भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्ति की योग्यता [ १०३ श्रील रूप गोस्वामी का आगे उल्लेख है कि भक्ति के नौ अंग हैं— श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्म- निवेदन। ये साधन इतने शक्तिसम्पन्न हैं कि इनमें से एक भी साधन का आचरण करने से निश्चित रूप से अभीष्ट-सिद्धि होती है। जो भगवत्कथा के श्रवण में अनुरक्त है और जो नामकीर्तन करता है, वे दोनों ही भक्ति के अभीष्ट लक्ष्य को पाते हैं। चैतन्यचरितामृत में इसका विशद प्रतिपादन है। कोई एक साधन करे, दो, तीन अथवा सब-के-सब साधन अंगीकार करे, अन्त में वह स्पृहणीय भक्तियोग में निष्ठ हो जायगा। भक्ति के उपरोक्त साधनों में से एक भी साधन करने से संसिद्धि को प्राप्त हुए भक्तों के बहुत से उदाहरण हैं। श्रीमद्भागवत के श्रवण- मात्र से महाराज परीक्षित को, श्रीमद्भागवत के कीर्तन से शुकदेव गोस्वामी को, निरन्तर भगवत्स्मरण करने से प्रह्लाद जी को, भगवान् के चरणकमलों के सेवन से लक्ष्मी जी को, मन्दिर में अर्चन करने से राजा पृथु को, वन्दन से अक्रूर को, भगवान् राम के दास्य से हनुमान् को, श्रीकृष्ण के सख्य से अर्जुन को और श्रीकृष्ण के चरणों में सर्वस्व अर्पण करने से बलि महा- राज को जीवन के परम फल की प्राप्ति हुई। ऐसे भी भक्त हुए हैं जिन्होंने भक्ति के सब साधनों का आचरण किया। श्रीमद्भागवत (६.४.१८-२०) में अम्बरीष महाराज की सर्वांग भक्ति का वर्णन है। शुकदेव जी कहते हैं, "राजा अम्बरीष ने सब से पहले अपने मन को श्रीकृष्ण के पादपद्मों में एकाग्र किया; फिर वाणी को श्रीकृष्ण के गुणों और लीला के वर्णन में, हाथों को मन्दिर का मार्जन करने में तथा कानों को भगवत्कथा के श्रवण में लगाया; मन्दिर में सुन्दर श्रीमूर्ति के दर्शन में नेत्रों को और शुद्धभक्तों का संग करने में शरीर को नियोजित किया (जब किसी का संग किया जाता है तो उसके साथ उठना-बैठना और खाना पड़ता है। इस प्रकार उसके साथ अपने शरीर का स्पर्श अपरिहार्य सा होता है। अम्बरीष महाराज केवल शुद्धभक्तों का संग करते थे, किसी अन्य को अपने शरीर का स्पर्श नहीं होने देते)। उन्होंने अपनी घ्राणेन्द्रिय को श्रीकृष्ण के चरणारविन्द में समर्पित पुष्प और तुलसी को सूंघने में और जिह्वा को कृष्णप्रसाद का आस्वादन करने में; सिर को वन्दन में और चरणों को हरितीर्थों की यात्रा में लगा रखा था। वे राजा थे, धन का अभाव न था, अतः श्रीकृष्ण को अतिशय उत्तम भोग निवेदित करते और फिर उनका प्रसाद ग्रहण करते थे। उनका एक सुन्दर-सा मन्दिर था, जिसमें भगवान् का बहुमूल्य वस्त्र, अलंकार आदि से मनोहारी शृंगार किया जाता और