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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

भगवत्सेवा के नाना रूप [ ८७ शरण में आ जाता है, अपने उस आश्रित का मैं सब क्लेशों से उद्धार करता हूँ।” तुलसीसेवन ‘स्कन्दपुराण’ में तुलसी का माहात्म्य है, “जिसके दर्शन से पापों और रोगों का नाश होता है, स्पर्श से शरीर शुद्ध होता है, वंदन करने और सींचने से यमभय जाता रहता है, संरोपण करने से जो भगवान् की भक्ति देने वाली है और श्रीकृष्ण के चरणों में अर्पित करने से जो पूर्ण भगवत्प्रेम का दान करती है, उस तुलसीदेवी के चरणों में सादर प्रणाम करता हूँ।” अवैष्णव हिन्दुओं के घरों में भी तुलसी की विशेष शुश्रूषा की जाती है। महानगरों में तुलसी रखना बड़ा कठिन है, परन्तु फिर भी लोग इसे बड़ी सावधानी से लगाते हैं। वे इसे जल से सींच कर प्रणाम करते हैं क्योंकि भक्तिपथ में तुलसीसेवा बहुत महत्त्वपूर्ण है। ‘स्कन्दपुराण’ में तुलसीमाहात्म्य का एक अन्य वाक्य है, “तुलसी सर्वमंगलमयी हैं। इसे देखने, स्पर्श, स्मरण, स्तुति, वन्दना, श्रवण अथवा रोपण करने से सब प्रकार का कल्याण होता है। इन नौ विधियों से तुलसीसेवन करने वाला शाश्वत् काल तक वैकुण्ठ-जगत् में वास करता है।

अध्याय १२ भक्ति के अंग (२) शास्त्र-श्रवण श्रील रूपगोस्वामी के अनुसार, जो ग्रन्थ भक्तिमार्ग को प्रकाशित करे, वह शास्त्र है। श्रील मध्वाचार्य का वचन है कि रामायण, महाभारत, पुराण, उपनिषद्, वेदान्तसूत्र आदि ग्रन्थ और इनके अनुगामी अन्य सब ग्रन्थ शास्त्र हैं। ‘स्कन्दपुराण’ में उल्लेख है, “जो वैष्णव शास्त्रों का निरन्तर पठन और श्रवण करते हैं, वे मनुष्यों में धन्य हैं, निस्सन्देह भगवान् श्रीकृष्ण उनसे प्रसन्न होते हैं। वैष्णवशास्त्रों की घर में अर्चना करने वाले पापों से छूट कर देवताओं के वन्दनीय बन जाते हैं।” नारदजी से कहा गया है, “हे नारद ! जो मनुष्य वैष्णवशास्त्रों को लिखकर घर में रखता है, उसके यहाँ साक्षात् श्रीमन्नारायण विराजते हैं।” श्रीमद्भागवत (१२.१३.१५) में कथन है, “यह श्रीमद्भागवत सारे वेदान्त का परम सार है। जो किसी प्रकार श्रीमद्भागवत में रस लेने लगता है, उसकी किसी अन्य साहित्य को पढने में रुचि नहीं होती। भाव यह है कि श्रीमद्भागवत के दिव्यरस से तृप्त हुआ भाग्यवान् ग्राम्यवार्ता में रस नहीं ले सकता।” मथुरामण्डल में वास ‘वराहपुराण’ में मथुरामण्डल की स्तुति है। भगवान् वराह पृथ्वी- वासियों से कहते हैं, “जो मथुरा को छोड़ अन्य स्थान में प्रेम करता है, वह मूढ़ मेरी माया द्वारा मोहित होकर संसार में चक्कर काटता रहेगा।” ‘ब्रह्माण्डपुराण’ में वचन है, “जो परमानन्दमयी सिद्धि तीनों लोकों के तीर्थों में जाने से भी नहीं मिलती, वह मथुरा के स्पर्शमात्र से प्राप्त हो जाती है।” शास्त्रों में स्थान-स्थान पर कहा गया है कि मथुरा

भक्ति के अंग (२) [ ८६ के श्रवण-स्मरण, कीर्तन, चाहने, दर्शन, गमन, स्पर्श, आश्रय लेने और सेवन करने से अभीष्ट-सिद्धि होती है । वैष्णवसेवन 'पद्मपुराण में वैष्णवसेवन की प्रशंसा में एक सुन्दर वाक्य है । शिवजी पार्वती से कहते हैं । "हे देवि ! सब प्रकार की आराधनाओं में भगवान् की अराधना सर्वोत्तम है । परन्तु भगवद्भक्तों की आराधना उससे भी बड़ी है ।" श्रीमद्भागवत (३.७.१६) में ऐसा ही वाक्य है, "मैं भक्तों का निष्कपट दास बनने का अभिलाषी हूँ, क्योंकि उनकी सेवा करने से भगवत्- चरणारविन्दों की शुद्धभक्ति सुलभ है। भक्तसेवन से सम्पूर्ण दुःखमय भव-उपाधियों का नाश होकर भगवान् में तीव्र रति का उदय हो जाता है ।" 'स्कन्दपुराण' में उल्लेख है—"शंख, चक्र, गदा और पद्म के चिन्ह से युक्त शरीर वाले, सिर पर तुलसीमंजरी धारण किए तथा गोपीचन्दन लगाए हुए भक्त का यदि एक बार भी दर्शन हो जाय तो फिर पाप कैसे रह सकता है ?" श्रीमद्भागवत (१.१६.३३) की उक्ति है, "जिनके स्मरणमात्र से घर-परिवार शुद्ध हो जाता है, उन भक्तों के दर्शन, स्पर्श, चरण-परवारने, आसन देने तथा सेवा करने से होने वाले पुण्य का तो कहना ही क्या है ।" 'आदिपुराण' में स्वयं श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, "हे पार्थ ! जो अपने को मेरा भक्त कहता है, वह मेरा भक्त नहीं है। जो मेरे भक्त का भक्त है, वही मेरा यथार्थ भक्त है ।" कोई भी अपने निजी प्रयास से भगवान् को प्राप्त नहीं कर सकता । उनकी प्राप्ति उनके शुद्धभक्तों के माध्यम से ही होती है । अतएव वैष्णव आचार में पहली क्रिया भक्त को गुरु बनाकर उसका सेवन करना है । श्रील रूप गोस्वामी पुष्टि करते हैं कि भक्तिरसामृतसिन्धु में नाना शास्त्रों से समाहृत सारे उद्धरण महान् आचार्यों और भगवद्भक्तों को मान्य हैं। वैभव-महोत्सव पद्मपुराण में कहा गया है कि अपने वैभव के अनुसार सभी को भगवान् के सब उत्सवों और जयंतियों का आयोजन करना चाहिए । इनमें से ऊर्जव्रत का बड़ा माहात्म्य है। यह ऊर्जव्रत कार्तिक में मनाया जाता

