भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु सकामकर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को कूड़े-करकट की भांति फेंक नहीं देता, तब तक वह श्रीमद्भागवत को हृदयंगम नहीं कर सकता । भागवत केवल भगवद्भक्ति को विषय करती है। अतः त्यागवृत्ति से भागवत का स्वाध्याय करने वाला ही दसवें स्कन्ध में वर्णित भगवच्चरित को समझ सकता है। भाव यह है कि भागवत में अनुराग के बिना दसवें स्कन्ध के रासलीला आदि परम गोपनीय प्रसंगों को समझने का प्रयास न करे। श्रीमद्भागवत के यथार्थ रूप का आस्वादन शुद्धभक्ति में स्थित होने पर ही हो सकता है। श्रील रूप गोस्वामी के पूर्वोक्त दोनों श्लोकों में अलंकारों का प्रयोग है, जो परोक्ष रूप से सांसारिक संग, मित्रता और प्रेम की भर्त्सना करते हैं। लोग प्रायः समाज, मित्रता और प्रेम की ओर आकृष्ट रहते हैं और इन प्राकृत दोषों के विकास के लिए व्यापक आयोजन करते हैं। परन्तु श्रीराधाकृष्ण मूर्ति के दिव्य दर्शन से विषयसंग के ये सब उद्यम समाप्त हो जाते हैं। श्रीरूप गोस्वामी के श्लोक में विरोधाभास अलंकार है; लगता है मानो वे मित्रता, प्रेम आदि प्राकृत संगों की प्रशंसा और गोविन्द मूर्ति के दर्शन की निन्दा कर रहे हों। यह अलंकार इस प्रकार का होता है कि जो वस्तु प्रशंसित प्रतीत होती है, उसकी वास्तव में निन्दा हुई होती है और प्रशंसा के योग्य वस्तु निन्दित हुई लगती है । श्लोक का वास्तविक तात्पर्य यह है कि यदि कोई प्राकृत मित्रता, प्रेम और समाज रूपी अनर्थों को भुलाना चाहता हो तो गोविन्दरूप का दर्शन अवश्य करे । श्रील रूप गोस्वामी ने इसी भांति दिव्य कृष्णकथा का वर्णन किया है। एक भक्त के हृदय का उद्गार है, “बड़ा आश्चर्य है कि अपने आंसुओं से घुले हुए भगवान् के इस रूप को जबसे मैंने देखा है, मेरा तन पुलकावली से मण्डित हो गया है और अपने सांसारिक कर्तव्य को भूल बैठा हूँ। उन्हें देखकर अब मेरा मन चुपचाप घर में नहीं लगता है। न जाने क्यों सदा उनके पास जाने को उत्कण्ठित रहता हूँ।” इस वाक्य का तात्पर्य यह है कि सौभाग्य से शुद्धभक्त का संग होने पर कृष्णकथा सुनने और कृष्ण- विषयक जानने को, अर्थात् पूर्णतः कृष्णभावनाभावित बनने के लिए उत्कण्ठित हो जाना चाहिए । इसी प्रकार, महामन्त्र के श्रवण-कीर्तन के सम्बन्ध में एक वाक्य है—“कहा जाता है कि सन्तजनों को नारदजी के करों में बज रही वीणा की दिव्यध्वनि कर्णगोचर होती है। जब से इस शीतल नाद ने मेरे कानों में प्रवेश किया है, मैं निरन्तर श्रीभगवान् की संनिधि अनुभव कर रहा हूँ,