भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १५ रागानुगाभक्ति रागानुगाभक्ति के उदाहरण वृन्दावन में श्रीकृष्ण के पार्षदों में सहज से दर्शनीय हैं। श्रीकृष्ण के साथ ब्रजवासियों के रागात्मक (रागमय) स्वाभाविक व्यवहार को रागानुगा कहते हैं। उन्हें भक्ति सीखनी नहीं पड़ती, वे पहले ही विधि-विधान में पूर्ण हैं और रागमय भगवत्सेवा को प्राप्त कर चुके हैं। उदाहरणार्थ, श्रीकृष्ण के साथ क्रीड़ामग्न गोपबालकों को यह तप, त्याग अथवा योगाभ्यास के द्वारा नहीं सीखना पड़ता । पूर्वजन्मों में वे सब विधि-विधानों का पालन कर चुके हैं, इसलिए अब उन्हें साक्षात् श्रीकृष्ण का परम प्रिय सखारूप पार्षदपद प्राप्त हुआ है। इस स्वाभाविक आकर्षण का नाम ही रागानुगाभक्ति है। श्रील रूप गोस्वामी के अनुसार इष्ट के चिन्तन में तन्मयता और राग की परम आविष्टता के साथ उसके प्रति जो स्वाभाविक आकर्षण होता है, उसे रागानुगाभक्ति कहते हैं। रागानुगाभक्ति-१. कामरूपा और २. सम्बन्धरूपा—दो प्रकार की होती है। इस सन्दर्भ में नारदजी युधिष्ठिर से श्रीमद्भागवत (७.१.३०) में कहते हैं, “हे राजन् ! बहुत से भक्त पहले-पहल काम से, द्वेष से, भय से अथवा स्नेहवश भी भगवान् की ओर आकृष्ट हुआ करते हैं। परन्तु अन्त में उनका यह आकर्षण सम्पूर्ण पापों से शुद्ध हो जाता है और शनैः-शनैः भगवत्प्रेम को प्राप्त होकर आराधक जीवन के उस परमलक्ष्य को पा जाता है, जो शुद्धभक्तों द्वारा अभिलाषित है । गोपीजन काममय राग और आकर्षण की प्रत्यक्ष मूर्ति हैं। गोपियाँ युवती हैं और श्रीकृष्ण नवकिशोर हैं। बाह्य दृष्टि से लगता है कि श्रीकृष्ण के प्रति गोपियों का आकर्षण काम पर आधारित है। इसी प्रकार कंस भय से कृष्ण के प्रति आकृष्ट रहता था। श्रीकृष्ण के हाथों अपने मरण की भविष्यवाणी के कारण उसे सदा श्रीकृष्ण का भय बना रहता था।