६० ] भक्तिरसामृतसिन्धु है। वृन्दावन में भगवान् के दामोदर रूप की अर्चना का विशेष आयोजन होता है। दामोदर नाम का सम्बन्ध श्रीकृष्ण की ऊखल-बन्धन लीला से है। कहा जाता है जैसे भगवान् दामोदर अपने भक्तों को अतिशय प्रिय हैं, वैसे ही दामोदर अथवा कार्तिक मास भी है। कार्तिक में ऊर्जव्रत की भक्ति का साधन विशेषतः मथुरा में करना चाहिए। बहुत से भक्त अद्यावधि इसका पालन करते हैं। वे कार्तिक में मथुरा अथवा वृन्दावन में वास करते हुए भक्तियोग का साधन करते हैं। पद्मपुराण में आया है, "अन्य स्थानों पर सेवा करने वाले को श्रीकृष्ण भोग और मोक्ष तो दे सकते हैं पर भक्ति नहीं देते, क्योंकि वह (भक्ति) भगवान् को वश में कर लेने वाली है। किन्तु मथुरा में कार्तिक मास में एक बार भी भगवान् दामोदर की सेवा कर लेने से मनुष्यों को वह भक्ति तत्काल ही प्राप्त हो जाती है। फिर उन्हें मुक्ति-भुक्ति की इच्छा नहीं रहती, वे केवल शुद्धभक्ति चाहते हैं।" तात्पर्य यह है कि यथार्थ उत्कण्ठा से रहित साधारण मनुष्यों को भगवान् अपनी भक्ति नहीं देते। परन्तु ऐसे व्यक्ति भी यदि कार्तिक मास में मथुरा में विधि से भक्ति का साधन करें तो वे सुगमता से भगवत्सेवा प्राप्त कर लेते हैं। जन्मदिन-यात्रा भगवान् के जन्मोत्सव आदि दिव्य क्रियाओं के सम्बन्ध में 'भविष्य- पुराण में उल्लेख है—"हे जनार्दन ! जिस दिन देवकी से आप प्रकट हुए, वह दिन बताइए, जिससे उस दिन हम महोत्सव मनायें। हे केशव ! हम आपके पूर्णतः शरणागत जन आपको इन महोत्सवों के द्वारा प्रसन्न करना चाहते हैं।" 'भविष्यपुराण' का यह वाक्य इस बात का प्रमाण है कि भगवत्- महोत्सव मनाने वाला अवश्य भगवान् की प्रीति-लाभ करता है। प्रगाढ़ भक्ति से श्रीमूर्त्ति-सेवन 'आदिपुराण' में उल्लेख है—"जो पुरुष निरन्तर नामकीर्तन और भगवत्सेवा में तन्मय होकर दिव्य सुख का आस्वादन करता है, वह भक्ति का पात्र है, उसे केवल मुक्ति कभी नहीं दी जाती।" मुक्ति का अर्थ है—भवबन्धन से छूट जाना। मुक्त हो जाने पर प्राकृत-जगत् में फिर जन्म नहीं लेना पड़ता। निर्विशेषवादी भगवान् में लीन होकर अपने स्वरूप को नष्ट करना चाहते हैं। परन्तु श्रीमद्भागवत

भक्ति के अंग (२) [ ६१ ] के अनुसार मुक्ति तो अपनी स्वाभाविक स्थिति को फिर से पा लेने की केवल प्रारम्भिक दशा है। भगवान् की भक्ति करना ही जीवमात्र की स्वाभाविक स्थिति है। 'आदिपुराण' के वाक्य से ज्ञान होता है कि भक्त केवल भक्ति करने में सन्तोष मानता है। वह भवबन्धन से कोई सी मुक्ति नहीं चाहता। भाव यह है कि जो भक्ति के परायण है वह भवबन्धन में नहीं है, चाहे ऐसा प्रतीत भले ही हो। भक्तगोष्ठी में श्रीमद्भागवत का आस्वादन श्रीमद्भागवत वैदिकज्ञानरूपी कल्पवृक्ष का परिपक्व अमृतफल है। वेद शब्द ज्ञान के सम्पूर्ण समवाय का वाचक है। मानवसमाज के लिए जिस भी ज्ञान की अपेक्षा है, वह सब श्रीमद्भागवत में पूर्ण रूप से प्राप्त है। वैदिक शास्त्रों में समाजशास्त्र, राजनीति, आयुर्वेद, धनुर्वेद आदि ज्ञान के अनेक वर्ग हैं। ज्ञान के इन सभी वर्गों का वेदों में सांगोपांग प्रतिपादन हुआ है। वेद अध्यात्मविद्या में पूर्ण हैं और श्रीमद्भागवत को इस वेद रूप कल्पवृक्ष का परिपक्व अमृतफल कहा गया है। किसी भी वृक्ष की महिमा उसके फलों से ही होती है। उदाहरणार्थ, आम का पेड़ बड़ा मूल्यवान् समझा जाता है क्योंकि आम फलों का राजा है। पका हुआ आम उस वृक्ष का सर्वोत्तम उपहार है। श्रीमद्भागवत भी इसी प्रकार वेदकल्पतरु का पक्व फल हैं। जैसे तोते की चोंच से कटा हुआ फल अधिक मधुर हो जाता है, वैसे ही शुकदेव गोस्वामी के दिव्य मुखारविन्द से गायी जा कर भागवती कथा भी अधिक रसमय़ी हो गयी है। श्रीमद्भागवत को अखण्ड शिष्यपरम्परा से ग्रहण करना चाहिए। पेड़ पर चढ़े मनुष्यों द्वारा एक शाखा से दूसरी शाखा पर क्रम से उतर कर भूमि पर गिरा हुआ पक्व फल नष्ट नहीं होता। परम्परा से ग्रहण करने पर श्रीमद्भागवत भी अखण्ड (अविकृत) रहती है। भगवद्गीता में उल्लेख है कि दिव्यज्ञान परम्परा से ही हो सकता है। शास्त्र के यथार्थ प्रयोजन को जानने वाले प्रामाणिक आचार्य ही ज्ञान का संचार कर सकते हैं। भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु ने कहा है कि श्रीमद्भागवत को भागवत पुरुष के मुख से सीखना चाहिए। भागवत का अर्थ है—"भगवान् का।" अतः भक्त को भी भागवत कहा जाता है और भगवान् की भक्ति से सम्बन्धित ग्रन्थ को भी भागवत कहा जाता है। श्रीचैतन्य महाप्रभु का आग्रह है कि श्रीमद्भागवत का यथार्थ रसास्वादन करने के लिए उसे

