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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 127

१०० ] भक्तिरसामृतसिन्धु अपनी भक्ति के प्रभाव से सकामकमों, तप, त्याग, दान, योग, ज्ञान, वैराग्य आदि के लाभ को अपने-आप प्राप्त कर लेता है; परतत्त्व के पर्याप्त ज्ञान से युक्त हो जाता है।" यह भक्ति की कसौटी है। भक्त अन्धकार में नहीं रहता भगवान् स्वयं विशेष कृपा का परिवर्षण करते हुए उसे अन्तर से प्रबुद्ध करते हैं। श्रीमद्भागवत (११.२०.३२-३३) में श्रीकृष्ण उद्धव से आगे कहते हैं, "हे सखे ! मेरी सेवा में अनुरक्त मेरे भक्तों को तप, त्याग, दान, ज्ञान, वैराग्य आदि सम्पूर्ण सत्कर्मों का फल सुलभ हो जाता है। इस पर भी मेरी भक्ति के अतिरिक्त वे और कुछ नहीं चाहते। यदि कोई भक्त स्वर्ग में या मेरे वैकुण्ठधाम को जाना चाहे तो मेरी अहैतुकी कृपा उस से सारी कामनायें सहज ही पूरी हो सकती हैं।" कृष्णभावना के सेवन में लगे पुरुष में यदि कुछ विषयवासना शेष भी हो तो सद्गुरु के आदेशानुसार नियमित रूप से भक्ति का साधन करते रहने से वह इस प्रवृत्ति से शीघ्र मुक्त हो जाता है। श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि प्राकृत इन्द्रियतृप्ति में आसक्ति नहीं होनी चाहिए; परन्तु श्रीकृष्ण से सम्बन्धित प्रत्येक वस्तु का ग्रहण करे। जैसे भोजन आवश्यक है और यह स्वाभाविक ही है कि रसना स्वा- दिष्ट अन्न चाहती है। अतः जिह्वातृप्ति के स्थान पर श्रीकृष्ण की प्रीति के लिए कुछ स्वादु पदार्थ बनाए जा सकते हैं और श्रीकृष्ण को उन का अर्पण किया जा सकता है। तब यह वैराग्य हो जायगा। स्वादिष्ट पदार्थ बनायें, परन्तु श्रीकृष्ण को अर्पण किए बिना उन्हें खाना नहीं चाहिए। जो श्रीकृष्ण को अर्पित न हुए हों, उन पदार्थों को ग्रहण न करने का यह नियम वास्तव में वैराग्य है। साथ ही, इस वैराग्य के द्वारा इन्द्रियों के वेग को शान्त किया जा सकता है। निर्विशेषवादी, जो सब प्राकृत वस्तुओं से बचना चाहते हैं, चाहे कितना भी तप-त्याग क्यों न करें, पर भगवत्सेवा करने का अवसर कभी नहीं पाते। अतः उनका वैराग्य संसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहाँ भक्ति से सम्बन्धरहित कृत्रिम वैराग्य का अभ्यास करते हुए निर्विशेषवादी फिर भवबन्धन में गिर गए हैं। वर्तमान काल में भी बहुत से नामधारी त्यागी हैं, जो संन्यास लेकर 'ब्रह्म सत्यं' का दम्भ करते हैं। इस प्रकार वे प्राकृत-जगत् को त्यागने का ढोंग तो करते हैं, परन्तु भक्ति के स्तर तक न पहुँचने के कारण लक्ष्य को नहीं पा सकते और परिणामतः परोपकार; राजनीतिक संघर्ष जैसी प्राकृत क्रियाओं में