक्ति के कर्तव्य, दोनों का आचरण करते हैं क्योंकि ये दोनों ही श्रीकृष्ण की प्रीति के लिए हैं। गृहस्थ भक्त किसी वैदिककर्म का अनुष्ठान श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के लिए ही करते हैं। पूर्व- वर्णन किया जा चुका है कि जिस भी क्रिया का लक्ष्य श्रीकृष्ण की तृप्ति करना हो, वह भक्ति है। श्रीरूप गोस्वामी भक्ति करने के योग्य पुरुष का वर्णन करते हैं। जिनमें थोड़ा कुछ भगवत्प्रेम का उदय हो गया है, वे कनिष्ठ अधिकारी अपनी भक्ति के विकास के अनुसार इन्द्रियतृप्ति से अरुचि अनुभव करते हैं। यदि इन्द्रियतृप्तिकारक क्रियाओं में कुछ भी आसक्ति शेष हो तो इन क्रियाओं