६२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु भागवतपुरुष के मुखपद्म से ही सुने । श्रीमद्भागवत तो वास्तव में जीवन्मुक्तों के लिए भी आस्वाद्य हैं। स्वयं शुकदेव गोस्वामी ने कहा है कि यद्यपि वे माँ के गर्भ से मुक्त थे, परन्तु श्रीमद्भागवत का रसपान करने पर महा- भागवत भक्त बने। अतएव जो कृष्णभावनाभावित होने का अभिलाषी हो, वह भक्तगोष्ठी में श्रीमद्भागवत की कथा का आस्वादन करे। श्रीमद्भागवत (२.१.६) में शुकदेव गोस्वामी कहते हैं कि वे निर्विशेष ब्रह्म में अत्यन्त निष्ठ थे, परन्तु पिता व्यासदेव के मुख से जब उन्होंने श्रीभगवान् की दिव्य लीलाकथा सुनी तो श्रीमद्भागवत में अतिशय अनु- रक्त हो गए। व्यासदेव भी आत्मज्ञानी थे और इस प्रकार दिव्यज्ञान की अपनी इस प्रौढ़ रचना को उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से शुकदेव गोस्वामी को प्रदान किया। शुद्धभक्तों का संग शुद्धभक्तों की गोष्ठी में श्रीमद्भागवत की वार्ता का माहात्म्य शौनक मुनि ने नैमिषारण्य की सभा में सूत गोस्वामी के सामने अभिव्यक्त किया है। शुद्धभक्त के क्षणभर के सत्संग की इतनी अधिक महिमा है कि स्वर्ग- मोक्षदायक पुण्य भी उसकी तुलना नहीं कर सकते। भाव यह है कि श्रीमद्- भागवत के अनुरागीजन किसी प्रकार का स्वर्ग अथवा निर्विशेषवादियों द्वारा चिर अभिलाषित मुक्ति नहीं चाहते। अस्तु, शुद्धभक्त के सत्संग के दिव्य माहात्म्य के समान कोई भी प्राकृतसुख नहीं हो सकता। 'हरिभक्तिसुधोदय' में प्रह्लाद महाराज और उनके पिता हिरण्यक- शिपु में एक संवाद है। वहाँ हिरण्यकशिपु प्रह्लाद से कहता है, "हे वत्स ! संग की बड़ी महिमा है। मनुष्य जिसका संग करता है, मणि के समान वह उसके गुण को धारण कर लेता है।" इस नियम के अनुसार यदि हम सुमन जैसे निर्मल भगवद्भक्तों का संग करेंगे और यदि हमारा हृदय स्वच्छ होगा तो हमसे भी वही कर्म बनेंगे। एक सन्दर्भ में एक अन्य दृष्टान्त यह है—यदि मनुष्य समर्थ है और स्त्री भी रुग्ण नहीं है तो दोनों के संग से गर्भाधान हो जायगा। इसी प्रकार, यदि अध्यात्मविद्या के दाता और ग्राहक दोनों सच्चे अधिकारी हैं तो अच्छा परिणाम होगा। भगवन्नाम का कीर्तन श्रीमद्भागवत (२.१.११) में हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे महामन्त्र के कीर्तन की बड़ी महिमा

भक्ति के अंग (२) [ ६३ है । शुकदेव गोस्वामी परीक्षित महाराज से कहते हैं—"हे राजन ! यदि हरेकृष्ण महामन्त्र के कीर्तन में किसी का सहज अनुराग हो तो समझना चाहिए कि वह परम संसिद्धि को प्राप्त हो गया है ।" यह विशेष रूप से उल्लेख है कि कर्मफल के अभिलाषी सकाम कर्मी, परमेश्वर से एक होने की इच्छा वाले मुमुक्षु तथा सिद्धिकामी योगी केवल हरेकृष्ण महामन्त्र के कीर्तन से सम्पूर्ण संसिद्धियों को पा सकते हैं । शुकदेवजी ने इस कथन को 'निर्णीत' अर्थात् 'निश्चित' बताया है । शुकदेव मुक्तपुरुष थे; वे ऐसे किसी मत को स्वीकार नहीं करते, जो निर्णीत (सिद्ध) न हुआ हो । उन्होंने इस निर्णय पर बल दिया है कि जो मनुष्य दृढ़ता और स्थिरता से हरे- कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन करने लगा है, वह सकामकर्म, मनोधर्म और ध्यानयोग को लाँघ चुका है । 'आदिपुराण' में श्रीकृष्ण ने भी यही कहा है । वे अर्जुन से कहते हैं—"हे अर्जुन ! जो मेरे दिव्य नाम का गान करता है, वह मेरे ही सांनिध्य में रहता है । हे सखे ! मैं सत्य कहता हूँ । वह मुझे खरीद लेता है ।" 'पद्मपुराण' में उल्लेख है, "जिसने हजारों जन्मों तक भगवान् वासुदेव की सेवा की है, उसी की जिह्वा पर हरेकृष्ण महामन्त्र विराजता है ।" पद्मपुराण में कहा है, "भगवान् के पावन नाम और स्वयं भगवान् में कुछ भी भेद नहीं है । अतः भगवन्नाम भगवान् के समान ही पूर्ण, शुद्ध एवं नित्यमुक्त है । चैतन्यरसविग्रह कृष्णनाम चिन्तामणि-स्वरूप है; वह कोई प्राकृत ध्वनि नहीं है और न विकारी है ।" अतः जिसने अपनी इन्द्रियों को शुद्ध नहीं कर लिया है, ऐसा पुरुष कृष्णनाम का निरपराध उच्चारण नहीं कर सकता । भाव यह है कि प्राकृत विकारमयी कुंठित इन्द्रियाँ हरे- कृष्ण महामन्त्र का अच्छी प्रकार से उच्चारण नहीं कर सकतीं । परन्तु इस कीर्तन-पद्धति का सेवन करने से अन्तःकरण की शुद्धि होती है, जिससे अति शीघ्र अपराधरहित जप होने लगता है । भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु का आग्रह है कि मल से चित्तरूप दर्पण को स्वच्छ करने के लिए सब लोग हरेकृष्ण महामन्त्र का जप-कीर्तन करें । हृदयशुद्धि हो जाने पर ही कृष्णनाम की यथार्थ महिमा समझ में आती है । जो हृदय को अशुद्ध बनाए रखना चाहते हैं, वे हरेकृष्ण जप के दिव्य लाभ से वंचित रह जाते हैं । अतः भगवान् के प्रति सेवाभाव का उत्साह के साथ विकास करना चाहिए, क्योंकि उससे वह निरपराध जप कर सकेगा । इसलिए गुरुदेव के मार्गदर्शन में शिष्य को एक साथ भगवत्सेवा और हरे- कृष्ण जप करने की शिक्षा दी जाती है । हृदय में स्वरूपभूत रागानुगा

२. दक्षिण विभाग: विभाव, अनुभाव, सात्त्विक व व्यभिचारी भाव

६४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु सेवाभाव की उद्भावना होते ही वह महामन्त्र कृष्णनाम के दिव्य स्वरूप को जान जाता है । श्रीमथुरामण्डल में स्थिति ‘पद्मपुराण’ में मथुरामण्डल, द्वारका आदि में वास के सम्बन्ध में एक वाक्य है, “अन्य तीर्थों की यात्रा का मुक्ति ही महाफल है । परन्तु यह मुक्ति परम संसिद्धि नहीं है । मुक्त होने के बाद भगवद्भक्ति के परायण होना है । ब्रह्मभूत हो जाने पर ही भक्तियोग की प्राप्ति होती है । अतः प्रेममयी भगवद्भक्ति ही जीवन का परम लक्ष्य है और क्षणभर के लिए भी मथुरावास करने वाले के लिए यह अत्यन्त सुलभ हो जाती है ।” आगे कहा है, “ऐसा कौन बुद्धिमान है जो मथुरा का सेवन नहीं करेगा ? मथुरा सकामकर्मियों और परमब्रह्म से एक होने जाने के अभि- लाषी मुमुक्षुओं को सर्वाभीष्ट का दान करने वाली है । फिर भक्ति चाहने वाले भक्तों को भक्ति क्यों नहीं देगी, अर्थात् अवश्य देगी ।” वैदिक शास्त्रों में अन्यत्र कहा है—“अहो ! वैकुण्ठ से भी अतिशय महिमामयी यह मथुरा कितनी धन्या है । यहाँ एक दिन रहने से भी हृदय में कृष्णभक्ति उदित हो जाती है ।”

