भारतकोश
भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 380 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 128

भक्ति की योग्यता [ १०१ ही लौट आते हैं। कितने ही तथाकथित संन्यासी हुए हैं जिन्होंने जगत् को असत्य कहकर त्यागा था पर फिर प्राकृत-जगत् में ही लौट आए, क्योंकि उन्हें अपने यथार्थ आश्रय भगवान् के चरणकमलों की अभिलाषा नहीं थी। ऐसी किसी भी वस्तु को त्यागना ठीक नहीं, जो भगवान् की सेवा में लग सकती हो। यह भक्तिमार्ग का गूढ़ रहस्य है। कृष्णभावना और भक्ति में प्रगति के अनुकूल कोई भी वस्तु स्वीकार कर लेनी चाहिए। उदाहरणार्थ, अपने इस कृष्णभावनामृत आन्दोलन को बढ़ाने के लिए हम वायुयान आदि नाना यन्त्रों और अनेक उपकरणों का उपयोग कर रहे हैं। कभी-कभी लोग पूछते हैं— “जब आप प्राकृत सभ्यता की निन्दा करते हैं तो फिर प्राकृत पदार्थों का उपयोग क्यों कर रहे हैं? पर वास्तव में हम निन्दा नहीं करते। हम तो केवल इतना कहते हैं कि लोग जो कुछ काम करें वह कृष्णभावनाभावित होकर करें। इसी सिद्धान्त के आधार पर भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को भक्ति के लिए अपने शौर्य का सदुपयोग करने का परामर्श दिया है। हम भी इन यन्त्रों को कृष्णसेवा में लगा रहे हैं। श्रीकृष्ण के लिए इस भाव के साथ, अर्थात् कृष्णभावना- भावित होकर हम कुछ भी ग्रहण कर सकते हैं। यदि टाईप आदि किसी यन्त्र का सदुपयोग कृष्णभावनामृत आन्दोलन को बढ़ाने में किया जा सकता हो तो हमें ऐसा अवश्य करना चाहिए। हमारी दृष्टि में श्रीकृष्ण सर्वरूप हैं। श्रीकृष्ण ही वस्तुमात्र के निमित्त और उपादान हैं, हमारा अपना कुछ भी नहीं है। अतः श्रीकृष्ण की वस्तुएँ श्रीकृष्ण की सेवा में ही लगें, ऐसी हमारी दृष्टि है। इसका यह अर्थ नहीं कि हम भक्ति के साधन को छोड़ बैठें अथवा तत्सम्बन्धी विधि-विधान का तिरस्कार करें। भक्ति की कनिष्ठ (प्रारम्भिक) दशा में गुरुप्रमाण द्वारा नियमित सब सिद्धान्तों का अनुसरण करना चाहिए। कौन सी वस्तु त्यागी जाय और कौन सी अपनायी जाय, यह भक्ति के सिद्धान्तों के अनुसार होना चाहिए; ऐसा नहीं कि स्वतन्त्र रूप से निर्णय करे कि क्या त्यागना है और क्या अपनाना है। अतः भक्त का मार्गदर्शन करने के लिए भगवान् श्रीकृष्ण के प्रतिनिधि और बाह्य प्रकाश के रूप में सद्गुरु का आश्रय आवश्यक है। गुरु को चाहिए कि धनसंचय और बहुशिष्यों के प्रवाह में बह न जाय। सद्गुरु ऐसा कभी नहीं करता। परन्तु कभी-कभी यदि गुरु भली- भाँति अधिकृत नहीं हो, स्वेच्छा से गुरु बना हो तो वह धनराशि और

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक) · पृष्ठ 128, कुल 380 में से · BharatKosha