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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 129, कुल 380 में से

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पृष्ठ 129

१०२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु शिष्यों की बड़ी संख्या को लेकर गिर सकता है । उसकी भक्ति अधिक उत्तम नहीं समझी जाती । यदि कोई ऐसी सफलताओं से विचलित हो जाय तो उसकी भक्ति शिथिल हो जायगी । अतः परम्परा के सिद्धान्तों का दृढ़ता के साथ पालन करना चाहिए । कृष्णभावनाभावित पुरुष स्वभावतः शुद्ध है, इसलिए उसे मन-वाणी की शुद्धि के किसी अन्य साधन की आवश्यकता नहीं । कृष्णभावना की दिव्य भावभूमि में आरूढ़ हो जाने के कारण उसमें सभी दैवी गुण आ जाते हैं; वह योगपद्धति की विधि का स्वतः पालन करता है । भक्तों द्वारा इन सब नियमों का अनुसरण अनायास हो जाता है । एक प्रत्यक्ष उदाहरण अहिंसा है, जो एक दिव्य गुण माना जाता है । भक्त स्वभाव से अहिंसाप्रिय होता है, उसे अलग से अहिंसा का अभ्यास नही करना पड़ता । कुछ लोग शुद्धि के लिए शाकाहारी संघों में सम्मिलित होते हैं; पर भक्त तो स्वभाव से ही शाकाहारी बन जाता है । उसे इसका पृथक् अभ्यास अथवा किसी शाकाहारी संघ का सदस्य नहीं बनना पड़ता । वह स्वाभाविक रूप में शाकाहारी है । अनेक अन्य प्रकार से सिद्ध है कि कृष्णभावना के अतिरिक्त भक्त को किसी भी अन्य साधन की अपेक्षा नहीं रहती । सब दैवी गुणों का उसमें स्वतः विकास हो जाता है । जो अभ्यास के रूप में शाकाहारी अथवा अहिंसा का आचरण करते हैं उनमें लौकिक दृष्टि से कुछ सद्गुण हो सकता है; परन्तु भक्त बनने के लिए इतना ही पर्याप्त नहीं है । यह आवश्यक नहीं कि शाकाहारी अथवा अहिंसाप्रिय व्यक्ति भक्त भी हो । परन्तु भक्त स्वाभाविक रूप से शाकाहारी भी होता है और अहिंसाप्रिय भी । अस्तु, शाकाहार और अहिंसा के अंग (कारण) नहीं हैं । इस सन्दर्भ में स्कन्दपुराण में एक व्याध की कथा है जो नारद मुनि के उपदेश से महाभागवत बन गया । भक्त हो जाने पर वही व्याध किसी चींटि को भी नहीं मारता था । नारदजी के सखा पर्वत मुनि भक्ति से व्याध में इस आश्चर्यमय परिवर्तन को आया देखकर कहने लगे, “हे व्याध ! तेरे लिए चींटी तक की हिंसा न करना आश्चर्य का विषय नहीं है क्योंकि जो भगवद्भक्ति में लीन हैं, उनमें सब दैवी सद्गुणों का वास रहता है; भक्त कभी किसी को कष्ट नहीं देता ।” श्रील रूप गोस्वामी पुष्टि करते हैं कि अन्तःकरण और क्रियाओं की पवित्रता, शम, दम, आदि सब सद्गुण भक्तिपरायण पुरुष में स्वतः प्रकट हो जाते हैं ।

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