अध्याय १३ भक्ति के पाँच शक्तिशाली साधन श्रील रूप गोस्वामी का कथन है कि मथुरावास, मूर्ति-अर्चन, श्रीमद्भागवत का आस्वादन, भक्तसेवन तथा हरेकृष्ण महामन्त्र का कीर्तन से भक्ति के ये पाँच साधन इतने शक्तिशाली हैं कि इनमें से किसी एक से तनिक सा सम्बन्ध भी कनिष्ठ भक्त तक में भक्तिभाव को उद्भावित कर देता है । श्रीमूर्त्ति-अर्चन के सम्बन्ध में रूप गोस्वामी लिखते हैं—"हे सखे ! यदि तुम्हें प्राकृत-जगत् में अपने बन्धु-बान्धवों की कुछ भी इच्छा है तो केशीघाट के समीप मुस्कराते हुए त्रिभंगललित मुद्रा में खड़े, तिरछी और दूर तक फैली हुई दृष्टि वाले, अधर पर वेणुवादन करते हुए और मोरपिच्छ के साथ चन्द्रके से चमकते हुए गोविन्द नामक कृष्णरूप को मत देखना ।" इस श्लोक का तात्पर्य यह है कि यदि कोई घर में अर्चना करता हुआ श्रीमूर्त्ति के अनुरक्त हो गया तो तथाकथित घर, परिवार और समाज की सुध-बुध भूल कर उनकी भक्ति में ही डूब जायगा । प्रत्येक गृहस्थ का प्रधान कर्तव्य है कि घर में कृष्णमूर्ति स्थापित करके अपने सब बन्धु-बान्धवों के साथ उनकी आराधना करे । इससे सब क्लब, सिनेमा, नृत्य आदि में जाने और धूम्रपान, मद्यपान जैसे अनर्थों से बच जायेंगे । घर में मूर्ति-अर्चना पर बल देने से इन सब अनर्थों को दूर किया जा सकता है । रूप गोस्वामी आगे लिखते हैं—"हे मूर्ख सखे ! जान पड़ता है कि तुम श्रीमद्भागवत की पावन पद्यावली का कुछ-कुछ श्रवण कर चुके हो, जिसमें सकामधर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सब का निरादर है । अब क्रमशः भगवल्लीलामय दसवें स्कन्ध के श्लोक तुम्हारे कर्णविवरों में प्रविष्ट होकर हृदय में अमृत का संचार करेंगे ।" श्रीमद्भागवत के उपक्रम में ही कहा गया है कि जब तक कोई

६६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु सकामकर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को कूड़े-करकट की भांति फेंक नहीं देता, तब तक वह श्रीमद्भागवत को हृदयंगम नहीं कर सकता । भागवत केवल भगवद्भक्ति को विषय करती है। अतः त्यागवृत्ति से भागवत का स्वाध्याय करने वाला ही दसवें स्कन्ध में वर्णित भगवच्चरित को समझ सकता है। भाव यह है कि भागवत में अनुराग के बिना दसवें स्कन्ध के रासलीला आदि परम गोपनीय प्रसंगों को समझने का प्रयास न करे। श्रीमद्भागवत के यथार्थ रूप का आस्वादन शुद्धभक्ति में स्थित होने पर ही हो सकता है। श्रील रूप गोस्वामी के पूर्वोक्त दोनों श्लोकों में अलंकारों का प्रयोग है, जो परोक्ष रूप से सांसारिक संग, मित्रता और प्रेम की भर्त्सना करते हैं। लोग प्रायः समाज, मित्रता और प्रेम की ओर आकृष्ट रहते हैं और इन प्राकृत दोषों के विकास के लिए व्यापक आयोजन करते हैं। परन्तु श्रीराधाकृष्ण मूर्ति के दिव्य दर्शन से विषयसंग के ये सब उद्यम समाप्त हो जाते हैं। श्रीरूप गोस्वामी के श्लोक में विरोधाभास अलंकार है; लगता है मानो वे मित्रता, प्रेम आदि प्राकृत संगों की प्रशंसा और गोविन्द मूर्ति के दर्शन की निन्दा कर रहे हों। यह अलंकार इस प्रकार का होता है कि जो वस्तु प्रशंसित प्रतीत होती है, उसकी वास्तव में निन्दा हुई होती है और प्रशंसा के योग्य वस्तु निन्दित हुई लगती है । श्लोक का वास्तविक तात्पर्य यह है कि यदि कोई प्राकृत मित्रता, प्रेम और समाज रूपी अनर्थों को भुलाना चाहता हो तो गोविन्दरूप का दर्शन अवश्य करे । श्रील रूप गोस्वामी ने इसी भांति दिव्य कृष्णकथा का वर्णन किया है। एक भक्त के हृदय का उद्गार है, “बड़ा आश्चर्य है कि अपने आंसुओं से घुले हुए भगवान् के इस रूप को जबसे मैंने देखा है, मेरा तन पुलकावली से मण्डित हो गया है और अपने सांसारिक कर्तव्य को भूल बैठा हूँ। उन्हें देखकर अब मेरा मन चुपचाप घर में नहीं लगता है। न जाने क्यों सदा उनके पास जाने को उत्कण्ठित रहता हूँ।” इस वाक्य का तात्पर्य यह है कि सौभाग्य से शुद्धभक्त का संग होने पर कृष्णकथा सुनने और कृष्ण- विषयक जानने को, अर्थात् पूर्णतः कृष्णभावनाभावित बनने के लिए उत्कण्ठित हो जाना चाहिए । इसी प्रकार, महामन्त्र के श्रवण-कीर्तन के सम्बन्ध में एक वाक्य है—“कहा जाता है कि सन्तजनों को नारदजी के करों में बज रही वीणा की दिव्यध्वनि कर्णगोचर होती है। जब से इस शीतल नाद ने मेरे कानों में प्रवेश किया है, मैं निरन्तर श्रीभगवान् की संनिधि अनुभव कर रहा हूँ,

