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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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भक्तियोग के पाँच शक्तिशाली साधन [ ६७ और किसी अनिर्वचनीय अपूर्व दशा को धारण करता हुआ मेरा मन विषयवासना से एकदम शान्त-सा हो चला है।" पुनः मथुरामण्डल के माहात्म्य का प्रतिपादन करते हैं, "श्यामल यमुना तट पर त्रिभंगललित मुद्रा में खड़े श्यामसुन्दर की मुझे स्मृति हो रही है। जहाँ अपार शोभा छिटकाती हुई, खिले हुए कदम्ब के ऊपर बैठ कर गुंजारते हुए भौंरों से युक्त, निरवधि मधुरिमा से मण्डित यह वनश्री मेरे मन में न जाने किस अनिर्वचनीय भक्तिभाव को उदित कर रही है।" श्रील रूप गोस्वामी द्वारा वर्णित मथुरा-वृन्दावन की इस असमोर्ध्व माधुरी का अनुभव अभक्तों तक को हो सकता है। यमुना के किनारे चौरासी कोस के मथुरामण्डल के लीलास्थल इतने सुन्दर हैं कि एक बार जो वहाँ चला जायगा वह फिर कभी इस प्राकृत-जगत् में लौटना नहीं चाहेगा। श्रीरूप गोस्वामी के ये वाक्य मथुरा-वृन्दावन के यथार्थ स्वरूप की अनुभूति से ओतप्रोत हैं। इन सब चिद्गुणों से सिद्ध होता है कि मथुरा-वृन्दावन की स्थिति संसार से लोकोत्तर है। अन्यथा, इन स्थानों में जाने पर हृदय में दिव्य भावों की उद्भावना नहीं होती। मथुरा-वृन्दावन में चरण रखते ही तत्काल ये भाव निश्चित रूप से उद्दिष्ट हो उठते हैं। इन भक्तियोग विषयक वाक्यों को सुनकर कभी-कभी प्रतीत होता है कि फल बढ़ा-चढ़ा कर कहा गया है। परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है। यद्यपि यह सब के लिए सम्भव नहीं है, परन्तु शास्त्रों का प्रमाण है कि बहुत से भक्तों को ऐसे सत्संग का तत्काल फल हुआ है। उदाहरणार्थ, मन्दिर में सौरभ का आघ्राण करने मात्र से सनकादि चारों कुमार तत्काल भक्त बन गए। बिल्वमंगल ठाकुर कृष्णकथा को सुनते ही वेश्या को त्याग कर वृन्दावन को चल पड़े और परम वैष्णव बन गए। अतः ये वाक्य अतिश- योक्ति अथवा गल्प नहीं हैं। ये वास्तविक तथ्य हैं, परन्तु ये विशेष भक्तों के लिए ही प्रकट होते हैं, सब पर नहीं घटते। ये वर्णन चाहे बढ़े-चढ़े लगें, पर अपने ध्यान को नश्वर विषय-सौन्दर्य से हटाकर शाश्वत् कृष्ण- भावना माधुर्य में लगाने के लिए हमें इन वर्णनों को इसी रूप में अंगीकार करना चाहिए। जो पहले ही कृष्णभावनाभावित हैं, उसके लिए इनमें कुछ भी आश्चर्य की बात नहीं है। कतिपय विद्वानों का मत है कि केवल वर्णाश्रम-धर्म का पालन करने से भी शनैः-शनैः भक्तियोग के साधन की संसिद्धि हो सकती है। परन्तु महान् आचार्य इसे नहीं मानते। रामानन्द राय के साथ भक्ति के क्रमिक विकास से सम्बन्धित वार्ता में भगवान् चैतन्य महाप्रभु ने भी इस विचार का