भक्तियोग के पाँच शक्तिशाली साधन [ ६७ और किसी अनिर्वचनीय अपूर्व दशा को धारण करता हुआ मेरा मन विषयवासना से एकदम शान्त-सा हो चला है।" पुनः मथुरामण्डल के माहात्म्य का प्रतिपादन करते हैं, "श्यामल यमुना तट पर त्रिभंगललित मुद्रा में खड़े श्यामसुन्दर की मुझे स्मृति हो रही है। जहाँ अपार शोभा छिटकाती हुई, खिले हुए कदम्ब के ऊपर बैठ कर गुंजारते हुए भौंरों से युक्त, निरवधि मधुरिमा से मण्डित यह वनश्री मेरे मन में न जाने किस अनिर्वचनीय भक्तिभाव को उदित कर रही है।" श्रील रूप गोस्वामी द्वारा वर्णित मथुरा-वृन्दावन की इस असमोर्ध्व माधुरी का अनुभव अभक्तों तक को हो सकता है। यमुना के किनारे चौरासी कोस के मथुरामण्डल के लीलास्थल इतने सुन्दर हैं कि एक बार जो वहाँ चला जायगा वह फिर कभी इस प्राकृत-जगत् में लौटना नहीं चाहेगा। श्रीरूप गोस्वामी के ये वाक्य मथुरा-वृन्दावन के यथार्थ स्वरूप की अनुभूति से ओतप्रोत हैं। इन सब चिद्गुणों से सिद्ध होता है कि मथुरा-वृन्दावन की स्थिति संसार से लोकोत्तर है। अन्यथा, इन स्थानों में जाने पर हृदय में दिव्य भावों की उद्भावना नहीं होती। मथुरा-वृन्दावन में चरण रखते ही तत्काल ये भाव निश्चित रूप से उद्दिष्ट हो उठते हैं। इन भक्तियोग विषयक वाक्यों को सुनकर कभी-कभी प्रतीत होता है कि फल बढ़ा-चढ़ा कर कहा गया है। परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है। यद्यपि यह सब के लिए सम्भव नहीं है, परन्तु शास्त्रों का प्रमाण है कि बहुत से भक्तों को ऐसे सत्संग का तत्काल फल हुआ है। उदाहरणार्थ, मन्दिर में सौरभ का आघ्राण करने मात्र से सनकादि चारों कुमार तत्काल भक्त बन गए। बिल्वमंगल ठाकुर कृष्णकथा को सुनते ही वेश्या को त्याग कर वृन्दावन को चल पड़े और परम वैष्णव बन गए। अतः ये वाक्य अतिश- योक्ति अथवा गल्प नहीं हैं। ये वास्तविक तथ्य हैं, परन्तु ये विशेष भक्तों के लिए ही प्रकट होते हैं, सब पर नहीं घटते। ये वर्णन चाहे बढ़े-चढ़े लगें, पर अपने ध्यान को नश्वर विषय-सौन्दर्य से हटाकर शाश्वत् कृष्ण- भावना माधुर्य में लगाने के लिए हमें इन वर्णनों को इसी रूप में अंगीकार करना चाहिए। जो पहले ही कृष्णभावनाभावित हैं, उसके लिए इनमें कुछ भी आश्चर्य की बात नहीं है। कतिपय विद्वानों का मत है कि केवल वर्णाश्रम-धर्म का पालन करने से भी शनैः-शनैः भक्तियोग के साधन की संसिद्धि हो सकती है। परन्तु महान् आचार्य इसे नहीं मानते। रामानन्द राय के साथ भक्ति के क्रमिक विकास से सम्बन्धित वार्ता में भगवान् चैतन्य महाप्रभु ने भी इस विचार का

६८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु निराकरण किया है। उन्होंने रामानन्द राय द्वारा प्रतिपादित वर्णाश्रमधर्म की महिमा को अस्वीकार कर दिया। वे कहते हैं कि वर्ण और आश्रम का यह आचरण केवल बाह्य है। इससे ऊँचा सिद्धान्त भी है। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने स्वयं अन्य सब साधनों को त्याग कर कृष्णभावना का पथ अंगीकार करने के लिए जीव का आह्वान किया है। जीवन की परम संसिद्धि का एकमात्र यही मार्ग है। श्रीमद्भागवत (११.२०.६) में भी भगवान् कहते हैं, "वर्ण और आश्रम के कर्तव्यों का पालन तभी तक करे, जब तक मेरी लीला कथा में राग और आसक्ति नहीं हो जाती।" भाव यह है कि वर्णाश्रमधर्मरूपी कर्मकाण्ड अर्थ, इन्द्रियतृप्ति और मोक्ष के लिए है। ये सब उनके लिए हैं, जो कृष्णभावनाभावित नहीं हुए हैं। वास्तव में शास्त्रों में इन सब क्रियाओं का विधान जीव को कृष्णभावना तक लाने के लिए ही है। जिसे श्रीकृष्ण के लिए रागानुगा आसक्ति हो गयी है, उसे शास्त्रविहित कर्तव्यों से प्रयोजन नहीं रहता।

अध्याय १४ भक्ति की योग्यता कुछ विद्वानों का कहना है कि ज्ञान-वैराग्य भक्ति के अंग हैं; परन्तु यह सत्य नहीं है। वास्तव में भक्ति में प्रवेश के लिए उपयोगी होने पर ज्ञान-वैराग्य को प्रारम्भ में स्वीकार किया जा सकता हैं; पर अन्त में वह अवस्था भी आती है जब उन्हें त्याग दिया जाता है। भक्ति की लालसा के अतिरिक्त भक्ति का और कोई हेतु नहीं है। इसके लिए केवल सरल हृदय चाहिए। दक्ष भक्तों के मत में मनोधर्म (ज्ञान) और योगाभ्यास के कृत्रिम वैराग्य का मार्ग भवबन्धन से मुक्ति के लिए उपयुक्त हो सकता है; परन्तु ये दोनों चित्त को उत्तरोत्तर कठोर बनाने वाले हैं। इनके द्वारा भक्तिभाव का बिल्कुल भी वर्धन नहीं हो सकता। अतः भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में प्रवेश पाने के लिए ये साधन अनुकूल नहीं हैं। वस्तुतः कृष्णभावना- भक्तियोग ही भक्तियोग में प्रगति का एकमात्र मार्ग है। भक्ति अद्वय है, वही कारण है और वही कार्य है। श्रीभगवान् सबके परम कारण हैं। उन अद्वय की प्राप्ति के लिए भक्ति का अद्वय मार्ग ही अंगीकार करना होगा । भगवद्गीता में स्वयं श्रीभगवान् इसकी पुष्टि करते हैं, "केवल भक्ति से ही मेरा तत्त्व जाना जा सकता है।" गीतोपदेश के प्रारम्भ में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, "तू मेरा भक्त है, इसलिए तेरे से यह सम्पूर्ण रहस्य कहूँगा।" वैदिकज्ञान का अन्तिम लाभ भगवान् के तत्त्व को जानना है और उनके वैकुण्ठ धाम में प्रवेश का पथ है भक्तियोग। सभी प्रामाणिक शास्त्र इसमें एकमत हैं। मनोधर्मी लोग भक्तिपथ का तिरस्कार करके दूसरों को दार्शनिक अन्वेषण में परास्त करने में ही लगे रहते हैं, इसलिए उनके हृदय में भक्तिभाव प्रकट नहीं होता। श्रीमद्भागवत (११.२०.३१) में श्रीकृष्ण कहते हैं, "हे उद्धव ! मेरे सच्चे भक्त के लिए ज्ञान-वैराग्य प्रायः श्रेयदायक नहीं होते। मेरा भक्त

१०० ] भक्तिरसामृतसिन्धु अपनी भक्ति के प्रभाव से सकामकमों, तप, त्याग, दान, योग, ज्ञान, वैराग्य आदि के लाभ को अपने-आप प्राप्त कर लेता है; परतत्त्व के पर्याप्त ज्ञान से युक्त हो जाता है।" यह भक्ति की कसौटी है। भक्त अन्धकार में नहीं रहता भगवान् स्वयं विशेष कृपा का परिवर्षण करते हुए उसे अन्तर से प्रबुद्ध करते हैं। श्रीमद्भागवत (११.२०.३२-३३) में श्रीकृष्ण उद्धव से आगे कहते हैं, "हे सखे ! मेरी सेवा में अनुरक्त मेरे भक्तों को तप, त्याग, दान, ज्ञान, वैराग्य आदि सम्पूर्ण सत्कर्मों का फल सुलभ हो जाता है। इस पर भी मेरी भक्ति के अतिरिक्त वे और कुछ नहीं चाहते। यदि कोई भक्त स्वर्ग में या मेरे वैकुण्ठधाम को जाना चाहे तो मेरी अहैतुकी कृपा उस से सारी कामनायें सहज ही पूरी हो सकती हैं।" कृष्णभावना के सेवन में लगे पुरुष में यदि कुछ विषयवासना शेष भी हो तो सद्गुरु के आदेशानुसार नियमित रूप से भक्ति का साधन करते रहने से वह इस प्रवृत्ति से शीघ्र मुक्त हो जाता है। श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि प्राकृत इन्द्रियतृप्ति में आसक्ति नहीं होनी चाहिए; परन्तु श्रीकृष्ण से सम्बन्धित प्रत्येक वस्तु का ग्रहण करे। जैसे भोजन आवश्यक है और यह स्वाभाविक ही है कि रसना स्वा- दिष्ट अन्न चाहती है। अतः जिह्वातृप्ति के स्थान पर श्रीकृष्ण की प्रीति के लिए कुछ स्वादु पदार्थ बनाए जा सकते हैं और श्रीकृष्ण को उन का अर्पण किया जा सकता है। तब यह वैराग्य हो जायगा। स्वादिष्ट पदार्थ बनायें, परन्तु श्रीकृष्ण को अर्पण किए बिना उन्हें खाना नहीं चाहिए। जो श्रीकृष्ण को अर्पित न हुए हों, उन पदार्थों को ग्रहण न करने का यह नियम वास्तव में वैराग्य है। साथ ही, इस वैराग्य के द्वारा इन्द्रियों के वेग को शान्त किया जा सकता है। निर्विशेषवादी, जो सब प्राकृत वस्तुओं से बचना चाहते हैं, चाहे कितना भी तप-त्याग क्यों न करें, पर भगवत्सेवा करने का अवसर कभी नहीं पाते। अतः उनका वैराग्य संसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहाँ भक्ति से सम्बन्धरहित कृत्रिम वैराग्य का अभ्यास करते हुए निर्विशेषवादी फिर भवबन्धन में गिर गए हैं। वर्तमान काल में भी बहुत से नामधारी त्यागी हैं, जो संन्यास लेकर 'ब्रह्म सत्यं' का दम्भ करते हैं। इस प्रकार वे प्राकृत-जगत् को त्यागने का ढोंग तो करते हैं, परन्तु भक्ति के स्तर तक न पहुँचने के कारण लक्ष्य को नहीं पा सकते और परिणामतः परोपकार; राजनीतिक संघर्ष जैसी प्राकृत क्रियाओं में

भक्ति की योग्यता [ १०१ ही लौट आते हैं। कितने ही तथाकथित संन्यासी हुए हैं जिन्होंने जगत् को असत्य कहकर त्यागा था पर फिर प्राकृत-जगत् में ही लौट आए, क्योंकि उन्हें अपने यथार्थ आश्रय भगवान् के चरणकमलों की अभिलाषा नहीं थी। ऐसी किसी भी वस्तु को त्यागना ठीक नहीं, जो भगवान् की सेवा में लग सकती हो। यह भक्तिमार्ग का गूढ़ रहस्य है। कृष्णभावना और भक्ति में प्रगति के अनुकूल कोई भी वस्तु स्वीकार कर लेनी चाहिए। उदाहरणार्थ, अपने इस कृष्णभावनामृत आन्दोलन को बढ़ाने के लिए हम वायुयान आदि नाना यन्त्रों और अनेक उपकरणों का उपयोग कर रहे हैं। कभी-कभी लोग पूछते हैं— “जब आप प्राकृत सभ्यता की निन्दा करते हैं तो फिर प्राकृत पदार्थों का उपयोग क्यों कर रहे हैं? पर वास्तव में हम निन्दा नहीं करते। हम तो केवल इतना कहते हैं कि लोग जो कुछ काम करें वह कृष्णभावनाभावित होकर करें। इसी सिद्धान्त के आधार पर भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को भक्ति के लिए अपने शौर्य का सदुपयोग करने का परामर्श दिया है। हम भी इन यन्त्रों को कृष्णसेवा में लगा रहे हैं। श्रीकृष्ण के लिए इस भाव के साथ, अर्थात् कृष्णभावना- भावित होकर हम कुछ भी ग्रहण कर सकते हैं। यदि टाईप आदि किसी यन्त्र का सदुपयोग कृष्णभावनामृत आन्दोलन को बढ़ाने में किया जा सकता हो तो हमें ऐसा अवश्य करना चाहिए। हमारी दृष्टि में श्रीकृष्ण सर्वरूप हैं। श्रीकृष्ण ही वस्तुमात्र के निमित्त और उपादान हैं, हमारा अपना कुछ भी नहीं है। अतः श्रीकृष्ण की वस्तुएँ श्रीकृष्ण की सेवा में ही लगें, ऐसी हमारी दृष्टि है। इसका यह अर्थ नहीं कि हम भक्ति के साधन को छोड़ बैठें अथवा तत्सम्बन्धी विधि-विधान का तिरस्कार करें। भक्ति की कनिष्ठ (प्रारम्भिक) दशा में गुरुप्रमाण द्वारा नियमित सब सिद्धान्तों का अनुसरण करना चाहिए। कौन सी वस्तु त्यागी जाय और कौन सी अपनायी जाय, यह भक्ति के सिद्धान्तों के अनुसार होना चाहिए; ऐसा नहीं कि स्वतन्त्र रूप से निर्णय करे कि क्या त्यागना है और क्या अपनाना है। अतः भक्त का मार्गदर्शन करने के लिए भगवान् श्रीकृष्ण के प्रतिनिधि और बाह्य प्रकाश के रूप में सद्गुरु का आश्रय आवश्यक है। गुरु को चाहिए कि धनसंचय और बहुशिष्यों के प्रवाह में बह न जाय। सद्गुरु ऐसा कभी नहीं करता। परन्तु कभी-कभी यदि गुरु भली- भाँति अधिकृत नहीं हो, स्वेच्छा से गुरु बना हो तो वह धनराशि और

१०२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु शिष्यों की बड़ी संख्या को लेकर गिर सकता है । उसकी भक्ति अधिक उत्तम नहीं समझी जाती । यदि कोई ऐसी सफलताओं से विचलित हो जाय तो उसकी भक्ति शिथिल हो जायगी । अतः परम्परा के सिद्धान्तों का दृढ़ता के साथ पालन करना चाहिए । कृष्णभावनाभावित पुरुष स्वभावतः शुद्ध है, इसलिए उसे मन-वाणी की शुद्धि के किसी अन्य साधन की आवश्यकता नहीं । कृष्णभावना की दिव्य भावभूमि में आरूढ़ हो जाने के कारण उसमें सभी दैवी गुण आ जाते हैं; वह योगपद्धति की विधि का स्वतः पालन करता है । भक्तों द्वारा इन सब नियमों का अनुसरण अनायास हो जाता है । एक प्रत्यक्ष उदाहरण अहिंसा है, जो एक दिव्य गुण माना जाता है । भक्त स्वभाव से अहिंसाप्रिय होता है, उसे अलग से अहिंसा का अभ्यास नही करना पड़ता । कुछ लोग शुद्धि के लिए शाकाहारी संघों में सम्मिलित होते हैं; पर भक्त तो स्वभाव से ही शाकाहारी बन जाता है । उसे इसका पृथक् अभ्यास अथवा किसी शाकाहारी संघ का सदस्य नहीं बनना पड़ता । वह स्वाभाविक रूप में शाकाहारी है । अनेक अन्य प्रकार से सिद्ध है कि कृष्णभावना के अतिरिक्त भक्त को किसी भी अन्य साधन की अपेक्षा नहीं रहती । सब दैवी गुणों का उसमें स्वतः विकास हो जाता है । जो अभ्यास के रूप में शाकाहारी अथवा अहिंसा का आचरण करते हैं उनमें लौकिक दृष्टि से कुछ सद्गुण हो सकता है; परन्तु भक्त बनने के लिए इतना ही पर्याप्त नहीं है । यह आवश्यक नहीं कि शाकाहारी अथवा अहिंसाप्रिय व्यक्ति भक्त भी हो । परन्तु भक्त स्वाभाविक रूप से शाकाहारी भी होता है और अहिंसाप्रिय भी । अस्तु, शाकाहार और अहिंसा के अंग (कारण) नहीं हैं । इस सन्दर्भ में स्कन्दपुराण में एक व्याध की कथा है जो नारद मुनि के उपदेश से महाभागवत बन गया । भक्त हो जाने पर वही व्याध किसी चींटि को भी नहीं मारता था । नारदजी के सखा पर्वत मुनि भक्ति से व्याध में इस आश्चर्यमय परिवर्तन को आया देखकर कहने लगे, “हे व्याध ! तेरे लिए चींटी तक की हिंसा न करना आश्चर्य का विषय नहीं है क्योंकि जो भगवद्भक्ति में लीन हैं, उनमें सब दैवी सद्गुणों का वास रहता है; भक्त कभी किसी को कष्ट नहीं देता ।” श्रील रूप गोस्वामी पुष्टि करते हैं कि अन्तःकरण और क्रियाओं की पवित्रता, शम, दम, आदि सब सद्गुण भक्तिपरायण पुरुष में स्वतः प्रकट हो जाते हैं ।

भक्ति की योग्यता [ १०३ श्रील रूप गोस्वामी का आगे उल्लेख है कि भक्ति के नौ अंग हैं— श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्म- निवेदन। ये साधन इतने शक्तिसम्पन्न हैं कि इनमें से एक भी साधन का आचरण करने से निश्चित रूप से अभीष्ट-सिद्धि होती है। जो भगवत्कथा के श्रवण में अनुरक्त है और जो नामकीर्तन करता है, वे दोनों ही भक्ति के अभीष्ट लक्ष्य को पाते हैं। चैतन्यचरितामृत में इसका विशद प्रतिपादन है। कोई एक साधन करे, दो, तीन अथवा सब-के-सब साधन अंगीकार करे, अन्त में वह स्पृहणीय भक्तियोग में निष्ठ हो जायगा। भक्ति के उपरोक्त साधनों में से एक भी साधन करने से संसिद्धि को प्राप्त हुए भक्तों के बहुत से उदाहरण हैं। श्रीमद्भागवत के श्रवण- मात्र से महाराज परीक्षित को, श्रीमद्भागवत के कीर्तन से शुकदेव गोस्वामी को, निरन्तर भगवत्स्मरण करने से प्रह्लाद जी को, भगवान् के चरणकमलों के सेवन से लक्ष्मी जी को, मन्दिर में अर्चन करने से राजा पृथु को, वन्दन से अक्रूर को, भगवान् राम के दास्य से हनुमान् को, श्रीकृष्ण के सख्य से अर्जुन को और श्रीकृष्ण के चरणों में सर्वस्व अर्पण करने से बलि महा- राज को जीवन के परम फल की प्राप्ति हुई। ऐसे भी भक्त हुए हैं जिन्होंने भक्ति के सब साधनों का आचरण किया। श्रीमद्भागवत (६.४.१८-२०) में अम्बरीष महाराज की सर्वांग भक्ति का वर्णन है। शुकदेव जी कहते हैं, "राजा अम्बरीष ने सब से पहले अपने मन को श्रीकृष्ण के पादपद्मों में एकाग्र किया; फिर वाणी को श्रीकृष्ण के गुणों और लीला के वर्णन में, हाथों को मन्दिर का मार्जन करने में तथा कानों को भगवत्कथा के श्रवण में लगाया; मन्दिर में सुन्दर श्रीमूर्ति के दर्शन में नेत्रों को और शुद्धभक्तों का संग करने में शरीर को नियोजित किया (जब किसी का संग किया जाता है तो उसके साथ उठना-बैठना और खाना पड़ता है। इस प्रकार उसके साथ अपने शरीर का स्पर्श अपरिहार्य सा होता है। अम्बरीष महाराज केवल शुद्धभक्तों का संग करते थे, किसी अन्य को अपने शरीर का स्पर्श नहीं होने देते)। उन्होंने अपनी घ्राणेन्द्रिय को श्रीकृष्ण के चरणारविन्द में समर्पित पुष्प और तुलसी को सूंघने में और जिह्वा को कृष्णप्रसाद का आस्वादन करने में; सिर को वन्दन में और चरणों को हरितीर्थों की यात्रा में लगा रखा था। वे राजा थे, धन का अभाव न था, अतः श्रीकृष्ण को अतिशय उत्तम भोग निवेदित करते और फिर उनका प्रसाद ग्रहण करते थे। उनका एक सुन्दर-सा मन्दिर था, जिसमें भगवान् का बहुमूल्य वस्त्र, अलंकार आदि से मनोहारी शृंगार किया जाता और

१०४] भक्तिरसामृतसिन्धु नाना व्यंजनों का भोग लगता। इस प्रकार वे निरन्तर पूर्णरूपेण कृष्ण- भावना के परायण थे।'' इस सम्पूर्ण विवरण का भाव यह है कि हमें महा- भागवतों के चरणचिह्नों का अनुसरण करना चाहिए। यदि कोई भक्ति के सब साधनों को न कर सके तो कम से कम एक तो अवश्य ही करे, जैसे पूर्वाचार्यों के उदाहरण से प्रत्यक्ष है। यदि अम्बरीष महाराज के समान भक्ति के सब साधन किए जायें तो फिर इन सभी के द्वारा भक्तियोग की सिद्धि निश्चित है। पूर्ण रूप से भक्ति के परायण होते ही विषयों से निवृत्ति हो जाती है और मुक्ति भक्त की अनुचरी बन जाती है। बिल्व- मंगल ठाकुर इसके प्रमाण हैं। भगवान् में अनन्य भक्ति होने पर मुक्ति सेविका के समान भक्त के पीछे-पीछे चला करती है। श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि वैधीभक्ति को आचार्यगण ऐश्वर्य (मर्यादा) का मार्ग भी कहते हैं।

अध्याय १५ रागानुगाभक्ति रागानुगाभक्ति के उदाहरण वृन्दावन में श्रीकृष्ण के पार्षदों में सहज से दर्शनीय हैं। श्रीकृष्ण के साथ ब्रजवासियों के रागात्मक (रागमय) स्वाभाविक व्यवहार को रागानुगा कहते हैं। उन्हें भक्ति सीखनी नहीं पड़ती, वे पहले ही विधि-विधान में पूर्ण हैं और रागमय भगवत्सेवा को प्राप्त कर चुके हैं। उदाहरणार्थ, श्रीकृष्ण के साथ क्रीड़ामग्न गोपबालकों को यह तप, त्याग अथवा योगाभ्यास के द्वारा नहीं सीखना पड़ता । पूर्वजन्मों में वे सब विधि-विधानों का पालन कर चुके हैं, इसलिए अब उन्हें साक्षात् श्रीकृष्ण का परम प्रिय सखारूप पार्षदपद प्राप्त हुआ है। इस स्वाभाविक आकर्षण का नाम ही रागानुगाभक्ति है। श्रील रूप गोस्वामी के अनुसार इष्ट के चिन्तन में तन्मयता और राग की परम आविष्टता के साथ उसके प्रति जो स्वाभाविक आकर्षण होता है, उसे रागानुगाभक्ति कहते हैं। रागानुगाभक्ति-१. कामरूपा और २. सम्बन्धरूपा—दो प्रकार की होती है। इस सन्दर्भ में नारदजी युधिष्ठिर से श्रीमद्भागवत (७.१.३०) में कहते हैं, “हे राजन् ! बहुत से भक्त पहले-पहल काम से, द्वेष से, भय से अथवा स्नेहवश भी भगवान् की ओर आकृष्ट हुआ करते हैं। परन्तु अन्त में उनका यह आकर्षण सम्पूर्ण पापों से शुद्ध हो जाता है और शनैः-शनैः भगवत्प्रेम को प्राप्त होकर आराधक जीवन के उस परमलक्ष्य को पा जाता है, जो शुद्धभक्तों द्वारा अभिलाषित है । गोपीजन काममय राग और आकर्षण की प्रत्यक्ष मूर्ति हैं। गोपियाँ युवती हैं और श्रीकृष्ण नवकिशोर हैं। बाह्य दृष्टि से लगता है कि श्रीकृष्ण के प्रति गोपियों का आकर्षण काम पर आधारित है। इसी प्रकार कंस भय से कृष्ण के प्रति आकृष्ट रहता था। श्रीकृष्ण के हाथों अपने मरण की भविष्यवाणी के कारण उसे सदा श्रीकृष्ण का भय बना रहता था।

१०६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु शिशुपाल सदा श्रीकृष्ण के लिए द्वेषभाव से भरा रहा। तथा राजा यदु के वंशज कुलसम्बन्ध के कारण उन्हें अपना बान्धव समझते रहे। इन नाना प्रकार के भक्तों में नाना रूपों में श्रीकृष्ण के लिए सहज राग रहता है और उन्हें जीवन का वही अभिलाषित लक्ष्य प्राप्त होता है। श्रीकृष्ण में गोपियों का काम और यदुवंशियों का स्नेह दोनों रागा- नुगा हैं। श्रीकृष्ण से कंस के भय और शिशुपाल के द्वेष को भक्ति में नहीं गिना जाता, क्योंकि उनका भाव अनुकूल नहीं है। भक्ति अनुकूलभाव से ही होती है। अतः श्रील रूप गोस्वामी के अनुसार भय आदि प्रतिकूल आकर्षण भक्ति के अंतर्गत नहीं आते। फिर वे यादवों के स्नेह की मीमांसा करते हैं। यदि वह सख्य के स्तर पर है तो रागानुगा है और यदि विधि के स्तर पर है तो रागानुगा भक्ति के अन्तर्गत नहीं आयेगा। रागानुगा- भक्ति के स्तर पर ही सख्य को शुद्ध भक्ति की श्रेणी में गिना जाता है। यह समझने में कुछ कठिनाई हो सकती है कि गोपियों और कंस दोनों को एक ही लक्ष्य की प्राप्ति हुई, क्योंकि कंस, शिशुपाल आदि का भाव गोपीजनों से भिन्न था। अतः इस बात का भलीभाँति विवेचना करना आवश्यक है। यद्यपि उपरोक्त सब उदाहरणों में केन्द्र श्रीकृष्ण ही हैं और अनुकूल-प्रतिकूल सब को वैकुण्ठ-जगत् की प्राप्ति होती है, फिर भी दोनों प्रकार के जीवों में भेद रहता है। श्रीमद्भागवत, प्रथम स्कन्ध में उल्लेख है कि परतत्त्व एक (अद्वय) है; वही ब्रह्म, परमात्मा और भगवान् इन तीन प्रकारों से प्रकट है। यहाँ अप्राकृत भेद है। यद्यपि ब्रह्म, परमात्मा और भगवान् एक ही परतत्त्व हैं, पर कंस, शिशुपाल जैसे भक्तों को ब्रह्म- ज्योति की ही प्राप्ति हुई, वे परमात्मा अथवा भगवान् को प्राप्त नहीं कर सके। यही भेद है। इस सन्दर्भ में सूर्यमण्डल और सूर्यज्योति की उपमा दी जा सकती है। सूर्यज्योति में रहने का यह अर्थ नहीं कि सूर्यमण्डल में भी प्रवेश हो गया है। सूर्यमण्डल का तो ताप भी सूर्यज्योति के बराबर नहीं होता। यदि किसी ने अन्तरिक्षयान से सूर्यज्योति में विचरण किया है तो इसका यह अर्थ नहीं कि वह सूर्यमण्डल में भी हो आया है। सूर्यज्योति और सूर्य- मण्डल एकतत्त्व होने पर भी भिन्न हैं- एक शक्ति है तो दूसरा शक्तिमान् है। इसी प्रकार परतत्त्व श्रीकृष्ण और उनकी अंगकांति ब्रह्मज्योति में भी भेद-अभेद है। कंस और शिशुपाल को ब्रह्मप्राप्ति हुई, पर गोलोक वृन्दा- वन धाम में उनका प्रवेश नहीं हो सका। निर्विशेषवादियों और भगवान् के द्वेषियों का भगवान् में एक प्रकार का आकर्षण होता है; इस कारण